ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने सोमवार को बताया है कि उसकी वैक्सीन कोरोना को रोकने में 90 फीसदी असरदार रही है। वैक्सीन को यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट ने विकसित किया है। यही इंस्टीट्यूट मलेरिया, टीबी और इबोला की वैक्सीन विकसित कर चुका है। वैक्सीन बनाने वाली टीम में पांच प्रमुख वैज्ञानिक हैं। यूनिवर्सिटी ने इन्हें फैंटास्टिक फाइव कहा है। इनमें से एक माउंट एवरेस्ट भी चढ़ चुके हैं। इनके अतिरिक्त टीम में एक भारतीय वैज्ञानिक एकता भी शामिल हैं।
कम नंबर आए तो मेडिकल में प्रवेश नहीं मिल पाया था
प्रो. कैटी ईवर मेडिकल में दाखिले के लिए अच्छे नंबर नहीं ला पाईं, पर सपने नहीं बिखरने दिए। बॉयोलॉजी लिया और माइक्रो बॉयोलॉजिस्ट बनीं। इम्यूनोलॉजी से नफरत रही, पर संक्रामक बीमारियों पर अध्ययन की तरफ आकर्षित हुईं। ऑक्सफोर्ड में 13 साल मलेरिया टीके पर काम किया। कोरोना टीका बनाने के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल बंद किया।
ट्रिपलेट्स की मां, उनके साथ रात में 4 घंटे बिताए
सारा गिलबर्ट वैक्सीन बनाने वाली टीम की लीडर। 25 साल का अनुभव। 1962 में जन्मी सारा तीन जुड़वा बच्चों ( ट्रिपलेट्स ) की मां हैं। हालांकि अब तीनों यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। फ्लू का टीका बना चुकी हैं। घर व काम में सामंजस्य बैठाती हैं। कहती हैं कि ऐसे कठिन काम में तीन बच्चों के साथ बिताने के लिए 4 घंटे भी मिलें तो पर्याप्त है।
अस्पताल में अंकल को देख वैक्सीन के फील्ड में आ गए एड्रियन हिल
आयरलैंड के वैक्सीनोलॉजिस्ट एड्रियन हिल, वैक्सीन बनाने वाली जेनर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर। 1980 में जिम्बॉम्वे के एक अस्पताल में प्रीस्ट के रूप में काम कर रहे अंकल से मिलने गए, तब वैक्सीन के प्रति ललक जगी। वे कहते हैं, मैं लौटा तो आश्चर्यचकित था। इंग्लैंड और आयरलैंड में ऐसी बीमारियां नहीं थीं।
माउंट एवरेस्ट फतह कर चुके, 500 किताबें लिखीं
एंड्रयू पोलार्ड वैक्सीन ग्रुप के डायरेक्टर हैं। 46 रिसर्च पेपर छप चुके हैं। 37 स्टूडेंट पीएचडी कर चुके हैं। संक्रामक रोगों व पीडियाट्रिक पर 500 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। 1988 में 6632 मीटर ऊंची जोन्वली और 1991 में 7309 मीटर ऊंची चामलांग चोटी पर चढ़ चुके हैं। 1994 में एवरेस्ट फतह कर चुके हैं।
रचनात्मक करना चाहती थीं, जिससे ऊर्जा मिले
जेनर इंस्टीट्यूट की एसोसिएट प्रोफेसर टेरेसा लाम्बे ईबोला टीके पर काम कर चुकी हैं। 2002 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ी। पति और बच्चों के समय बिताना पसंद करती हैं। कहती हैं- महामारी के दौर में कुछ रचनात्मक करना चाहती थी। मदद करना चाहती थी। बस इसी बात से ऊर्जा मिलती रही ।