करीब दो दशक पहले हूगो चावेज ने जिस वेनेजुएला को क्रांति के रथ पर सवार होकर तेल कंपनियों के मकड़ जाल से बाहर निकाला था वो अब बदहाली और मुश्किलों की ऐसी आंधी में घिरा है जिसके सामने बचाव के लिए कोई दीवार नजर नहीं आती।
चावेज के उत्तराधिकारी निकोलस मदुरो की नीतियों से देश आर्थिक मुश्किलों के साथ बड़ी राजनीतिक परेशानी का दौर भी देख रहा है। देश में लोग जरूरी चीजों का संकट देख रहे हैं और राजनीतिक नेतृत्व अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है।
पेट्रोलियम की गिरती कीमतों ने सबसे ज्यादा वेनेज़ुएला को किया परेशान
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चावेज ने देश की बागडोर संभालने के बाद बहुसंख्यक जनता को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया था। गरीब तबके की सेहत, शिक्षा और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए चावेज ने तेल कंपनियों के राजस्व में से बड़ी हिस्सेदारी मांगी और खुले दिल से उन पर खर्च किया।
वेनेज़ुएला: पेट्रोल के दाम 60 गुना बढ़े, 28 मरे
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वेनेज़ुएला में भारत के राजदूत रहे दीपक भोजवानी बताते हैं, "हूगो चावेज़ ने देश का राष्ट्रपति बनने के बाद पूरा नक्शा बदल दिया, कई कंपनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, टैक्स बढ़ाए और गरीबों की सेहत, शिक्षा, आवास के लिए सरकारी खर्चे से खूब काम किया।"
सामाजिक क्षेत्र में इस दरियादिली ने चावेज को तेल के धनी देश का मसीहा बना दिया
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें जब तक चढ़ती रहीं तब तक तो सब ठीक रहा लेकिन गिरती कीमतों ने वेनेज़ुएला के सामने मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। महंगाई आसमान पर है, रोजमर्रा की जरूरी चीजों के लिए लोग तरस रहे हैं और अर्थव्यवस्था की रीढ़ तेल का उत्पादन दिनों-दिन कम होता जा रहा है।
दीपक भोजवानी कहते हैं, "वहां तेल के अलावा और कोई घरेलू उद्योग तो है नहीं। सब चीजों के लिए आयात ही एकमात्र जरिया है, तेल की कीमत गिरने के बाद पैसे नहीं हैं लोगों के पास। कोई आमदनी नहीं तो फिर आयात के लिए पैसा कहां से दिया जाए। दवा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी दिक्कत हो रही है।"
सऊदी अरब से ज्यादा तेल
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वेनेज़ुएला में सऊदी अरब से ज्यादा बड़ा तेल का भंडार मौजूद है। हालांकि यहां के तेल की किस्म थोड़ी अलग है जिसे भारी पेट्रोलियम कहा जाता है। भारी पेट्रोलियम को रिफाइन करना कुछ मुश्किल और खर्चीला है। यही वजह है कि दूसरे देशों की तुलना में वेनेज़ुएला के कच्चे तेल की कीमत कम है।
भारत समेत दुनिया भर की कंपनियां यहां तेल की खुदाई में शामिल हैं। चावेज ने सुधारों को लागू कर तेल कंपनियों को भी अपने नियंत्रण में लिया लेकिन कोई और उद्योग यहां खड़ा नहीं हो सका। अब जब तेल का उत्पादन कम हो रहा है तो लोगों के पास ना तो काम है, ना आमदनी का कोई और जरिया। ऐसे में बदहाली ने हर तरफ अपना डेरा बसा लिया है।
