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वो पांच महिलाएं जिन्होंने बलात्कार की पीड़ा झेली

Fri, 08 Mar 2013 01:16 PM IST
बीबीसी हिंदी
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लॉरा न्यूमेन अन्नापोलिस, मैरीलैंड में रहती हैं। इनके साथ 18 साल की उम्र में बलात्कार हुआ। अपराधी जेल में है। लॉरा तथा अन्य महिलाओं पर यौन हमलों के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
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पढ़िए उनकी कहानी उनकी ही ज़ुबानी:
"मैं तब कम्युनिटी कॉलेज में थी। खर्चा चलाने के लिए वेटर का काम करती थी। उस दिन शाम को जब घर आयी, मेरा रूममेट अपनी प्रेमिका से मिलने गया हुआ था। वह मेरे ही रेस्तरां में काम करता था। मैं घर पर अकेली थी।

तब रात के करीब बारह या एक बज रहे होंगे। मैं सो रही थी। तभी अपार्टमेंट में हुए किसी शोरगुल से मेरी नींद खुली। मुझे लगा कि मेरा रूममेट लौट आया है। जैसे ही मैं उठने लगी, मेरे चेहरे को किसी ने तकिये से दबा दिया और सिर पर बंदूक तान दी। ऐसी हालत में मेरा बलात्कार किया गया।
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वे बहुत ही बुरे दिन थे। मुझे साफ़ दिख रहा था कि मेरे घर वालों को मेरे साथ हुई बलात्कार की घटना पर विश्वास नहीं था और यह भी स्पष्ट हो गया था कि पुलिस भी मेरा यकीन नहीं कर रही है। उन्हें लग रहा था कि मेरा बलात्कार नहीं हुआ और मैं अपने गर्भ को छुपाने के लिए कोई नाटक कर रही हूं। मेरे केस की छानबीन कभी नहीं हुई।

इन सबका परिणाम यह हुआ कि मैं भयंकर तनाव में रहने लगी। क्योंकि एक तो मैं अकेली ही इस मुसीबत का सामना कर रही थी और दूसरे, ऐसी परिस्थिति के लिए मानसिक रूप से मैं कतई तैयार नहीं थी।

मुझे घर वापस जाने के लिए मजबूर किया जाने लगा। आप सोचिए कि वे मेरे साथ हुए बलात्कार को सच नहीं मान रहे थे। वे कुछ भी और मान सकते थे मगर ये नहीं कि मेरा बलात्कार हुआ होगा।

इस तरह के माहौल में रहने को मजबूर होना बेहद तनाव भरा साबित हो रहा था।

जब तक मैं 21 साल की नहीं हो गई, तब तक मैं घर से बाहर निकलने में असमर्थ रही। फिर कई कई सालों का लंबा संघर्ष। कभी वो भी वक्त था जब खाना भी मुहाल था। कभी किसी से नजदीकी संबंध नहीं बनाए, सबसे दूरियां बनाए रखीं।

लंबे समय तक लगातार डर में जीती रही। मैं कहना चाहूंगी कि कुछ भी नहीं बदला है, वही परिस्थितियां आज भी हैं। सभी रेप सर्वाइवर जिनसे मैं मिली हूं, लगातार भय में जी रहे हैं। यह भय ताउम्र उनका पीछा नहीं छोड़ता।

मैं इसे मौत से बदतर जिंदगी कहूंगी। इससे अच्छा तो आप मुझे मार ही डालो। इन सबसे उबर पाना बहुत मुश्किल है। आप भले ही इस हालात को पूरी तरह बदल नहीं सकते, मगर मुझे लगता है कि इस अपराध की धारणा को बदलने का सबसे जरूरी उपाय है, बलात्कार की शिकार औरतें इस अपराध के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें।

कुछ मौकों पर आपको तय करना होता है। या तो आप आगे बढें या वहीं ठहर जाएं। मेरे लिए तब एक-एक पल एक-एक दिन के बराबर था। अब मैं 23 साल की हो चुकी थी।

