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म्यांमार में चार फीसदी मुसलमानों से क्यों डर रहे हैं बौद्ध?

Fri, 15 Sep 2017 08:06 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा
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म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर हैं। हजारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमाम बांग्लादेश जा रहे हैं।सैंकड़ों संख्या में ये मारे गए हैं। भारत में भी रोहिंग्या मुसलमान प्रवासी के तौर पर रहे हैं। म्यांमार की नेता और शांति के नोबेल सम्मान से सम्मानित आंग सान सू ची पर भी सवाल उठ रहे हैं। 
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रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जारी हिंसा पर हार्वर्ड केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट की रिसर्चर डॉ लेन क्यूओक की यह रिपोर्ट बताती है कि आखिर किन अफवाहों के दम पर वहां के बौद्ध चार फीसदी मुसलमानों से डरे हुए हैं।  

पढ़ें: रोहिंग्या मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सरकार दाखिल करेगी हलफनामा

म्यांमार में बौद्धों और मुसलमानों के बीच तनाव का सीधा संबंध देश के पश्चिमी राज्य रखाइन की राजधानी सिटवे में मई 2012 से अरखनीज बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा से है। 
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इसी साल अक्टूबर में रखाइन के अन्य इलाक़ों में हिंसा भड़की. आगे चलकर न केवल रोहिंग्या बल्कि अन्य मुसलमानों को भी निशाना बनाया जाने लगा. इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों जानें गईं और हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं. यह आज भी डरावने तरीक़े से जारी है.

2013 में म्यांमार में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़की थी

Rohingya
साल 2013 में म्यांमार के अन्य इलाको में भी मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़की। संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को नहीं रोक पाने में वहां की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। 

दूसरी तरफ म्यांमार की सरकार इन दावों को सिरे से खारिज करती रही। धार्मिक टकराव का खतरा न केवल म्यांमार में है बल्कि सरहद पार भी इसकी आग को महसूस किया जा सकता है। 

दक्षिण-पूर्वी एशिया धार्मिक रूप से काफी विविध है। सामान्य तौर पर यह इलाका अपनी सहिष्णुता के लिए जाना जाता है। जब म्यांमार में मुस्लिमों को निशाना बनाया गया तो इसकी प्रतिक्रिया मुस्लिम बहुल देशों में भी दिखी। 

मलेशिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में बौद्धों पर हमले हुए। जकार्ता में एक बौद्ध केंद्र को बम से उड़ा दिया गया। इंडोनेशिया स्थित म्यांमार के दूतावास में भी बम प्लांट करने की असफल कोशिश की गई थी। इस तरह की घटनाओं से पूरे इलाके में धार्मिक अविश्वास पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।

म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना कोई नई बात नहीं है

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म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना कोई नई बात नहीं है। इसकी जड़ें उपनिवेशवादी नीतियों में हैं। भारत से बड़ी संख्या में म्यांमार में मुस्लिम मजदूरों को लाया गया था।

1930 में भारतीयों के विरोध में यहां दंगे हुए थे। इनकी मांग थी कि भारतीयों को वापस भेजा जाए। शिपों में भारतीयों की बहाली के खिलाफ लोगों का गुस्सा था। इन भारतीयों के खिलाफ 1938 में भी दंगा हुआ।

1938 में भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ दंगे का संबंध कथित रूप से उस किताब से था जिसे एक भारतीय मुस्लिम ने लिखी थी। कहा जाता है कि इस किताब में बौद्ध धर्म को अपमानित किया गया था।

म्यांमार में आज की तारीख में मुस्लिमों के खिलाफ भावना और उफान पर है। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति यहां असाधारण रूप से समर्थन का अभाव है। यहां के बौद्धों और ईसाइयों का मानना है कि रोहिंग्या मुस्लिम अवैध बंगाली प्रवासी हैं। इनका कहना है कि म्यांमार के 1982 के नागरिकता के नियम के तहत ये अयोग्य हैं।

बौद्धों को इस्लामीकरण और बर्मीकरण का है डर

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1982 के नागरिकता कानून के तहत अगर आवेदक म्यांमार में आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड 135 जातीय समूह से ताल्लुक नहीं रखता है तो उसे नागरिकता पाने का हक नहीं है। 

