क्या अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजाक बनकर रह गए? भारत के सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकार तो यहां तक कह रहे हैं कि राष्ट्रपति जेलेंस्की के गलत आकलन ने यूक्रेन को खतरे में डाल दिया। अब राष्ट्रपति जेलेंस्की खुद रूस के राष्ट्रपति से हर स्तर पर वार्ता की तैयारी का प्रस्ताव दे रहे हैं, लेकिन अब काफी देर हो चुकी है। भारतीय सामरिक विशेषज्ञों को फिलहाल यूक्रेन को अमेरिका और रूस से किसी भी बड़ी सैन्य सहायता की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। इसके पीछे एक वजह रूस की यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई के बाद चीन का तड़का लगाना भी माना जा रहा है। चीन ने यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाई को हमला मानने से इनकार कर दिया। इसका साफ अर्थ यही है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बेहतर तालमेल बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन को चिढ़ाने जैसा माना जा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका और चीन के बीच में अंतरराष्ट्रीय व्यापार युद्ध के साथ-साथ शीत युद्ध है।
वरसाव से भारत लौटे एक भारतीय राजनयिक का कहना है कि सच में अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन रूस के राष्ट्रपति का दिमाग नहीं पढ़ पाए। कूटनीति के जानकारों का कहना है कि अमेरिका को लग रहा था कि उसकी धमकियों और चेतावनी के बाद रूस यूक्रेन की सीमा से अपनी सेना को वापस बुला लेगा। हालांकि माना जा रहा है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैकों और जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कॉल्ज को कुछ इसी तरह स्थिति बिगड़ जाने का अंदेशा था। माना जा रहा है कि इमेनुएल मैक्रों और ओलाफ स्काल्ज अभी रूस की सैन्य कार्रवाई रुकवाने का प्रयास कर रहे हैं। इसे यूक्रेन के युवा राष्ट्रपति जेलेंस्की की अनुभवहीनता से भी जोड़ा जा रहा है। काफी समय तक मास्को में रह चुके एसके शर्मा का कहना है कि यूक्रेन को फिलहाल फिनलैंड जैसा व्यवहार करना चाहिए था।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक साक्षात्कार में अपने बचपन का एक वाकया बताया था। उन्होंने कहा कि था कि यह ज्ञान उन्हें सड़क से मिला था। जहां उन्होंने सीखा कि जो पहले मुक्का मारकर निकल जाता है, वह जंग जीत लेता है। पुतिन ने यह वाकया सड़क पर युवाओं के बीच में होने वाले झगड़े के संदर्भ में सुनाया था। लेकिन उनकी कार्यशैली से भी लगता है कि वह इसे मूल मंत्र भी मानते हैं। सीरिया पर बढ़ रहे अमेरिका दबाव के बीच में उन्होंने कैस्पियन सागर से मिसाइल दागने का आदेश और राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सरकार को बचाने के लिए मिसाइल प्रतिरक्षी प्रणाली एस-400 को वहां तैनात करने का आदेश दे दिया था। इसे पहले यूक्रेन के शहर क्रीमिया पर अपनी अवधारणा को अंजाम देने के लिए भी उन्होंने इसी तरह की कूटनीति अपनाई थी।
रूस समर्थक विद्रोहियों ने मलेशिया के यात्री जहाज को टारगेट करके जहां नाटो को सावधान किया था, वहीं पुतिन ने चुपचाप 2015 में क्रीमिया को रूस में मिलाने के दस्तावेज पर दस्तखत कर दिया था। इस बार भी पुतिन ने पूरे होमवर्क के साथ पहले यूक्रेन की चारों तरफ से घेराबंदी की। यूक्रेन के डोनबास में रूस समर्थक विद्रोहियों को समर्थन देकर मजबूत बनाया। इसके बाद तेजी से नाटो के विस्तार पर सवाल उठाया। इसे रूस की संप्रभुता, सुरक्षा के खतरे से जोड़ा। इसके साथ-साथ यूक्रेन पर दबाव बढ़ाना जारी रखा। एसके शर्मा ने कहा कि मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि रूस ने हमला अचानक नहीं किया। इस हमले के बारे में अमेरिका यूरोप सब पहले से कह रहे थे। सही आकलन नहीं हो पाया और रूस के राष्ट्रपति ने पहले मुक्का मार दिया।
पोलैंड में अमेरिका का सैन्य बेस है। इस्तोनिया, लिथुआनिया और लातविया में भी उसकी मौजूदगी है। यूरोप में अमेरिकी बेड़ा रहता है। इसके अलावा अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो संगठन ने अपना विस्तार रूस के आस-पास कर लिया है। एसके शर्मा का कहना है कि अमेरिका के पास रूस को रोकने की प्रतिबद्धता और ठोस खाका होता तो पुतिन को ऐसी हिमाकत करने में दिक्कत आती। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब यह लंबे समय का मसला बन गया है। यहां सवाल यूक्रेन तक ही सीमित नहीं है। इसमें अमेरिका की पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। इससे मुश्किल समय में अमेरिका से सहायता की उम्मीद करने वाले देशों को भी झटका लगेगा। सवाल भरोसे का बन चुका है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपना कद बढ़ा लिया है।