मैंने अपना ध्यान पूरी तरह कैरियर बनाने और खुद के लिए जिंदगी संवारने में लगा दिया था। मैंने खूब मेहनत की और लंबे समय तक काम किया। अपनी सारी ऊर्जा को निजी संबंध बनाने में नहीं, बल्कि अपने कैरियर में लगाया। एमबीए किया।

कड़ी मेहनत की बदौलत एक के बाद एक सफल नौकरी पाती चली गई। और 30 साल की होते-होते खुद को आर्थिक रूप से बिल्कुल सुरक्षित कर लिया।

तो बलात्कार के 19 साल गुजर जाने के बाद भी मैं उस केस को फिर से शुरू करने के प्रति दृढ़संकल्प थी। सालों साल मैंने जो कोशिश की, मैं उसके बारे में दृढ़ नहीं थी, मगर मेरी दृढ़ता करियर शुरू करने और बिजनेस में सफल होने के रूप में सामने आई।

पुलिस मेरे केस को दोबारा शुरू करे, इस मकसद से मैंने मुहिम चलाई। मैने सबकी मदद ली और अंतत: मुझे उस जासूस का नाम मिला जो पुराने और ठंडे पड़ चुके मामलों को उठाता था। उसने मेरा केस अपने हाथों में लिया और तीन दिनों में सुलझा दिया।

वारदात के समय के सारे सबूत लगभग नष्ट हो चुके थे। लेकिन उंगलियों के निशान, जो कि लंबे समय तक रहते हैं, उसके चलते अपराधी की शिनाख्त हो सकी। वहां मौजूद उंगलियों के निशान उस व्यक्ति के थे, जो अक्सर जेल आता-जाता रहता था।

अपराधी को जब सजा सुनाई गई, ऐसा लगा मानो मैं किसी कैद से आज़ाद हो गई।

आज़ादी सबसे अच्छा शब्द है मेरे लिए क्योंकि अब कोई घेरा नहीं था। जब न्याय हुआ, तो कोई बोझ हटा। यह सब मेरे लिए बहुत उत्साहित करने वाला था। अब बस मैं एक सप्ताह के लिए सो जाना चाहती थी। यह बेहद महत्वपूर्ण था मेरे लिए, जीवन बदल देने वाला।

जिस दिन अभियोग पत्र दाखिल किया गया, उसी दिन ऐसा हुआ कि मैं अपने भावी पति से मिली। यह मात्र संयोग था। अत: मैंने 39 साल की उम्र में शादी की। अब मेरे दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी।"
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वह 25 मई 2000 का दिन था, जब कोलंबियाई पत्रकार जिनेथ बेदोया को बोगोटा ला मोडेलो जेल के दरवाजे से अगवा कर लिया गया। यहां किसी संभावित सूत्र से उनकी मुलाकात तय थी। तीन लोगों ने उन्हें 16 घंटे से अधिक समय तक कैद में रखा। उन लोगों ने जिनेथ के साथ बलात्कार किया और उन्हें यातना पहुंचाई। बाद में इन तीन लोगों की पहचान कोलंबिया के प्रमुख अर्द्धसैनिक संगठन- कोलंबिया संयुक्त स्व-रक्षा बल (एयूसी) के सदस्य के रूप में की गई। ये वही लोग थे, जिनके बारे में जिनेथ खोजबीन कर रही थीं।

जिनेथ की आपबीती सुनिए उनकी ही ज़ुबानी:
''बलात्कार के बाद सबसे कठिन था खुद को अकेला पाना। चोटों से भरे शरीर के साथ मैं खुद को बिलकुल अनाथ महसूस कर रही थी। मुझे एहसास हुआ कि जीवन में कामयाबी हासिल करने के लिए चलते रहना है। मैं आगे बढ़ना नहीं चाहती थी।

मुझे सबसे पहले आत्महत्या करने का ख्याल आया। मगर ज्यों ही मैंने उस पर अमल करना चाहा और पाया कि मुझमें ऐसा करने का साहस नहीं था। मैं डरती थी कि चाहे आत्महत्या की जितनी भी कोशिशें कर लूं, मरूंगी नहीं। मगर मुझे जिंदा रहने का कोई कारण अभी भी दिखाई नहीं दे रहा था।

