लोग कपड़े डिजाइन करते हैं, जूते-चप्पल डिजाइन करते हैं, इंजन डिजाइन करते हैं, मकान डिजाइन करतें हैं, कारों को खूबसूरत बनाते हैं- ऊपर वाले ने पूरी कायनात ही डिजाइन कर डाली है।
फिल्मों में आपने अलग ही दुनिया देखी है। अंतरिक्ष में बसे भयानक लोग। धरती को तबाह करने की तैयारी करते स्पेसशिप, आधे इंसान और आधे मशीन जैसे जीव, बड़ी-बड़ी मशीनें, आपने बहुत-सी साइंस फिक्शन फिल्में भी देखी होंगी।
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हिंदुस्तान में तो ऐसी फिल्में कम बनी हैं। मगर, हॉलीवुड ने ख्वाबों की दुनिया पर बहुत-सी फिल्में बनाई हैं। इनमें से कई सुहानी हैं, तो कई बेहद डरावनी भी। इन फिल्मों में एक ऐसी दुनिया का आभास होता है, जो फिलहाल तो कहीं नहीं है।
लेकिन साइंस अगर उस हद तक तरक्की कर ले तो उसका वजूद में आना हैरत की बात नहीं होगी। कई बार तो धरती से दूर किसी और ग्रह पर जिंदगी का तसव्वुर दिखाया गया है।
अंतरिक्ष में कॉलोनियां
Space Ship
सवाल उठता है जो दुनिया अभी कहीं है ही नहीं, उसकी कल्पना आखिर कैसे और कौन करता है? यूं तो फंतासी की दुनिया बहुत से लेखक शब्दों के जरिए गढ़ते आए हैं। लेकिन इन्हें रूप-रंग पहनाने का काम अक्सर विजुअल आर्टिस्ट करते हैं।
ऐसे ही एक शख्स हैं अमरीका के सिड मीड। मीड विज़ुअल फ्यूचरिस्ट हैं। उन्होंने अंतरिक्ष में घर, जंगल, कॉलोनियों के जो फिल्मी डिजाइन बनाए वो हैरान करने वाले हैं। इतने यकीनी कि इन्हें फिल्म में देखकर कोई ये नहीं कह सकता कि ये नकली या बनावटी है।
सिड के इन्हीं डिजाइन ने हॉलीवुड के दिग्गजों को यकीन दिलाया कि इनका इस्तेमाल बड़े पर्दे के लिए बखूबी किया जा सकता है। सिड की मदद से ही ब्लेड रनर, स्टार ट्रेक, एलियंस और ट्रॉन और एलीशियम जैसी फिल्में बनाई गईं।
खुद की कंपनी
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विजुअल फ्यूचरिस्ट बनने से पहले सिड को गाड़ियां बनाने का जुनून था। उन्होंने अपना करियर फोर्ड कंपनी से शुरू किया था। 1970 में उन्होंने खुद की अपनी शुरू की। सिड की कंपनी को सबसे पहला काम हॉलैंड में फिलिप्स कंपनी के लिए कैसेट रिकॉर्डर बनाने का मिला।
1975 में वो दक्षिण कैलिफोर्निया आ गए और पैरामाउंट पिक्चर्स के साथ काम करना शुरू कर दिया। जब मीड ने कंपनी को यकीन दिलाया कि वो ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिसका अभी लोगों ने तसव्वुर तक नहीं किया है, तो कंपनी ने उनके साथ पांच साल के लिए करार कर लिया।
1979 में स्टार ट्रेक- द मोशन पिक्चर रिलीज हुई। इस फिल्म में एक बड़े से अंतरिक्ष यान को दिखाया गया था जिससे जमीन को खतरा है। दरअसल ये फिल्म, टेलिविजन पर दिखाई जाने वाली एक सिरीज का ही अगला हिस्सा थी।
नैपकिन पर डिजाइन
Virtual
मीड ने इस फिल्म में जिस स्पेसशिप को दिखाया वो दर्शकों के लिए एक नई चीज थी। इस अंतरिक्ष यान का डिजाइन मीड ने एक होटल में खड़े-खड़े, एक नैपकिन पर बनाया था।
