दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पर्वतारोहियों की इतनी भीड़ हो गई है कि एवरेस्ट पर जाम जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
छह दशक पहले, मई 1953 में, एडमंड हिलेरी और तेनज़िंग नोर्गे दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर अकेले खड़े थे।
लेकिन कभी अजेय मानी जाने वाली वह चोटी आज कुचली सी नज़र आती है। लेकिन ऐसा हुआ कैसे?
व्यावसायीकरण
पर्वतारोहण के उपकरणों में आई प्रगति और शेरपा गाइडों की अथक कोशिशों के चलते आज बड़ी संख्या में लोग माउंट एवरेस्ट पर चढ़ पा रहे हैं।
नेशनल ज्यॉग्राफ़िक के अनुसार 1990 में चोटी पर चढ़ने की 18% कोशिशें कामयाब हुई थीं लेकिन 2012 में यह 56% हैं।
लेकिन इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। आलोचकों का कहना है कि यह चोटी छुट्टी के दिन किसी पांच लेन वाले हाईवे जितनी ही भीड़ भरी हो गई है।
साल 2012 में एक ही दिन में कम से कम 234 पर्वतारोही चोटी पर पहुंचे। इसके विपरीत 1983 में यह संख्या 8 ही थी। एक दशक बाद यह 40 पर पहुंच गई थी।
इस साल कई लोगों ने शिकायत की कि उन्हें चोटी पर पहुंचने के लिए तंग मोड़ों पर दो-ढाई घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा।
जर्मन पर्वतारोही राल्फ़ यूमोविट्स ने 2012 में एक चौंकाने वाली तस्वीर खींची थी जिसमें सौ से ज़्यादा लोग चोटी पर चढ़ने के लिए कतार में खड़े थे।
इस तस्वीर से यह बहस छिड़ गई कि क्या यह जुलूस चढ़ाई का मज़ा ख़त्म कर दे रहा है।
पश्चिम के लोग इस अभियान के लिए 10,000 से 1,00,000 डॉलर तक भुगतान कर सकते हैं.
इसके चलते बेस कैंप के आस-पास एक ठीक-ठाक पर्यटन उद्योग विकसित हो गया है जिसके चलते कई मील तक गंदगी फैलने की शिकायतें आने लगी हैं।
लंदन की एक संवेदनशील पर्वतारोही 31 वर्षीय आइशा जेसा हाल ही में एवरेस्ट के बेस कैंप का दौरा कर लौटी हैं. वह कहती हैं, “वहां चारों तरफ़ लोग ही लोग दिखाई देते हैं. इसका पूरी तरह व्यावसायीकरण हो चुका है- सब कुछ पश्चिमी पर्यटकों के लिए तैयार किया गया है।”
कई गंभीर पर्वतारोहियों के लिए इससे एवरेस्ट का महत्व कम हुआ है।
अनुभवी पर्वतारोही और “द लास्ट हाउस ऑन एवरेस्ट” के लेखक ग्राहम होएलैंड कहते हैं, “यह बीहड़ नहीं, मैकडॉनेल्ड जैसा अनुभव लगता है।”
बच्चे-बूढ़े सब चोटी पर
मौसम के पूर्वानुमान के विकास से पर्वतारोही हर साल के ख़ास दिनों पर ही चढ़ाई की योजना बनाते हैं जिससे तंग रास्तों पर जाम लग जाता है।
ऊंचाई पर होने वाली दिक्कत की बेहतर समझ के चलते भी ज़्यादा पर्वतारोही 8848 मीटर ऊंची इस चोटी पर चढ़ पा रहे हैं।
पैसे के चलते पश्चिमी पर्यटकों को ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति की जाती है और अक्सर एक नेपाली पहाड़ी गाइड यह सुनिश्चित करने के लिए उनके साथ रहता है कि वह चोटी तक पहुंचें।
टूर पार्टियां बंधी हुई रस्सियों के सहारे ऊपर चढ़ती हैं। इससे अकुशल पर्वतारोहियों को भी चोटी तक पहुंचने का मौका मिलता है।
लेकिन अनुभवी पर्वतारोहियों को यह खेल का मज़ाक बनाना लगता है।
इस सबका फ़ायदा यह है कि 1953 से अब तक 3,000 लोग एवरेस्ट पर विजय पा चुके हैं।