अंतरात्मा से बस एक ही आवाज आ रही थी कि अगर मैं जिंदा रहती हूं, तो मैं उस काम को आगे बढ़ाऊं, जिसे मैं सबसे ज्यादा पसंद करती हूं, और वह काम पत्रकारिता थी।

हालांकि बाहर निकलना बहुत मुश्किल था, क्योंकि मेरे समूचे शरीर पर चोटें थीं। पिटाई के कारण मेरी बाहें नीली पड़ गई थीं। मेरे हाथ, बदन, चेहरा सब चोटों से भरा पड़ा था और मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे इस तरह देखे।

अगवा किए जाने की घटना के दो सप्ताह बाद जैसे ही मुझे महसूस हुआ कि मेरा चेहरा ठीक हो गया है, मैंने अपने अखबार में वापस जाने का फैसला कर लिया।

ये मेरे लिए बेहद भावुक पल थे, क्योंकि अपने डायरेक्टर के साथ बेहद मुश्किल से चलते हुए जैसे ही मैं वहां पहुंची, सभी खड़े हो गए- करीब 200 जर्नलिस्ट और फिर सबने मेरे लिए तालियां बजायीं। उन लोगों ने खूब लंबी कतार बना रखी थी। सबने एक-एक कर मुझे उस दिन गले लगाया।

उस दिन के बाद, हमने केवल अपहरण के बारे में बात की। मेरे साथ हुई बलात्कार की घटना पर फिर कभी चर्चा नहीं हुई। मेरे कई सहयोगी जानते तक नहीं कि मेरे साथ बलात्कार हो चुका था। वे बस इतना जानते थे कि मेरा अपहरण हुआ था और मुझे पीटा गया था।

यह बात तब तक छुपी रही जब तक एक दिन, कार्लोस केसटानो (एयूसी का मुख्य कमांडर) ने टीवी इंटरव्यू में इस बात का जिक्र न कर दिया।

यह बात मेरे अगवा हो जाने की घटना के कई महीनों बाद की है। उस दिन मेरे अधिकतर सहयोगियों को इस बात का पता चला। बहुत बुरा महसूस हो रहा था। मैं दो दिन तक काम पर नहीं जा सकी। फिर मैंने सबसे इस बारे में आगे कोई जिक्र नहीं करने का निवेदन किया, और सबने मेरी बात का मान रखा।

उस समय कोलंबिया में अपहरण आम बात थी, और ऐसे 90 फीसदी मामलों में यही सब होता था। इसलिए मैंने इस बारे में लिखना शुरू किया।

शुरुआत के पहले महीने, हर कहानी मेरे आंसुओं पर जाकर खत्म होती। मैंने खुद को भरोसा दिया कि मैं हार नहीं मानूंगीं क्योंकि मैने कुछ भी गलत नहीं किया था।

देश के उत्तरी भाग में अर्द्धसैनिक बलों और गुरिल्लाओं के बीच टकराव चल रहा था। मैंने वहां जाने की इच्छा जाहिर की- तब मेरे अपहरण की घटना को छह महीने हो गए थे।

अखबार में सुरक्षा कारणों से कोई इस आइडिया को लेकर बहुत उत्सुक नहीं था। फिर मैंने कार्लोस कास्टेनो को एक ई-मेल किया। बताया कि मैं वहां जाकर काम करना चाहती हूं। बस मुझे अर्द्धसैनिक बलों की ओर से गारंटी मिल जाए। उसने जवाब भेजा 'नो प्रॉब्लम' और मैं निकल पड़ी।

यह अग्नि परीक्षा साबित होने वाली थी क्योंकि वहां उन गुनाहगारों, अर्द्धसैनिक बलों से मुठभेड़ होनी थी।

