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नई ईस्ट इंडिया कंपनी की योजना में अमेरिका: रुबियो के मार्केट शेयर वाले बयान पर विवाद क्यों? समझिए इसके मायने

Mon, 16 Feb 2026 09:45 PM IST
शुभम कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन

सार

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में ग्लोबल साउथ में मार्केट शेयर बढ़ाने की आक्रामक रणनीति की बात कही। इस बयान के बाद वैश्विक राजनीति में बहस छिड़ गई है क्या यह सामान्य वैश्विक प्रतिस्पर्धा है या औपनिवेशिक सोच की झलक? आलोचकों ने चेतावनी दी है कि इतिहास में व्यापार ही वर्चस्व की पहली सीढ़ी बना था। आइए पूरे मामले को जानते हैं।

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मार्को रुबियो, अमेरिकी विदेश मंत्री - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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वैश्विक राजनीति में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने जर्मनी में आयोजित म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा कि पश्चिमी देशों को 'ग्लोबल साउथ' यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए ज्यादा आक्रामक तरीके से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। रुबियो ने अपने भाषण में कहा कि पश्चिमी देशों को एक नया पश्चिमी सदी बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने उद्योगों को मजबूत करने, सप्लाई चेन सुरक्षित करने और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया।

उनका कहना था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ, खासकर साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के कारण। उन्होंने डिकॉलोनाइजेशन (उपनिवेशवाद से मुक्ति) को पश्चिमी देशों के प्रभाव में कमी का दौर बताया।

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समझिए क्यों हो रही है आलोचना?
बता दें कि रुबियो के बयान से कई विकासशील देशों में चिंता पैदा हुई है। आलोचकों का कहना है कि मार्केट शेयर जीतने जैसी भाषा पुराने औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है। इतिहास में यूरोपीय ताकतों ने एशिया और अफ्रीका में व्यापार के नाम पर प्रवेश किया था। रेल, बंदरगाह और सड़कें बनाई गईं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य स्थानीय विकास नहीं बल्कि यूरोप के उद्योगों के लिए संसाधन निकालना था।

इतिहासकारों ने इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का उदाहरण दिया है, जो पहले एक व्यापारिक कंपनी के रूप में आई, लेकिन बाद में उसने भारत के बड़े हिस्से पर राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण कर लिया। हालांकि आज की दुनिया अलग है। अब देश स्वतंत्र हैं और अपने फैसले खुद लेते हैं। फिर भी आलोचकों का कहना है कि अगर आर्थिक प्रतिस्पर्धा के साथ राजनीतिक दबाव, प्रतिबंध या रणनीतिक शर्तें जुड़ी हों, तो असमान ताकत का संतुलन फिर से बन सकता है।
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आसानी से समझिए पूरा मामला

  • अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा कि पश्चिमी देशों को विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए अधिक आक्रामक होना चाहिए।
  • रुबियो ने इसे नया पश्चिमी सदी बनाने की दिशा में कदम बताया, जिसमें उद्योगों को मजबूत करना, सप्लाई चेन सुरक्षित करना और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना शामिल है।
  • रुबियो ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का प्रभाव कम हुआ, खासकर साम्यवादी और उपनिवेश विरोधी आंदोलनों के कारण।
  • उनके बयान से विकासशील देशों में चिंता बढ़ी, क्योंकि मार्केट शेयर बढ़ाने की भाषा पुराने औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है।
  • आलोचकों ने इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का उदाहरण दिया, जो पहले व्यापारिक कंपनी थी और बाद में राजनीतिक व सैन्य ताकत बन गई।
  • आज के देशों के पास अपनी संप्रभुता और वैश्विक कनेक्शन है। फिर भी आर्थिक दबाव और राजनीतिक शर्तों से असमान शक्ति संतुलन फिर से बन सकता है।
  • रणनीतिक विश्लेषकब्रह्मा चेलानी और अर्नोद बर्ट्रेंड ने रुबियो के बयान को साम्राज्यवादी और इतिहास को बदलने वाला बताया।
  • कुछ का कहना है कि यह सिर्फ सामान्य रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। आज के ग्लोबल साउथ देश अपने हितों की सुरक्षा करते हैं और निवेश व व्यापार समझौतों के जरिए जुड़ते हैं।
  • दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने अफ्रीकी देशों को एकजुट रहने और अपने खनिज संसाधनों की सुरक्षा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई तरह की उपनिवेशवाद से बचना जरूरी है।
  • रुबियो का बयान वैश्विक राजनीति में बहस छेड़ रहा है। सवाल यह है कि क्या यह सामान्य आर्थिक मुकाबला है या पुराने औपनिवेशिक इतिहास की गूंज? विकासशील देशों के लिए चुनौती है कि वे अपने हितों की रक्षा करें और असमान शक्ति संतुलन से बचें।

किन लोगों ने उठाई आपत्ति?
बात अगर रुबियो के बयान पर आपत्ति उठाने वाले लोगों की करें तो कई जाने-माने विश्लेषकों ने रुबियो के बयान की आलोचना की है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी और भू-राजनीतिक टिप्पणीकार अर्नोद बर्ट्रेंड ने इसे साम्राज्यवादी सोच जैसा बताया। वहीं भारत के विश्लेषक देबब्रत भादुड़ी और संजय बारू ने कहा कि भारत जैसे देशों को, जो लंबे समय तक उपनिवेशवाद के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, इस तरह की सोच का खुलकर विरोध करना चाहिए।

ट्रंप प्रशासन की नीति से जुड़ाव?
इतना ही नहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जो डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में व्यापार, टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए पश्चिमी प्रभाव को फिर से मजबूत करने पर जोर देती है। आलोचकों का कहना है कि नियंत्रण वापस लेने और प्रभाव फिर से स्थापित करने जैसी भाषा पुराने दौर की याद दिलाती है।

अच्छा अब समर्थकों का तर्क भी समझिए?
ऐसा नहीं है कि रुबियो के इस बयान की केवल आलोचना ही हो रही है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह सामान्य रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, जो आज की बहुध्रुवीय दुनिया में स्वाभाविक है। उनका तर्क है कि आज के विकासशील देश पहले की तरह कमजोर नहीं हैं। वे अलग-अलग देशों से साझेदारी करते हैं और अपने हितों की रक्षा करना जानते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अब व्यापार समझौतों, निवेश और अनुबंधों के जरिए होता है, न कि साम्राज्यवादी कब्जे से।

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अफ्रीका की प्रतिक्रिया और चिंताए
हालांकि इन सभी चर्चाओं के बीच दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने अफ्रीकी देशों से एकजुट रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अफ्रीका को अपने प्राकृतिक संसाधनों के दोबारा शोषण से बचना होगा। उन्होंने अफ्रीकी संघ की बैठक के दौरान कहा कि दुनिया की बदलती राजनीति में अफ्रीकी देशों को एक मजबूत और एकजुट आवाज बनानी चाहिए, ताकि कोई भी ताकत उनके खनिज और संसाधनों का फायदा न उठा सके।

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