दुनिया के शिखर पर चढ़ने वालों में 13 साल का बच्चा केलिफ़ोर्निया का जॉर्डन रोमेरो और जापान के 80 वर्ष के वृद्ध यूचिरो मियुएरा शामिल हैं। इन दोनों के नाम सबसे युवा और सबसे वृद्ध पर्वतारोहियों की सूची में हैं।
साल 1953 से अब तक एवरेस्ट पर चढ़ाई के इतिहास पर बारीक नज़र रखने वाले बेरहार्ड जुर्गाल्स्की कहते हैं, “अगर आप बहुत बीमार या कमज़ोर नहीं हैं तो करीब-करीब सभी- अगर उनके पास पैसा और सब्र हो तो- एवरेस्ट पर चढ़ सकते हैं।”
बढ़ता दबाव
कुछ लोगों का मानना है कि इस ख़तरनाक भूभाग पर गैर-अनुभवी पर्वतारोहियों की भी़ड़ किसी हादसे की वजह बन सकती है।
होएलैंड कहते हैं, “ऐसे लोग चढ़ाई कर रहे हैं जिन्हें रस्सियों का इस्तेमाल या फिर क्रेपोन्स का प्रयोग नहीं आता। कोई बड़ा हादसा कभी भी हो सकता है।”
साल 1996 में 36 घंटे के अंदर ही चोटी के पास आठ लोगों की मौत हो गई थी और 2012 में करीब 10 लोगों की मौत हो गई थी जिनमें से तीन शेरपा थे।
तो तनाव होना कोई अजीब बात नहीं है।
होएलैंड कहते हैं कि अनुभवी पर्वतारोही यह देखकर खीझ जाते हैं कि शौकिया लोग बांधी हुई रस्सियों के सहारे लाइन लगाकर चढ़ रहे हैं और उनकी रफ़्तार धीमी कर रहे हैं।
बढ़ते तनाव का असर अप्रैल में दिखा जब 7,470 मीटर की ऊंचाई पर दो जाने-माने यूरोपीय पर्वतारोहियों उली स्टेक और सिमोन मोरो के साथ कुछ नेपाली गाइडों की झड़प हो गई।
हालांकि पहाड़ पर गंदगी के बारे में शिकायतें अब भी की जा रही हैं लेकिन होएलैंड कहते हैं सफ़ाई अभियानों ने पर्यावरणीय स्थिति में सुधार किया है।
एवरेस्ट पर बढ़ते जाम से छुटकारा पाने के लिए नेपाली सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है लेकिन पर्वतारोही इस मसले पर बुरी तरह बंटे हुए हैं।
सुझाव और विरोध
एक पर्वतारोहण कंपनी की सलाह है कि हिलेरी स्टेप, चोटी से ठीक पहले बाहर की ओर निकली एक चट्टान, पर सीढ़ियां लगा दी जाएं।
हिलेरी स्टेप पर एक बार में सिर्फ़ एक ही आदमी चढ़ या उतर सकता है और इसकी वजह से बाकियों को इंतज़ार करना पड़ता है।
लेकिन शुद्धतावादियों का कहना है कि इससे पहाड़ पर चढ़ने की चुनौती ही ख़त्म हो जाएगी।
एक दूसरा सुझाव यह है कि पर्वतारोहियों की संख्या को सीमित किया जाए।
साल 1985 तक नेपाली सरकार एक समय में एक रूट पर सिर्फ़ एक अभियान को इजाज़त देती थी। सिद्धांत रूप में इस प्रक्रिया को फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक अन्य सुझाव यह भी है कि चढ़ाई के परमिट के लिए या तो ट्रेनिंग ली जाए या कम से कम पर्वतारोहण का अनुभव दिखाया जाए।
होएलैंड कहते हैं, “अगर चढ़ाई करने वाले सभी लोग पर्वतारोहण की संस्कृति से परिचित होंगे तो इससे बड़ा फ़र्क पड़ेगा।”
वर्ष 1985 में पचास साल की उम्र में एवरेस्ट पर चढ़ने वाले सर क्रिस बॉनिंगटन खुद को ख़ुशनसीब मानते हैं कि वह उस समय एवरेस्ट पर चढ़ पाए जब भीड़ को वहां जाने की इजाज़त नहीं थी।
लेकिन वह दूसरों को उस मौके से वंचित करने का समर्थन नहीं करते जो उन्हें मिला था।
लोगों की संख्या को सीमित करने का उन पर भारी असर पड़ेगा जो पर्यटन से जीविका कमाते हैं।
यह बहस अभी जारी है। जब तक हिलेरी और नौर्गे की उपलब्धि लोगों को लुभाती रहेगी वे आते रहेंगे।