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भारत और इसराइल का गोपनीय प्रेम संबंध तो नहीं?

Sat, 30 Dec 2017 03:27 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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2003 में भारत के दौरे पर आए तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
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2003 में तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन के भारत दौरे के बाद सितंबर 2014 में न्यूयॉर्क में दोनों देश के बीच उच्चस्तरीय बैठक हुई। तब प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा था कि अब आसमान सीमित हो गया है। 
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बिन्यामिन के आसमान सीमित होने वाले बयान को भारत और इसराइल के बीच चोरी छुपे प्रेम संबंध में खुलापन आने से जोड़ा गया था। अगले साल इसका असर भी दिखा। जुलाई 2015 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इसराइल के खिलाफ निंदा प्रस्ताव की वोटिंग से खुद को अलग रखा। 


भारत के इस कदम का भारत में इसराइली राजदूत डेनियल कैरमोन ने स्वागत किया था। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2006 में इसराइल जा चुके थे और जब वो प्रधानमंत्री के रूप में इसराइली पीएम नेतन्याहू से पहली बार मिले तो उन्हें बतौर राष्ट्र प्रमुख इसराइल आने का न्योता मिला। भारत में भी लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मोदी काल में इसराइल और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित मानदंडों से अलग होने जा रही है।
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लेकिन इसी महीने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा यरूशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में दी गई मान्यता को ख़ारिज करने का प्रस्ताव आया तो भारत ने इसराइल के ख़िलाफ वोट किया। भारत के इस रुख़ से पीएम मोदी की पार्टी में सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेताओं को तकलीफ भी हुई। स्वामी ने कहा कि भारत ने इसराइल के ख़िलाफ वोट देकर बड़ी ग़लती की है। उन्होंने कहा कि कश्मीर पर इसराइल एकमात्र ऐसा देश है जो भारत का खुलकर समर्थन करता है।

भारत ने ऐसा तब किया जब अगले महीने यानी जनवरी के दूसरे हफ़्ते में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आ रहे हैं। क्या भारत के इस रुख़ से दोनों देशों के बीच आई गर्मजोशी को झटका लगेगा? भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं, ''भारत ने इसराइल के ख़िलाफ वोट कर चौंकाया नहीं है।

चौंकाया तो ट्रंप ने कि अचानक यरूशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी। ट्रंप के इस फैसले का साथ उनके सहयोगियों ने भी नहीं दिया. भारत ने बिल्कुल सोच समझकर फैसला लिया है और यह कोई चौंकाने वाला नहीं है। अब तो अरब के देश भी फलस्तीनियों और इसराइल के बीच संतुलन बैठाकर चल रहे हैं। जाहिर है भारत को भी इस तरह की स्पेस चाहिए।''

विदेश नीति पर नेहरू की छाया

jawaharlal nehru
भारत और इसराइल के संबंधों को लेकर कहा जाता है कि दोनों देशों के बीच गोपनीय प्रेम संबंध हैं. कंवल सिब्बल कहते हैं कि यह बात अब पुरानी हो गई। उन्होंने कहा, ''दोनों देश में अब खुला प्रेम संबंध हैं। भारतीय प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं, इसराइली प्रधानमंत्री यहां आ रहे हैं। मोदी और नेतन्याहू के बीच कई मुलाकातें हो चुकी हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों में बढ़ोतरी हुई है। अब इसमें क्या गोपनीयता है?''

यरूशलम को राजधानी बनाने की अमरीकी घोषणा को ख़ारिज करने के पक्ष में भारत समेत 128 देशों ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में वोट किया। भारत ने भी वोट कर जाहिर कर दिया है कि वो अपनी विदेश नीति के स्थापित सिद्धांतों की बुनियाद के आधार पर ही आगे बढ़ेगा। भारत का यह कदम काफी अहम है और इसकी कई वजहें भी हैं।