मैंने जल्दी ही कुछ बेहद शुरुआती फैसले लिये। मैंने फैसला किया कि मैं अपने परिवार से खुद को पूरी तरह दूर रखूंगी। मैं अपनी मां के साथ रहने लगी। वह मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थी। मगर मैंने अपने दूसरे रिश्तेदारों से दूरी बनाए रखी। अपने पिता से फिर कभी बात नहीं की।

मैं अकेली ही अपने दर्द को संभालना और आगे बढ़ना चाहती थी। मैं किसी के लिए भी बोझ नहीं बनना चाहती थी।

पहले साल के दौरान मैंने मनोवैज्ञानिक की सहायता भी ली थी, मगर अंत में मैं इस नतीजे पर पहुंची कि इससे मुझे कोई मदद नहीं मिल रही है और मैंने इसे छोड़ दिया।

2011 में जाकर कहीं न्यायिक प्रक्रिया फिर से शुरू हुई और यह केवल इसलिए संभव हो सका कि मैंने अपने साथ हुए अपराध के खिलाफ आवाज उठाना तय कर लिया था।

अभी तो शुरूआत ही हुई थी और यह बेहद असहनीय साबित हो रहा था। क्योंकि मेरे अपहरण में वे लोग शामिल थे, जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थी। मैंने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए पूरी कोशिश की। अटॉर्नी जनरल तक से सीधी बात की।

ये सब कुछ करने के बाद भी अगर कुछ हल नहीं निकले तो यह कल्पना की जा सकती है कि दूसरे केसों का क्या होता होगा? कोलंबिया की यही समस्या है। अगर मेरे मामले में अपराधी को कोई सजा नहीं हुई, तो दूसरी औरतें क्या उम्मीद कर सकती हैं?''

बाद का घटनाक्रम
मिस बेदोया ने बलात्कार के तुरंत बाद पुलिस में शिकायत दर्ज की, मगर 11 साल गुजर जाने के बाद भी यह मामला जरा सा भी आगे नहीं बढ़ पाया। लिहाजा मई 2011 में, बेदोया ने मानवाधिकारों के अंतर-अमेरिकी आयोग के सामने इस मामले को उठाया। कोलंबिया अभियोजक कार्यालय तुरंत हरकत में आया। इसके फौरन बाद, एक भूतपूर्व अर्द्धसैनिक को गिरफ्तार कर लिया गया।

उसने अपहरण में अपनी भागीदारी कबूल कर ली। तब से, दो और संदिग्धों पर भी औपचारिक रूप से अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाए हैं। सितंबर 2012 में, अभियोजन पक्ष ने कहा कि मिस बेदोया के अगवा कर लिए जाने और बाद में उन पर किये जाने वाले अत्याचार और यौन उत्पीड़न को "मानवता के खिलाफ अपराध" की श्रेणी में रखा जाए।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि इस मामले में किसी भी सीमा में बंधने की जरूरत नहीं है - क्योंकि इसका इस्तेमाल अर्द्धसैनिक बलों ने "युद्ध के उस हथियार के रूप में किया जिसकी मदद से वे उन उठती हुई आवाजों को मौन कर देते हैं, जो उनकी ज्यादतियों और अतिक्रमण को बेनकाब करने का दुस्साहस करती हैं।"
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आज से पांच साल पहले लायला (काल्पनिक नाम) के एक रिश्तेदार ने शराब के नशे में उसके साथ बलात्कार किया।

उनकी आपबीती सुनिए उनकी ही ज़ुबानी:
"मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरा एक रिश्तेदार ही मेरे साथ इस तरह की ओछी हरकत करेगा। इस सच का सामना करना बहुत कठिन था मेरे लिए। मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था। मुझे विश्वास नहीं होता था कि ऐसा मेरे साथ हुआ है।

मैंने खुद को कमरे में बंद कर लिया। घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। लोगों से मिलना-जुलना और अपने रिश्तेदारों से बातें करनी बंद कर दी। जो हो चुका था, उसके बाद मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूं।