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ फॉरेन स्टडीज के प्रोफेसर अब्दुल नाफे इसके लिए विदेशी कंपनियों और देश के मध्यमवर्ग को भी जिम्मेदार मानते हैं। नाफे कहते हैं, "एक तो सरकार का सामाजिक खर्च बहुत ज्यादा है, दूसरे तेल की कंपनियां और मध्यमवर्गीय चावेज विरोधियों ने एक तरह का आर्थिक गृहयुद्ध छेड़ रखा है। बीते साठ सालों में जो लोग तेल के मुनाफे पर कब्जा जमाए थे वो लोग विरोधी रवैया अपनाए हुए हैं। अगर इन लोगों का रुख सकारात्मक रहता तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती।"
करीबियों पर भरोसा
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चावेज के दौर में तेल कंपनियों के प्रबंधन में भारी फेरबदल हुआ। विदेशी और पेशेवर लोगों को हटा कर चावेज ने स्थानीय और अपने भरोसेमंद लोगों को अहम पदों पर बिठाया। अब वहां तेल से जुड़े मामलों में सरकारी कंपनी पीडीवीएसए का दबदबा है लेकिन फिलहाल वो खुद अपने कर्जे चुकाने में असमर्थ है।
कई जानकारों की नजर में चावेज की नीतियों से भी तेल उद्योग को नुकसान पहुंचा। दीपक भोजवानी बताते हैं, "चावेज ने एक ही झटके में पीडीवीएसए के 18000 लोग निकाल दिए इस वजह से कंपनी वो काम भी नहीं कर पाई जो वो कर सकती थी। विदेशी कंपनियों पर शिकंजा कसा तो बहुत सी कंपनियों ने बाहर का रुख कर लिया। स्थानीय स्तर पर इतनी क्षमता विकसित हुई नहीं कि तेल को रिफाइन किया जाए तो यही होना था, जहां पहले 30 लाख बैरल रोज निकलता था वहां ढाई लाख बैरल भी नहीं निकल रहा।" हालांकि चावेज की नीतियों के कारण ही कई दूसरे देशों की कंपनियों को यहां आने का मौका मिला इनमें भारत भी एक है।'वेनेज़ुएला एक बम बन गया है'
नकारात्मक राजनीति
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संकट के इस दौर में वेनेज़ुएला के लोग देश की राजनीति को भी नकारात्मक भूमिका में देख रहे हैं। सत्ता की बागडोर अब चावेज के करीबी रहे निकोलस मदुरो के हाथ में है। जानकार मानते हैं कि उनकी एकमात्र काबिलियत है कि वो चावेज के भरोसेमंद लोगों में थे अब मौजूदा परिस्थितियों मदुरो से ना तो राजनीति संभल रही है ना तेल कारोबार। नेशनल असेंबली में विपक्षी दलों का बोलबाला है ऐसे में मदुरो ने जब अपने लिए अधिकार बढ़ाने की कोशिश की तो विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया। चावेज ने मदुरो को अपना उत्तराधिकारी तो बनाया लेकिन उनमें वो करिश्मा नहीं भर सके जो मुश्किलों का हल निकाल सके और देश को एकजुट रख सके।
वेनेज़ुएला में नोटबंदी के बाद अफरा-तफरी
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मदुरो ने नए संविधान सभा का गठन करने की बात कर मामला और बिगाड़ दिया है। अब्दुल नाफे कहते हैं, "दोनों पक्षों ने अतिशयवादी रुख अपना रखा है, विपक्ष मध्यस्थता की कोशिशों को नकार रहा है, मदुरो सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं चाहे देश किसी हाल में जाए। ऊपर से संविधान संशोधन की बात करना और भी दुखद है। अभी 1999 में ही तो संविधान बना था। मदुरो से ये गलती तो हुई है।"
मदुरो की नीतियों का विरोध देश के बाहर भी हो रहा है। लातिन अमरीकी देशों के साथ ही अमरीका भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के कमजोर पड़ने से चिंता में है और प्रतिबंधों के रास्ते तलाश रहा है। वेनेजुएला का संकट पड़ोसी देशों के लिए भी मुसीबत बन सकता है। सबसे बड़ी चिंता तेल के भंडार को लेकर ही है। ऐसे बुरे हाल में कोई और मजबूत नेता भी नजर नहीं आता जो मुश्किलों के हल का कोई रास्ता निकाल सके।