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Russia-Ukraine War: यूक्रेन में जनमत संग्रह, युद्ध में रिजर्व सैनिकों की एंट्री, जानें क्या है पुतिन की योजना

Thu, 29 Sep 2022 08:44 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मॉस्को

सार

आखिर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन क्या योजना बना रहे हैं? पश्चिमी देशों को धमकी के पीछे उनका क्या मकसद है? यूक्रेन के चार क्षेत्रों में जनमत संग्रह क्यों कराया जा रहा है? इसका युद्ध पर क्या असर पड़ेगा? रूस में पुतिन कितने मजबूत हैं? वहां घरेलू हालात क्या हैं? आइये जानते हैं...
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रूस-यूक्रेन युद्ध। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को अब सात महीने बीत चुके हैं। शुरुआत में यह माना जा रहा था कि रूस आसानी से यूक्रेन की सेना को नेस्तनाबूत कर देगा। हालांकि, यूक्रेनी सेना के जुझारुपन के बाद अब रूस में ही अंदरूनी मुश्किलें शुरू हो गईं हैं। खासकर यूक्रेन की ओर से कब्जे वाले इलाकों को छुड़ाए जाने के बाद खुद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बना है। इसका असर यह हुआ कि पिछले हफ्ते पुतिन ने दो बड़े एलान कर दिए। पहला- यूक्रेन के चार बड़े क्षेत्रों में जनमत संग्रह कराने का और दूसरा- देश के रिजर्व सैन्यबल से लोगों की सेना में नियुक्ति करने का। इतना ही नहीं पुतिन ने पश्चिमी देशों को एक बार फिर परमाणु युद्ध की धमकी तक दे डाली। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन क्या योजना बना रहे हैं? पश्चिमी देशों को धमकी के पीछे उनका क्या मकसद है? यूक्रेन के चार क्षेत्रों में जनमत संग्रह क्यों कराया जा रहा है? इसका युद्ध पर क्या असर पड़ेगा? रूस में पुतिन कितने मजबूत हैं? वहां घरेलू हालात क्या हैं? आइये जानते हैं...

पुतिन का पहला फैसला- यूक्रेन के चार क्षेत्रों में जनमत संग्रह
रूसी राष्ट्रपति ने 24 फरवरी को जब यूक्रेन के खिलाफ युद्ध का एलान किया था। रूस अब तक उत्तर से कीव-खारकीव की ओर से, पूर्व में डोनबास (डोनेत्स्क और लुहांस्क) क्षेत्र से है और दक्षिण में खेरसन, जैपोरिझ्झिया और माइकोलेव की तरफ से, पूर्व और दक्षिण में रूस ने यूक्रेन की अच्छी-खासी जमीन पर कब्जा भी कर लिया है। अब जिन चार क्षेत्रों को रूस में शामिल कराने के लिए जनमत संग्रह कराया जा रहा है, उनमें डोनेत्स्क, लुहांस्क (पूर्वी यूक्रेन) और खेरसन, जैपोरिझ्झिया (दक्षिण यूक्रेन) शामिल हैं। यह चार क्षेत्र यूक्रेन का करीब 15 फीसदी जमीनी हिस्सा हैं।  

रूस से बाहर जाने के लिए लगी कारों की लाइन। - फोटो : Social Media
रूस जिन चार क्षेत्रों में जनमत संग्रह करा रहा है, उनमें डोनेत्स्क और लुहांस्क दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें पुतिन सरकार पहले ही यूक्रेन से अलग क्षेत्र होने की मान्यता दे चुका है। रिपोर्ट्स की मानें तो युद्ध शुरू होने के बाद रूस समर्थक अलगाववादियों ने सेना की मदद से लगभग पूरे लुहांस्क और डोनेत्स्क के 65 फीसदी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इसके अलावा रूसी सैनिकों ने खेरसन के कुछ हिस्सों और जैपोरिझ्झिया को भी अपने कब्जे में रखा है, जहां यूरोप का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र है। 

अचानक जनमत संग्रह कराने का फैसला क्यों, इससे क्या फर्क पड़ेगा?
जिन क्षेत्रों पर रूस ने कब्जा किया है, वहां काफी लंबे समय से जनमत संग्रह कराने की योजना बन रही थी। हालांकि, खेरसन में जिस तरह यूक्रेनी सेना ने पलटवार कर अपनी जमीन को छुड़ाया है, उसके बाद रूस ने अपने कदम तेजी से बढ़ाने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि जनमत संग्रह सिर्फ दिखावे के लिए हैं, इसके नतीजे रूस अपनी तरफ ही दिखाएगा। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि रूस इस जनमत संग्रह के बाद किस तरह यूक्रेन के अंदर के क्षेत्रों को कब्जाएगा। दरअसल, इन क्षेत्रों को रूस का हिस्सा बताने के बाद यह पुतिन और रूसी सरकार की नैतिक जिम्मेदारी होगी कि वह इसे यूक्रेनी सैनिकों के हमले से बचाएं। इतना ही नहीं रूस को इस क्षेत्र के उन हिस्सों पर भी कब्जा करना होगा, जो अभी यूक्रेन के नियंत्रण में हैं। 