लेकिन इसे 42 फुट लंबे मॉडल के तौर पर बनाया जाना था। जब कैमरे इस मॉडल को शूट करते तो इसका साइज बेपनाह बड़ा नजर आता।
स्टार ट्रेक की रिलीज के बाद दूसरी कंपनियों ने भी मीड से काम कराना शुरू कर दिया। स्टार ट्रेक के निर्माता जीन रॉडेनबेरी अगली पीढ़ी की टीवी सिरीज के लिए मीड के साथ काम करने की ख्वाहिश जाहिर की। लेकिन रॉडेनबेरी की एक शर्त थी कि प्रोडक्शन का सारा काम स्टार ट्रेक के ऑफिस में ही होगा।
मीड ने अपनी मर्जी के मुताबिक काम करने में यकीन रखते हैं। उन्हें ये ऑफर पसंद नहीं आया और उन्होंने मना कर दिया। बाद में इस प्रोजेक्ट पर मीड के ही एक दोस्त ने काम किया।
मीड कहते हैं कि वो जो कुछ भी डिजाइन करते हैं, उसके साथ सबसे बड़ी चुनौती होती है उसे यकीनी बनाने की। उनकी कोशिश होती है कि वो जिस तरह के हथियार, रॉकेट, शिप या वॉर रूम डिजाइन कर रहे हैं, वो कहानी के साथ पूरा इंसाफ करें। उनकी डिजाइन की हुई कोई भी चीज किसी भी लिहाज से कहानी की अहमियत को कम ना करे।
अंतरिक्ष कॉलोनी की कल्पना
Hollywood
साथ ही मीड इस बात पर भी जोर देते हैं कि कहानी और तस्वीरों के बीच बैलेंस ज़रूर रहे। मिसाल के लिए 2013 में मैट डैमन की फिल्म एलीशियम के लिए मीड से एक अंतरिक्ष कॉलोनी की कल्पना करने को कहा गया जहां से धरती नजर आए।
इस कॉलोनी में बड़े-बड़े आलीशान घर दिखाने के साथ अंतरिक्ष में एक आदर्शवादी दुनिया की कल्पना करनी थी- जहां झीलें हों, पहाड़ हों और ऊंचे दर्जे का जीवन हो। अब ऐसी दुनिया अगर दिखानी है तो उसमें गुरुत्वाकर्षण होना भी जरूरी था। अब गुरत्वाकर्षण कितना हो, जो यकीनी लगे। ये एक बड़ी चुनौती थी।
इसके लिए मीड ने अपने एक दोस्त की मदद ली जो नासा की जेट प्रोपल्शन लैब में काम करता था। उसने मीड को बताया कि ये ग्रह ऐसा हो, जो अपनी धुरी पर ढाई मिनट में एक चक्कर पूरा कर ले। हालांकि फिल्म में हरेक चीज साइंस के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं थी।
फिल्म हकीकत नहीं
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यही वजह थी कि फिल्म के प्रचार के वक्त कुछ लोगों ने कहा भी कि ये साइंस के हिसाब से गलत है। लेकिन मीड के पास इसका माकूल जवाब था। उन्होंने कहा कि, भाई ये फिल्म है, हकीकत नहीं।
ख्वाबों को हकीकत बनाने के लिए कई बार सच्चाई से दो कदम आगे जाना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो कल्पना को पर्दे पर लाना आसान नहीं होगा। कोशिश रहती है कि हरेक चीज को सच्चाई के नजदीक लाया जाए। लेकिन हमेशा ऐसा हू-ब-हू होना मुमकिन नहीं होता।
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इंसान ने कई बार कल्पना के घोड़े इतने तेज़ दौड़ाए हैं, जो हकीकत में तब्दील हुई है। क्या पता, जिस दुनिया के मॉडल हमने सिड मीड के हाथों बनते देखे हैं, वो कभी हकीकत बन जाएं।