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वैज्ञानिकों का कमाल, लैब में विकसित किया इंसानी दिमाग

Sun, 10 Jul 2016 08:30 AM IST
न्यूयॉर्क/टाइम्स न्यूज सर्विस लौसेन
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आकार तिल जितना, लेकिन क्षमताएं इंसानी दिमाग जैसी। स्विट्जरलैंड में वैज्ञानिकों ने इंसानी दिमाग की प्रतिकृति प्रयोगशाला में तैयार करने का कारनामा कर दिखाया है। इंसानी दिमाग की तरह ही पेन की नोक से भी छोटा यह ‘मिनी ब्रेन’ दवाइयों व अन्य चीजों के संपर्क में आने से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसकी मदद से वे एल्जाइमर, पार्किंसंस व अन्य रोगों का सफल इलाज ढूंढने में कामयाब हो सकेंगे।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले पांच सालों में ऐसी तकनीक तैयार कर ली गई है, जिसके बूते हजारों मिनी ब्रेन तैयार किए जा सकते हैं। इनका आकार 350 माइक्रोमीटर जितना है। ऑर्गनॉइड्स नाम के ये इंसानी दिमाग की प्रतिकृति जल्द बाजार में उतरने को तैयार है।

ऑर्गनॉइड्स भले ही इंसानी दिमाग जैसे हैं, लेकिन इनकी क्षमताएं सीमित हैं। बाल्टीमोर स्थित जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर थॉमस हर्टुंग कहते हैं कि इन ऑर्गनॉइड्स पर नई दवाइयों के टेस्ट किए जा सकते हैं और उसके बूते इंसानी शरीर व दिमाग पर उनसे पड़ने वाले असर को परखा जा सकता है। इससे दवाइयों की टेस्ट के लिए जानवरों के इस्तेमाल में भी कमी आएगी।
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इन मिनी ब्रेन को प्लूरोपोटेंट कोशिका की मदद से तैयार किया गया है। इस कोशिका में यह क्षमता होती है कि यह किसी भी ऊतक में परिवर्तित हो सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक एक थ्रीडी ऑर्गनॉइड को स्टेम कोशिका से भी तैयार किया जा सकता है।

हालांकि कनाडा की डलहौजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन फ्रैंप्टन सोचते हैं कि इन मिनी ब्रेन को दवाइयों की जांच में जानवरों की जगह लेने में अभी काफी वक्त लगेगा। उनके मुताबिक इनमें इंसानी मस्तिष्क की जटिलताएं नहीं हैं।  
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मिनी ब्रेन को भी होती है ऑक्सीजन की जरूरत

ये ऑर्गनॉइड्स भले ही प्रयोगशाला में तैयार किए जाते हैं, लेकिन इन्हें भी इंसानी दिमाग की तरह ऑक्सीजन की जरूरत होती है। इन कोशिकाओं को बाहरी माध्यमों से ये मुहैया की जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इनमें अभी इंसानी दिमाग जितनी पूरी क्षमताएं नहीं हैं, लेकिन ये भी असली मस्तिष्क की तरह दूसरी कोशिकाओं के साथ संपर्क साध सकते हैं।

कैंसर का इलाज खोजने में हो सकता है मददगार 
इन मिनी ब्रेन पर जिका वायरस का सफल परीक्षण किया जा चुका है। वैज्ञानिक अब इन्हें एल्जाइमर, कैंसर और पार्किंसंस डिजीज जैसे रोगों का इलाज खोजने के लिए भी इस्तेमाल में लाने की तैयारी में हैं।  
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