मैंने बलात्कार पीड़ितों की सहायता करने वाली संस्था से मदद मांगी। यह मेरे लिए सही साबित हुआ क्योंकि मुझे मेरा आत्म सम्मान वापस मिल गया और महसूस हुआ कि मैं बहिष्कृत नहीं हूं।

मुझे यह समझने में भी मदद मिली कि जो हुआ, उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी। उस हादसे के बारे में किसी को बताना बेहद सुकून भरा था।

मेरी मां ने मेरी खूब मदद की। इस पूरे संघर्ष के दौरान मेरे साथ खड़ी रही। लोग मेरे बारे में बुरा सोचने लगे हैं और पड़ोसी मुझसे बचते हैं। उनका मानना है कि मैंने स्वयं खुद को मुसीबत में डाला, इसलिए जो कुछ मेरे साथ हुआ, उसकी जिम्मेदार भी मैं ही हूं। वे मुझे पीड़िता के रूप में देखते ही नहीं।

मेरी मां मेरे साथ थी। उन्होंने मुझे फिर से पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। जीवन के प्रति मेरे नज़रिये में बदलाव लाकर एक नई शुरुआत के लिए उत्साहित किया।

मगर जो भी मेरे साथ हुआ, उसे भूल जाना बहुत मुश्किल है। मैं अक्सर बहुत कमजोर महसूस करने लगती हूं। मुझे किस तरह के नरकों से होकर गुजरना पड़ा, जब भी याद आता है, रो पड़ती हूं।

मेरा मानना है कि ऐसे जघन्य अपराध के लिए पांच साल की सजा बहुत छोटी है। एक बलात्कारी को मौत से कम की सजा नहीं होनी चाहिए।

उसने मुझे जो यातना दी और जिस तरह से मेरा जीवन बर्बाद किया, उन सबका असर आजीवन मेरे दिलो-दिमाग पर रहने वाला है।

कामना करती हूं कि किसी और लड़की को मेरे जैसे अनुभव से न गुजरना पड़े। कोई भी औरत इस तरह के दर्द और पीड़ा की हकदार नहीं होती। सरकार को ज़रूर जिम्मेदारी लेनी चाहिए और बलात्कार पीड़ितों को सहायता प्रदान करनी चाहिए, विशेषकर इस तरह के अपराधों में जहां अपराध का पीड़ित के ऊपर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।"
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वांगु कंजा के साथ 2002 में उस वक्त यह हादसा हुआ, जब वह अपने काम से घर लौट रही थी। रास्ते में कई दरिंदों ने मिलकर उसके साथ बलात्कार किया। वह किसी का चेहरा नहीं देख पाई क्योंकि उसका सिर जबरन नीचे झुका दिया गया था। अपने साथ हुए इस हादसे को भूलकर उसने बलात्कार और यौन शोषण की शिकार औरतों की मदद का संकल्प लिया... और नैरोबी में वांगु कंजा नामक संस्था की स्थापना की।

वांगु कंजा की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:
"तब मैं अकेली ही रहा करती थी। मैंने खुद को पूरे दो दिनों तक कमरे में बंद रखा। मगर कमरे का किराया और दूसरे बकायों का भुगतान करने के लिए मुझे मजबूरन बाहर आना पड़ा। कई दिनों तक मैं उस दर्दनाक घटना के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाई। धीरे-धीरे मैंने काम पर भी जाना शुरू कर दिया। मगर उस दहशत से उबर पाना मुश्किल हो रहा था।

मैं एक दु:स्वप्न में जी रही थी। हर वक्त घबरायी और उदास रहती। 2002 से 2005 तक मैं अवसाद में डूबी रही। खुद से दूर भागने के लिए शराब भी पीनी शुरू कर दी।

यह मेरे जीवन का वह मोड़ था, जहां मैं बिलकुल तनहा रह गई थी। मगर मुझे यह मंजूर नहीं था। मैंने मनोविज्ञान का कोर्स शुरू कर दिया। यह मेरे लिए महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्रैक्टिकल के दौरान मैंने बलात्कार और यौन उत्पीड़न की शिकार औरतों के साथ काम करना तय किया। ऐसे हादसों की शिकार औरतों को क्या सलाह-मशविरा दिया जाए, यह सीखने के क्रम में मेरी मानसिक स्थिति भी दुरुस्त होने लगी।

