पश्चिमी देशों ने सबसे पहले रूस पर प्रतिबंध 2014 में लगाए थे, जब रूस ने क्राइमिया को खुद में मिला लिया था। लेकिन उनकी तुलना में इस बार लगाए गए प्रतिबंध कहीं अधिक सख्त हैं। इसके बीच सबसे बड़ा फैसला कई रूसी बैंकों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के सिस्टम- स्विफ्ट से बाहर कर देने का है। ताजा प्रतिबंधों के कारण रूस के शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई है। साथ ही डॉलर के मुकाबले रूसी मुद्रा रुबल का भाव भी गिरा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को इन प्रतिबंधों का आभास था। इसलिए उनकी सरकार ने इनका मुकाबला करने की पहले से तैयारी कर रखी है।
ब्रिटिश थिंक टैंक चैटहैम हाउस में एसोसिएट फेलॉ डेविड लुबिन ने रूस की अर्थव्यवस्था को ‘किला-बंद इकोनॉमी’ कहा है। उन्होंने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा कि रूस पिछले कुछ वर्षों से विदेशी मुद्रा इकट्ठी कर रहा था, ताकि प्रतिबंधों की मार पड़ने पर वह उन्हें खर्च कर सके। यह काम उसने बखूबी किया है। जानकारों के मुताबिक यही रकम इस समय रूस के काम आ रही है। रूसी समाचार एजेंसी तास के मुताबिक पिछले हफ्ते जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो एटीएम मशीनों पर आशंकित लोगों की कतार लग गईं। इसके बावजूद नकदी की समस्या खड़ी नहीं हुई।
लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पुतिन की ‘किला-बंद अर्थव्यवस्था’ की नीति भले फौरी संकट टालने में कामयाब रहे, लेकिन निवेश और उत्पादकता बढ़ाने के मोर्चे पर यह सफल नहीं हो सकती। इसका असर कुल आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ेगा। 2014 के बाद आम रूसी नागरिकों की औसत आय में गिरावट आई है। आज यह उसी स्तर पर है, जहां 2010 में थी।
अब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने जो प्रतिबंध लगाए हैं, उनका मकसद लंबी अवधि में रूसी अर्थव्यवस्था को गतिरुद्ध कर देना है। अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन के अधिकारियों के मुताबिक ये धारणा सिर्फ एक भ्रम है कि रूस की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के असर से बची रहेगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने सीएनएन से कहा- ‘600 बिलियन डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार तभी शक्तिशाली रहेगा, अगर पुतिन उसका इस्तेमाल कर पाएंगे। रूस पर ऐसे प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिससे वह अपनी विदेशी मुद्रा से कुछ खरीद नहीं पाएगा।’