इसी नियम के कारण गरीब और हाशिए पर खड़े रोहिंग्या मुस्लिम दरबदर हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफि गुस्से को उनकी नागरिकता से भी जोड़कर देखा जाता है। यहां मुस्लिमों के खिलाफ नफरत लगातार बढ़ती जा रही है। 

म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना के पीछे कारण काफी जटिल है, लेकिन इनसे जुड़ी धारणाएं काफी प्रबल हैं। म्यांमार में धारणा है कि मुस्लिम बहुत ज्यादा हैं, बहुत अमीर हैं और बहुत अलग हैं। 

यहां के लोगों के मन में धारणा है कि मुस्लिम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और अगर इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो भारत और इंडोनेशिया की तरह बौद्ध विरासत यहां भी खत्म हो जाएगी। 

रखाइन में ज्यादातर अरखनीज बौद्धों के मन में यह बात गहराई से पैठ गई है कि रखाइन का इस्लामीकरण और बर्मीकरण हो रहा है। मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की दूसरी धारणा है कि मुस्लिम अपने धन का इस्तेमाल जमीन खरीदेने में कर रहे हैं।

म्यांमार का इस्लामीकरण?

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वे ऐसा करके बर्मीज महिलाओं को शादी के लिए आकर्षित करते हैं और शादी के बाद उनका धर्मांतरण करा मुसलमान बना देते हैं। इन गरीब रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि बेहतरीन घर, बंदूक और रॉकेट्स खरीद रहे हैं।

इसके साथ ही इन पर मस्जिद बनाने का भी आरोप है। अफवाहों के कारण मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। इनकी संपत्ति का नुकसान भी लगातार हो रहा है। इन्हें प्रशासनिक अधिकारियों को खुद को बचाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ती है।

जुलाई 2013 में अमेरीकी-एशियाई बिजनेस काउंसिल में 969 मूवमेंट के बौद्ध भिक्षु ने तीसरा कारण भी बताया था। उन्होंने कहा था कि ऐतिहासिक रूप से हिन्दुओं और ईसाइयों से अच्छे संबंधों की तुलना में मुस्लिमों से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। 

यहां के बौद्धों का मानना है कि मुस्लिमों की आस्था और परंपरा बिल्कुल अलग है। हालांकि यह बात हिन्दू और ईसाई धर्म के बारे में भी कही जा सकती है। टकराव की वजह अलग धर्म का होना नहीं है बल्कि मामला पहचान और अवधारणा का है।

आज की तारीख में म्यांमार ऐतिहासिक संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है और इसमें साफ नहीं है कि कौन विजेता है और किसके हिस्से में शिकस्त है।
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महज चार फीसदी मुसलमानों से डर कैसा?

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म्यांमार में यह भावना प्रबल हो चुकी है कि मुस्लिम बाहरी हैं और ये सोने के स्तूपों की जमीन पर अतिक्रमण फैला रहे हैं। इसी तर्क की पीठ पर सवार होकर म्यांमार में बौद्ध राष्ट्रवाद का प्रसार हो रहा है।

ऐसी भावना तेजी से पैठ रही है कि बर्मीज का बौद्ध होना अनिवार्य है बौद्ध राष्ट्रवाद की जमीन 969 मूवमेंट के दौरान ही तैयार हो गई थी। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार के भीतर के लोग ही मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा को हवा दे रहे हैं। 

अस्थिरता के तर्क पर फिर से म्यांमार में सैन्य तानाशाह के शासन को सही ठहराया जा सकता है। 2015 के चुनाव में विपक्ष की जीत हुई थी। हालांकि इस्लाम और बौद्ध दोनों में ऊंच-नीच की भावना को सिरे से खारिज किया गया है।

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यहां पर आध्यात्मिक श्रेष्ठता जैसी कोई चीज नहीं है और स्वीकार्यता को लेकर प्रतिबद्धता पर जोर है। म्यांमार की सरकार में बौद्ध संगठनों का अच्छा खासा प्रभाव है। ऐसे में सरकार चाहे तो इस समस्या सुलझा सकती है। 

म्यांमार की सरकार बहुसंख्यक बौद्धों के मन से इस डर को आसानी हटा सकती है कि मुसलमान उन पर हावी नहीं होंगे। म्यांमार में कुल आबादी के महज चार फीसदी ही मुस्लिम हैं।
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