मेरे परिवार को मेरे बलात्कार के बारे में तब पता चला, जब उन्हें इसके बारे में अखबारों और लेखों में पढ़ने को मिला। जीवन के उस मोड़ पर घर वालों के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे नहीं थे और इस भयानक घटना से यह स्थिति और भी कठिन बन गई। शुरू-शुरू में तो वे लोग इस घटना को स्वीकार ही नहीं कर पाये।

मेरे आस-पास के लोगों को जब इस बारे में पता चला, वे मेरे साथ जरूरत से ज्यादा अच्छा व्यवहार करने लगे- जिसका अंतत: मुझ पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता। मुझे इन कठिन परिस्थितियों का सामना खुद ही करना था... अपने बलबूते।

इन मुश्किल हालातों में किसी दोस्त या परिवार ने मेरी मदद नहीं की। शुरुआत में केवल एक शख्स मेरी मदद को आगे आया, और वो मेरी आंटी थी। वे मुझे मेडिकल चेकअप के लिए ले गईं और कुछ खास सुविधाएं मुहैया करवाने में मेरी मदद की। मेरे लिए सूचना एकत्रित की और सलाह मांगी।

मैंने पुलिस को इस मामले की सूचना दी। वे लोग मुझे इस मामले को आगे ले जाने के लिए हतोत्साहित करने लगे। उन लोगों ने इस मामले की ढंग से रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की।

वे लगातार मुझ पर लगातार दबाव बनाते रहे कि मैं बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न करूं और सारे आरोप वापस ले लूं। बार बार जोर देते रहे कि मुझे रिपोर्ट दर्ज नहीं करनी चाहिए या आरोप नहीं लगाने चाहिए।

यही वजह है कि मुझे इस मामले में आगे की कार्रवाई जारी रखने और अपराधी को सजा दिलाने की कोई भी वजह नहीं दिखी। यह सब करने के बजाय, मैने अपना सारा ध्यान खुद को इस अवसाद से बाहर निकालने और बलात्कार और यौन शोषण की शिकार हो चुकी औरतों के लिए कुछ कर गुजरने में लगा दिया।

ऐसे मामलों में साथ की जरूरत होती है और इसीलिए मैंने 2005 में अपनी संस्था की नींव डाली।"
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देवीमाया (बदला हुआ नाम) पूर्वी नेपाल की रहने वाली है। देवीमाया और उसका पति कुवैत और सउदी अरब में नौकरी करते थे। 2008 में देवीमाया के साथ बलात्कार हुआ। वह गर्भवती हो गई। वहां से नेपाल लौटने के बाद उसने एक विकलांग बच्ची को जन्म दिया।

देवीमाया की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:
"मैंने बलात्कार के बारे में अपने पति को फोन पर बताया। वे उस समय सउदी अरब में थे। उन्होंने मुझे सांत्वना दी और कहा कि मुझे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि वे इस घटना के बारे में नेपाल में अपने माता-पिता से बात करेंगे। उन्हें मनाने की कोशिश करेंगे कि वे मेरे प्रति कोई दुर्भावना न रखें। क्योंकि जो हुआ इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी। मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी और घर लौटने के लिए बेचैन थी।

कुवैत में यह मामला पुलिस में दर्ज नहीं हो सका क्योंकि मेरे साथ बलात्कार करने वाले को मैं नहीं जानती थी। मैं यह भी नहीं जानती थी कि संबंधित अधिकारियों से कैसे मदद ली जाए। मैं कुवैत के एक घर में आया का काम कर रही थी। वहां की भाषा या स्थानीय तौर-तरीकों की मुझे कोई जानकारी नहीं थी। मदद के लिए किसे कहना है और कहां जाना है, यह भी मालूम नहीं था। मेरे मालिक मदद करने वालों में से नहीं थे।

