अब्दुल क़ादिर मुल्ला जमाते इस्लामी के पहले अहम नेता हैं जिन्हें बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान मानवता के विरूद्ध अपराधों के लिए उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई है।
पैंसठ साल के अब्दुल क़ादिर मुल्ला छात्र जीवन से ही बांग्लादेश के सबसे बड़े इस्लामी राजनीतिक दल– जमाते इस्लामी से जुड़े रहे हैं। वो पार्टी के अहम फैसलों के लिए बनाई गई समिति के सदस्य थे।
साल 1971 तक मुल्ला जमाते इस्लामी के छात्र विंग के अहम सदस्य बन चुके थे। ये वही वक़्त था जब पाकिस्तानी हुकूमत मुल्क के पूर्वी हिस्से में जारी राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही थी। बाद में पाकिस्तान का यही पूर्वी हिस्सा मुल्क से अलग होकर बांग्लादेश के नाम से अलग देश बना।
मिलिशिया को तैयार करने में की मदद
जमाते इस्लामी उस वक्त पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ था, और उसने स्थानीय मिलिशिया को तैयार करने में उसकी मदद की थी।
वहां के बंगाली भाषी लोगों ने भारत की मदद से अपनी नागरिक सेना तैयार कर रखी थी। आरोप है कि अल बद्र नाम की संस्था को खड़ा करने में जमात का बहुत अहम रोल था।
कहा जाता है कि अल बद्र ने युद्ध के आख़िरी दिनों में 200 से अधिक बंगाली बुद्धिजीवियों को अगवा कर उनका क़त्ल कर दिया था।
अदालत में कादिर मुल्ला पर इस संस्था का सदस्य होने का आरोप लगाया गया। कहा जाता है कि ढाका के मीरपुर इलाक़े में हुई हत्याओं के पीछे उन्हीं का हाथ था। उन्हें मीरपुर इलाक़े में क़साई के नाम से भी बुलाया जाता था।