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एक दिन महिलाओं के हाथ होंगी मस्जिदें?

Wed, 11 May 2016 06:47 PM IST
माइसा वाली/बीबीसी

सार

  • ऐसे लोग भी हैं जो नहीं चाहते महिलाएं मस्जिद जाएं
  • समय लगेगा रातोंरात चीज़ें नहीं बदल जाएंगी
  • सभी फ़ैसले पुरुष ही लेते हैं
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- फोटो : getty images
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विस्तार
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क्या ब्रितानी मस्जिदों को अपनी प्रबंधन समितियों में ज़्यादा महिलाओं को शामिल करना चाहिए? अगर जवाब हां है तो इस बदलाव को कैसे लागू किया जाए?इस मुद्दे पर विचार कर रहे एक समूह को इन सवालों का गंभीरता से सामना करना पड़ रहा है। इसलिए कुछ पूर्वाग्रहों की सूची बनाई है और उनसे निपटने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए हैं।
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कई लेखों को एक किताब की शक्ल में छापा गया है जिसका नाम है, 'मुस्लिम वीमन्स गाइड टू मॉस्क गवर्नेंस, मैनेजमेंट एंड सर्विस डिलिवरी। (मस्जिदों के प्रशासन, प्रबंधन और सेवा कार्यों के लिए महिलाओं की संदर्शिका।)लेकिन समुदाय में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो यह सोचते हैं कि महिलाओं के समितियों में होने की बात तो छोड़ ही दें उन्हें मस्जिदों में जाना ही नहीं चाहिए।

इस किताब को तैयार करने वाले संगठन का नाम है फ़ेथ एसोसिएट्स, जिसे यह विचार पांच साल पहले आया था।सेंट्रल लंदन मस्जिद यह ब्रिटेन और दुनिया भर में मस्जिदों और इमामों के साथ मिलकर प्रशिक्षण और दिशानिर्देश देने का काम करता है।
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इसके कार्यकारी प्रमुख शौक़त वाराइक कहते हैं, 'हम बहुत लंबे समय से ये तर्क सुन रहे हैं। अब समय आ गया है कि महिलाओं को मस्जिदों में शामिल किया जाए। वह कहते हैं कि इसकी सांस्कृतिक और व्यवहारिक वजहें भी हैं।' इस बारे में और जानने के लिए बीबीसी की टीम साउथहॉल की सेंट्रल जामा मस्जिद गई। 

यहां दक्षिण एशिया के प्रवासी और एशियाई बड़ी संख्या में आते हैं। पृष्ठभूमि में आती अज़ान के साथ आप बहुत से मुसलमानों को मस्जिद में आते-जाते देख सकते हैं। इनमें से कई दिन में पांच बार नमाज़ अदा करते हैं। किताब लॉंच बहरहाल ब्रिटेन की बहुत से अन्य मस्जिदों की तरह इस मस्जिद को भी पुरुष ही चलाते हैं।
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पुरुषों के फैसलों की वजह से मदरसों का विस्तार नहीं हुआ

पुरुषों के फैसलों की वजह से मदरसों का विस्तार नहीं हुआ - फोटो : getty images
रज़िया बिस्मिल्लाह साउ थहॉल की सेंट्रल जामा मस्जिद की मुख्याध्यापिका हैं जो क़रीब 600 बच्चों को पढ़ाती हैं। वह कहती हैं, 'सभी फ़ैसले अंततः वही (पुरुष) ही लेते हैं। इसकी वजह से मदरसे का विस्तार नहीं हो पाता। प्रबंधन में शामिल लोग बुज़ुर्ग हैं। एक महिला ही जानती है कि महिलाओं की क्या ज़रूरत है।'

और इसीलिए नए दिशानिर्देश प्रकाशित किए गए हैं ताकि महिलाओं को मस्जिदों में ज़्यादा शामिल किया जाए- न सिर्फ़ इबादत करने वालों के रूप में बल्कि समितियों में भी। रज़िया इनमें से एक हैं। मुसलमान बच्चे, लंदन वो कहती हैं, 'मुझे लगता है कि यह किताब प्रबंधन और समाज में महिलाओं और मस्जिदों की निर्णय प्रक्रिया में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को शामिल होने के लिए आत्मविश्वास देने वाली काफ़ी जानकारी देती है।'

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पुस्तिका में मस्जिदों में काम करने का काफ़ी अनुभव दिखता है। किताब के लिए जूली सिद्दिक़ी ने भी एक लेख लिखा है। वह स्कूलों को धार्मिक शिक्षा पर सलाह देने वाली इकाई की अध्यक्ष हैं। जूली कहती हैं, 'मुझे नहीं लगता कि इससे रातोंरात चीज़ें बदल जाएंगी। हमारे विचार पुराने हैं। हमारी मस्जिदें पिछले 40 साल से एक ख़ास ढंग से चलाई जाती रही हैं।'

मुसलमान महिलाएं नमाज़ अदा करती हैं उन्हें उम्मीद है कि, 'यह बहुत अच्छी शुरुआत है।' इस किताब के लेखकों की महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी हैं। वह चाहते हैं कि इस किताब को अमरीका में एक रोड शो में ले जाएं और दुनिया के कई दूसरे हिस्सों की मस्जिदों में भी उपलब्ध करवाएं।
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