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस छोड़कर भागते लोग। - फोटो : Social Media
पुतिन का दूसरा बड़ा फैसला- सेना में रिजर्व कर्मियों की भर्ती
यूक्रेन के इन क्षेत्रों में जनमत संग्रह कराने के बाद अगर रूस को अपने कब्जे को मजबूत करना है तो उसे और ज्यादा सैन्यकर्मियों और हथियारों की जरूरत पड़ेगी। इसीलिए पुतिन ने जनमत संग्रह कराने के फैसले के साथ ही आंशिक सैन्य संग्रहण यानी आम जनता से सैनिकों की भर्ती का एलान कर दिया। हालांकि, पुतिन और उनके रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु ने साफ किया है कि सक्रिय सैन्यबलों में सिर्फ वही लोग लिए जाएंगे, जो या तो रिजर्व सेना का हिस्सा हैं या जिनके पास सेना में सेवा का अनुभव है। इसके अलावा सैन्य प्रशिक्षण हासिल करने वालों को भी सक्रिय सैनिक के तौर पर भर्ती किया जाएगा। रक्षा मंत्री के मुताबिक रूस 2.5 करोड़ लोगों को सेना में भर्ती कर सकता है, लेकिन फिलहाल मंत्रालय सिर्फ इसकी एक फीसदी से थोड़ी ज्यादा क्षमता यानी करीब 3,00,000 सैनिकों की टुकड़ी बनाने जा रहा है। 

रूस-यूक्रेन युद्ध - फोटो : अमर उजाला
रिजर्व कर्मियों-आम लोगों की भर्ती से क्या फर्क पड़ेगा?
खेरसन और अन्य क्षेत्रों में यूक्रेन के पलटवार के चलते रूसी सैनिकों को भारी नुकसान हुआ है। बताया जाता है कि यूक्रेन के सैनिक अपनी हजारों वर्ग किलोमीटर की जमीन को रूस के कब्जे से छुड़ा चुके हैं। रूसी सैनिक भी लगातार गिरते समर्थन और आपूर्तियों की कमी के चलते पीछे हटने को मजबूर हुए हैं। ऐसे में पुतिन को रिजर्व सैनिकों की भर्ती का एलान करना पड़ा।  
 

Russia mobilisation - फोटो : Video Grab / Social media
पुतिन पर क्या हैं दबाव, रूस में अंदरूनी हालात कैसे?
यूक्रेन की ओर से पलटवार के चलते रूसी राष्ट्रपति पर दबाव काफी बढ़ा है। यूक्रेन में रूस की टुकड़ियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अफसरों ने ज्यादा सैनिकों को भेजने की मांग की है। उधर यूक्रेन पर पूरी तरह कब्जा करने की मांग कर रहे नेता पश्चिमी देशों का मनोबल तोड़ने के लिए सैनिकों के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा संसाधन भेजने की मांग कर रहे हैं। इतना ही नहीं पुतिन सरकार की सैन्य नीति को लेकर पहली बार उनके समर्थकों ने आलोचना की है। खुलेआम आलोचना करने वालों में चेचेन नेता रमजान कादिरोव शामिल हैं। ऐसे में पुतिन पर सैनिकों की संख्या बढ़ाने का भारी दबाव है। 

दूसरी तरफ आम लोगों में से सैन्य भर्ती करने का फैसला रूस की जनता के बीच काफी नकारात्मक इशारा हो सकता है। माना जा रहा है कि पुतिन ने लंबे समय तक ऐसा कोई भी फैसला इसीलिए रोके रखा, ताकि इसका लोगों के बीच गलत संदेश न जाए और उन्हें युद्ध क्षेत्र में रूस की हालत कमजोर न लगे। हालांकि, दबाव के आगे आखिर पुतिन को आम जनता से आंशिक सैन्य भर्ती का फैसला लेना पड़ा। इसका असर यह हुआ है कि रूस में कुछ जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन भी हुए हैं।
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अमेरिका ने फिर की यूक्रेन की सहायता
यूक्रेन-रूस के बीच चल रहा संघर्ष रुकने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं एक बार फिर यूक्रेन की मदद के लिए अमेरिका ने हाथ बढ़ाए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सीनेट ने यूक्रेन के लिए 12 अरब डॉलर की नई सहायता को मंजूरी दी।
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