विदेश नीति पर नेहरू की छाया
नेहरूयुगीन विदेश नीति जिसमें तीसरी दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांत अहम हैं, के आधार पर भारत फ़लस्तीनियों का खुलकर समर्थन करता रहा है। भारत ने 1950 में इसराइल को एक स्टेट के रूप में मान्यता दी थी। 1992 में भारत ने इसराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। हालांकि इसके बावजूद भारत ने इसराइल के साथ संबंधों को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखाया।

भारत इसराइल को खुलकर गले लगाने से परहेज करता रहा। भारत का अरब के देशों के काफ़ी अच्छे संबंध रहे हैं और इस कारण भी इसराइल के साथ खुलकर आगे बढ़ने में भारत संकोच करता रहा है। अरब देशों में बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमान काम करते हैं। कई विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि भारत जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत किरदार के रूप में उभरता गया वैसे-वैसै अपने हित आधारित नीतियों को अपनाता गया।

 शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने नई करवट ली और भारत ने खुद को अंतरराष्ट्रीय परिधि के मध्य में लाया। मध्य-पूर्व में भी भारत ने अपने हितों के हिसाब से नीतियों को अपनाया। व्यवसाय, सुरक्षा, ऊर्जा और राजनयिक हितों के लिहाज से मध्य-पूर्व भारत के लिए काफ़ी खास है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2016-17 में अरब देशों से भारत का व्यापार 121 अरब डॉलर का रहा।

यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का 18.25 फ़ीसदी हिस्सा है। वहीं इसराइल के साथ भारत का व्यापार पांच अरब डॉलर का था जो कि कुल व्यापार का एक फ़ीसदी भी हिस्सा नहीं है. भारत का इसराइल के साथ सुरक्षा संबंध काफ़ी गहरे हैं जबकि अरब के देश रोजगार, विदेशी मुद्रा और ऊर्जा के लिहाज से काफ़ी अहम हैं।

बीजेपी और इसराइल

benjamin netanyahu - फोटो : benjamin netanyahu
मोदी काल में भारत, इसराइल और अमरीका इतने क़रीब आए कि इसराइल के पक्ष में कई लोग वोट की उम्मीद कर रहे थे। भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा का इसराइल के साथ शुरू से ही सहानुभूति रही है। इससे पहल भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के बीच भी इसराइल विरोधी प्रस्तावों को हावी नहीं होने दिया है। वहीं 2015 में भारत यूएन में इसराइल के खिलाफ एक प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान मौजूद नहीं रहा था।

इसी साल भारत के दौरे पर फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास आए थे और पीएम मोदी ने फ़लस्तीनी चिंताओं का समर्थन किया था। मोदी ने शांतिपूर्ण इसराइल के साथ संप्रभु, स्वतंत्र और एकजुट फ़लस्तीन की बात कही थी। इसराइल के मामले में मोदी ने तब स्पष्ट संकेत दिया जब वो इसी साल जुलाई में इसराइल के दौरे पर गए। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा था।

अरब के साथ इसराइल से दोस्ती
हालांकि मोदी ने अरब देशों के साथ भी राजनयिक संबंधों में गर्माहट भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसराइल जाने से पहले वो कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा कर चुके थे। गणतंत्र दिवस पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित भी किया है।

ये सब मोदी के इसराइल जाने से पहले हुआ था. इसराइल के ख़िलाफ वोट देकर भारत ने यह जताने की कोशिश की है कि वो मूल रूप से फ़लस्तीनियों को लेकर द्वी-राष्ट्र सिद्धांत के समाधान के साथ अब भी है। जब पीएम मोदी इसराइल के दौरे पर गए थे तो फलस्तीनी क्षेत्र रामल्ला नहीं गए थे। क्या भारत कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की तरह वोटिंग में हिस्सा ना लेकर यरूशलम पर ट्रंप की घोषणा का विरोध नहीं कर सकता था? अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और बीजेपी नेता शेषाद्री चारी कहते हैं, ''इसराइल के साथ भारत अपना संबंध अमरीकी चश्मे से नहीं देख सकता। इसराइल से जो हमारे संबंध हैं उनमें कोई कमी नहीं आएगी, लेकिन हम फलस्तीनी चिंता को ख़ारिज नहीं कर सकते।''

''हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और हमारे अपने हित हैं। जिस तरह से अमरीका ने यरूशलम को लेकर स्वतः फ़ैसला लिया हम उसका कैसे साथ दे सकते थे?'' सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि इसराइल के पक्ष में वोट करना चाहिए था, क्योंकि इसराइल एकमात्र ऐसा देश है जिसने कश्मीर पर भारत का साथ दिया था। इस पर शेषाद्री चारी कहते हैं, ''यूएन काउंसिल में रूस ने भी कश्मीर पर वीटो किया है। हमारा साथ कई और देशों ने भी दिया है। भारत का यह फैसला न तो इसराइल के लिए चौंकाने वाला है और न ही अमरीका के लिए।''
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सरकारें बदलती हैं पर विदेश नीति नहीं

Benjamin Netanyahu and wife Sara
इसराइल पर नीतियों को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में कोई फर्क़ है? चारी कहते हैं, ''सरकार चाहे जो भी रहे देश में विदेश नीति, आर्थिक नीति और कूटनीति में कोई फर्क नहीं आता है।'' कई विशेषज्ञ भारत के इस कदम को उस रूप में भी देख रहे हैं कि इसराइल के साथ मेलजोल बढ़ाने का मतलब मुसलमान विरोधी होना नहीं है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का रुख यथार्थवादी था और इस पर अंध हिन्दुत्व हावी नहीं हुआ।

इसके साथ ही भारत ने यह भी संदेश दिया है कि वो विदेश नीति में किसी के मातहत होकर काम नहीं करेगा और अपने हितों को सर्वोपरि रखेगा। मध्य-पूर्व में भारत एक ख़ास स्थिति में है। भारत एक साथ इसराइल, ईरान और सऊदी तीनों के साथ संबंध रख रहा है। शीत युद्ध की शुरुआत में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 के बांदुंग सम्मेलन में इसराइल को आमंत्रित करने पर विचार किया था। हालांकि बाद में उन्होंने इरादा बदल दिया था। शीत युद्ध के बाद दुनिया का समीकरण बदला और भारत ने इसराइल से सैन्य संबंध बढ़ाना शुरू किया।

1960 से ही इसराइल से याराना
यह 1960 के दशक से ही शुरू हो गया था। इसराइल ने न केवल भारत को 1962, 1965 और 1971 में सैन्य मदद की बल्कि वो पहला देश था जिसने 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद बांग्लादेश को मान्यता दी थी। अगस्त 1977 में मोरारजी देसाई के वक़्त में इसराइली विदेश मोशे का दायान भारत में एक गोपनीय दौरा हुआ था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में गर्माहट आई।

हालांकि इंदिरा गांधी अपने पिता की राह पर ही चलीं और उनकी विदेश नीति में फलस्तीनी करीबी बने रहे। इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी 1985 में संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक आम सभा में इसराइली प्रधानमंत्री से मिले। किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इसराइली प्रधानमंत्री से यह पहली मुलाकात थी। कहा जाता है कि उस वक़्त भारत पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिंतित था और इसलिए इसराइल के साथ जाने में संकोच को पीछे छोड़ना ठीक समझा। 

भारत में 1991 में आर्थिक उदारीकरण को अंजाम दिया गया और उसी दौरान इसराइल से औपचारिक राजनयिक संबंध भी स्थापित हुआ। देश में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है तो इसराइल से संबंध बढ़ाने की बात कही जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अरब देशों को नाराज कर सबंधों को आगे बढ़ाया जाता है। 

1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से 2000 में पहली बार लालकृष्ण आडवाणी एक वरिष्ठ मंत्री की हस्ती से इसराइल गए थे। उसी साल आतंकवाद पर एक इंडो-इसराइली जॉइंट वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया। 2003 में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने अमरीकी यहूदी कमिटी में एक भाषण दिया और उन्होंने इस्लामिक अतिवाद से लड़ने के लिए भारत, इसराइल और अमरीका के साथ आने की वकालत की।
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