घर वापस जाने के लिए दो महीने तक उनसे मिन्नतें करती रही, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी। जब उन्हें पता चला कि मैं पेट से हूं यानी गर्भवती हूँ, तब जाकर उन्होंने मुझे छोड़ा।

कुवैत से लौटने के बाद मैंने एक बच्ची को जन्म दिया, वह जन्म से विकलांग है। अब वह क़रीब तीन साल की है।

वापस घर आने के बाद मेरे मां-बाप ने मेरे ससुराल वालों से बात की। उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वे मुझे फिर से अपनाना चाहते हैं। उन्होंने मेरे पति से भी बात की। मेरे गर्भ के नौ महीने पूरे होने वाले थे। मेरे पति ने अपने मां-बाप को बताया कि वे मेरे बच्चे को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। वे मान गए और अपने साथ रहने की इजाज़त दे दी। मैं उन्हें कुवैत से पैसे भेजा करती थी।

मगर तीन-चार दिन बीतते ही अचानक उनका रवैया बदलने लगा। उन लोगों ने बातचीत करनी बंद कर दी और मेरे साथ गाली-गलौज करने लगे। यही नहीं, उन्होंने मुझे मारना-पीटना भी शुरू कर दिया। वे चाहते थे कि मैं उनके घर से चली जाऊं, मगर मैंने इनकार कर दिया।

इसके बाद उन्होंने घर का सारा सामान समेटा और निकल गए। आजकल वे कहीं और रह रहे हैं, मुझे नहीं पता कि कहां। हमारे आठ साल के बेटे को भी वे अपने साथ ले गए। तब से मेरे पति ने भी फोन करना बंद कर दिया। मुझे मालूम है कि वे मुझे अब प्यार नहीं करते। मेरे ससुराल वाले इस घर को बेचने की धमकी दे रहे हैं। मगर मैंने भी कानून की मदद ली। एक गैर सरकारी संस्था की मदद से अपने घर को बिकने से बचा लिया।

जब लोगों को पता चला कि मेरे साथ बलात्कार हुआ है तो अधिकांश लोगों का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया। उन लोगों ने मुझे काम देना बंद कर दिया। वे यह कह कर ताने देने लगे हैं कि मैं अपने साथ एक ‘मुसलमान बच्चा’ ले आई हूं। लोगों के इसी रवैये के चलते मैंने वहां से बहुत दूर जाकर काम करना शुरू कर दिया, जहां मेरे अतीत के बारे में कोई नहीं जानता।

जीवन बेहद कठिन हो गया है, मगर जब तक मौत नहीं आती मुझे जीना होगा, चलते रहना होगा।

मैंने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया है। मेरे घर वाले गरीब हैं, वे मेरा मनोबल बनाये रखने के अलावा मेरी किसी और तरह से मदद नहीं कर सकते।

मेरे पति के कुछ दूर के रिश्तेदार हैं, जो बड़े दयालु हैं। वे मेरे साथ सहानुभूति रखते हैं। उन्होंने अपनी जमीन के एक टुकड़े पर मुझे काम करने की इजाजत दे दी है। इस तरह मैं अपना और अपनी बच्ची का पेट पालने की कोशिश कर रही हूं।"
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नताल्या रुस में ही कहीं अपने पति और बेटी के साथ रहती है। उनके साथ 2007 में उस इंसान ने बलात्कार किया, जिससे उनकी एक महिला मित्र ने मिलवाया था। वे एक अपार्टमेंट में कुछ परिचितों से मिलने गए थे। उस महिला मित्र के वहां से निकल जाने के बाद नताल्या के साथ बलात्कार हुआ। उस बलात्कारी के दो दोस्त वहां मौजूद थे और उन्होंने इस बात की गवाही दी। वह आदमी दोषी पाया गया और उसे पांच साल कैद की सजा हुई। अब वह रिहा हो चुका है।

