अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में ग्लोबल साउथ में मार्केट शेयर बढ़ाने की आक्रामक रणनीति की बात कही। इस बयान के बाद वैश्विक राजनीति में बहस छिड़ गई है क्या यह सामान्य वैश्विक प्रतिस्पर्धा है या औपनिवेशिक सोच की झलक? आलोचकों ने चेतावनी दी है कि इतिहास में व्यापार ही वर्चस्व की पहली सीढ़ी बना था। आइए पूरे मामले को जानते हैं।
वैश्विक राजनीति में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने जर्मनी में आयोजित म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा कि पश्चिमी देशों को 'ग्लोबल साउथ' यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए ज्यादा आक्रामक तरीके से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। रुबियो ने अपने भाषण में कहा कि पश्चिमी देशों को एक नया पश्चिमी सदी बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने उद्योगों को मजबूत करने, सप्लाई चेन सुरक्षित करने और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया।
उनका कहना था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ, खासकर साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के कारण। उन्होंने डिकॉलोनाइजेशन (उपनिवेशवाद से मुक्ति) को पश्चिमी देशों के प्रभाव में कमी का दौर बताया।
किन लोगों ने उठाई आपत्ति?
बात अगर रुबियो के बयान पर आपत्ति उठाने वाले लोगों की करें तो कई जाने-माने विश्लेषकों ने रुबियो के बयान की आलोचना की है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी और भू-राजनीतिक टिप्पणीकार अर्नोद बर्ट्रेंड ने इसे साम्राज्यवादी सोच जैसा बताया। वहीं भारत के विश्लेषक देबब्रत भादुड़ी और संजय बारू ने कहा कि भारत जैसे देशों को, जो लंबे समय तक उपनिवेशवाद के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, इस तरह की सोच का खुलकर विरोध करना चाहिए।
ट्रंप प्रशासन की नीति से जुड़ाव?
इतना ही नहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जो डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में व्यापार, टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए पश्चिमी प्रभाव को फिर से मजबूत करने पर जोर देती है। आलोचकों का कहना है कि नियंत्रण वापस लेने और प्रभाव फिर से स्थापित करने जैसी भाषा पुराने दौर की याद दिलाती है।
अच्छा अब समर्थकों का तर्क भी समझिए?
ऐसा नहीं है कि रुबियो के इस बयान की केवल आलोचना ही हो रही है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह सामान्य रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, जो आज की बहुध्रुवीय दुनिया में स्वाभाविक है। उनका तर्क है कि आज के विकासशील देश पहले की तरह कमजोर नहीं हैं। वे अलग-अलग देशों से साझेदारी करते हैं और अपने हितों की रक्षा करना जानते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अब व्यापार समझौतों, निवेश और अनुबंधों के जरिए होता है, न कि साम्राज्यवादी कब्जे से।