तुरंत 13 से 17 साल के बीच की लड़कियों की तस्वीरें हमारे सामने आना शुरू हो गईं। नेटवर्क का फैलाव और लड़कियों की संख्या हैरान करने वाली थी। अगर हमें तस्वीरों में लड़कियां पसंद नहीं आतीं तो वे और तस्वीरें लेकर हाजिर हो जाते। अधिकतर लड़कियां दलालों के साथ रहती हैं। जब वो किसी ग्राहक के साथ नहीं होती हैं तो वे खाना बना रही होती हैं या झाड़ू-पोंछा लगा रही होती हैं। हमें बताया गया, 'हम लड़कियों को लंबे समय तक नहीं रखते। ज्यादातर बांग्लादेशी मर्द ही यहां आते हैं। कुछ वक्त के बाद ये लोग बोर हो जाते हैं। छोटी उम्र की लड़कियां काफी हंगामा करती हैं इसलिए हम उनसे जल्द ही छुटकारा पा लेते हैं।'
रिकॉर्डिंग और निगरानी के बाद हमने अपने सबूत स्थानीय पुलिस को दिखाए। एक स्टिंग ऑपरेशन के लिए एक छोटी सी टीम बनाई गई। पुलिस ने तुरंत दलाल को पहचान लिया, "हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं।" ये समझ नहीं आया कि पुलिस वाला क्या कहना चाहता था। शायद वो दलाल खबरी था या एक घोषित अपराधी। स्टिंग की शुरुआत हमने दलाल से उन दो लड़कियों की मांग से की जिनकी तस्वीरें हमें पहले दिखाई गई थीं। हमने कहा कि लड़कियां कॉक्स बाजार के एक मशहूर होटल में शाम आठ बजे पहुंचाई जाएं। फाउंडेशन सेंटिनेल संस्था के विदेशी सदस्य को अंडरकवर ग्राहक बनाकर, एक अनुवादक के साथ होटल के बाहर खड़ा कर दिया गया।
जैसे ही मिलने का वक्त करीब आया, दलाल और अंडरकवर ग्राहक के बीच फोन पर कई बार बातचीत हुई। दलाल चाहता था कि ग्राहक होटल से बाहर आए। हमने मना कर दिया। दलाल ने दो लड़कियों को एक ड्राइवर के साथ हमारे पास भेजा। पैसे के लेन-देन के समय हमारे अंडरकवर ग्राहक ने पूछा, "अगर आज सबकुछ ठीक रहा तो क्या आगे भी इसे जारी रख सकते हैं?" ड्राइवर ने हां में सिर हिलाया। इसके बाद पुलिस एक्शन में आ गई। ड्राइवर को गिरफ़्तार किया गया। बच्चों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञों और मानव-तस्करी के जानकारों की मदद से लड़कियों के रहने के लिए जगह खोजी गई।
एक लड़की ने वहां जाने से मना कर दिया। लेकिन दूसरी मान गई।
लड़कियां गरीबी और वेश्यावृत्ति के बीच फंसी हुई थीं। उनका कहना था कि वेश्यावृत्ति के बिना न तो वो अपना पेट भर पाएंगी और न ही अपने परिवार का। महिलाओं और बच्चों को अंतरराष्ट्रीय सीमा के आर-पार ले जाने के लिए एक नेटवर्क की जरूरत होती है। इसे इंटरनेट पूरा करता है। इंटरनेट के जरिए संगठित अपराध के अलग-अलग सदस्य एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं और सेक्स बेचने का धंधा भी होता है। हमने रोहिंग्या बच्चों को बांग्लादेश के ढाका और चटगांव, नेपाल के काठमांडू और भारत में कोलकाता ले जाए जाने की मिसालें देखीं।
कोलकाता की सेक्स इंडस्ट्री में उन्हें भारतीय पहचान पत्र दिए जाते हैं जिसकी वजह से उनकी असली पहचान गायब हो जाती है। ढाका में साइबर क्राइम यूनिट ने हमें बताया कि कैसे मानव तस्कर इंटरनेट के जरिए लड़कियों को बेचते हैं। फेसबुक पर बने ग्रुप सेक्स इंडस्ट्री को लुका-छिपे जारी रखने में मददगार साबित होते हैं। हमें डार्क वेब के बारे में बताया गया जिसपर मौजूद इनक्रिप्टेड वेबसाइट्स इन गोरखधंधों को आसान बना देती हैं। डार्क वेब पर एक यूजर ने शरणार्थी संकट में फंसे रोहिंग्या बच्चों से फायदा उठाने के तरीके बताए। ये यूजर आगे ये भी बताता है कि इन बच्चों को खोजने की बेहतर जगह कौन सी है। इस बातचीत को अब सरकार ने इंटरनेट से हटा दिया है। लेकिन इससे हमें पता चलता है कि कैसे शरणार्थी संकट मानव तस्करों और बच्चों का यौन शोषण करने वालों का केंद्र बनते जा रहे हैं। बांग्लादेश में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही तरीकों से, मानव तस्करों का एक जाल फैलता जा रहा है। रोहिंग्या संकट ने बांग्लादेश में सेक्स इंडस्ट्री शुरू नहीं की लेकिन इस संकट के बाद इसमें भारी इजाफा हुआ है।