नताल्या की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:
"ऐसा कुछ होने पर, कुछ औरतें अपना जीवन खत्म कर देना चाहती हैं, कुछ शराब में डूब जाती हैं। मैंने दोनों किया। जब मैं शराब पीती थी, सब कुछ भूल जाती थी।

मगर फिर, जब नशा उतरता है, आपको पहले से भी बुरा महसूस होता है। लगता है सब कुछ खत्म हो गया। फिर यह ख्याल आता है कि भविष्य में... अब कभी आपको वह साथी नहीं मिलेगा जिससे आपको प्यार हो जाएगा और जिससे आप शादी कर सकेंगे।

इस घटना के होने के एक या दो सप्ताह के बाद, मैंने अपनी बिल्डिंग की छठी मंजिल से कूद कर जान देने की कोशिश की। मेरे दोस्त को मेरी हालत का जब अंदाजा हुआ, उसने कहा कि मुझे इस बारे में कुछ करना चाहिए। मुझे किसी मनोविश्लेषक की मदद लेनी चाहिए।

मेरे दोस्त मुझे अकेला छोड़ने से डरते थे। हम सबने मिलकर, वूमेन हॉटलाइन को फ़ोन किया और उनके बताये अनुसार वूमेन क्राइसिस सेंटर पहुंचे। वहां सलाह दी गई कि मुझे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करनी चाहिए, मगर मैं इससे खुद ही निपटना चाहती थी।

मैंने सोचा था कि अपने कुछ दोस्तों से उस आदमी को ढूंढने के लिए कहूंगी और फिर उसकी जमकर पिटाई करके अपना बदला ले लूंगी।

आखिर में हम अभियोजन पक्ष के वकील के पास गए। पुलिस में जाने के बाद अगला चरण यही होता है। मुझे लगा कि यह सबसे कारगर उपाय है- उन्होंने मामले पर फौरन काम करना शुरू कर दिया। उस अभियोक्ता ने हमें पुलिस के पास भेजा।

हैरानी की बात है कि पुलिस स्टेशन में मेरे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं हुआ। उनका रवैया अच्छा था। क्राइसिस सेंटर के मनोविश्लेषक ने मेरा साथ दिया, पूछताछ के दौरान वह मेरे साथ बना रहा।

आमतौर पर, मैं अपने साथ हुए इस हादसे के बारे में किसी से बात नहीं करती थी। इसके बारे में अपनी मां तक को मैंने 2008 में जानकारी दी। वह रो पड़ी।

उसने बताया कि ऐसा ही कुछ उसके साथ भी हो चुका है। वह पूरी तरह मेरे साथ थी। मेरे पति इस बारे में जानते हैं। समय आने पर अपने पड़ोसियों को भी मैंने सब कुछ बता दिया।

मुझे लगता है कि अधिकारियों ने वह सब किया, जो वे कर सकते थे बल्कि मेरे मामले में ज्यादा ही प्रयास किया।

मुझे अच्छी तरह पता है कि रूस में ऐसा हमेशा नहीं होता। मैं भाग्यशाली निकली। जज मेरे हालात समझ रहे थे, वकील भी बढ़िया आदमी था। वे सभी पुरुष थे। इस सच्चाई को जानने के बाद भी कि मैं एक छात्रा थी और वहां अपनी मर्जी से गई और खुद को मुसीबत में डाला था, सबने मेरी मदद की।

अंतत: जब फैसला सुनाया गया, ऐसा महसूस हुआ मानो सीने से कोई भारी बोझ हट गया हो।

मैं रो पड़ी। ये खुशी के आंसू थे। ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरा जीवन अब शुरू हो हुआ है और मैं क्राइसिस सेंटर कभी गई ही नहीं। उस समय मैं कानून की छात्रा थी, इसलिए मुझे अपने अधिकारों की भी जानकारी थी।
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मैं शहर लौट गई। वहां अपने होने वाले पति से मिली। शादी की। और एक दूसरे शहर की ओर चल पड़े, जहां हम अभी रहते हैं। मेरी एक बेटी है। मैं आज कामयाब हूं।"
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