वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम कामयाबी हासिल की है, जिसकी मदद से बांझपन की समस्या से जूझ रही महिलाएं आसानी से मां बन सकेंगी। खास बात यह है कि नई तकनीकी इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) से भी किफायती और सुविधाजनक है।
साथ ही आईवीएफ के मुकाबले इसके साइड इफेक्ट भी कम होंगे। फिलहाल नि:संतान दंपति संतान पाने के लिए आईवीएफ का सहारा लेते हैं। ऑस्ट्रेलिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के रॉबर्ट गिलक्रिस्ट के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने नई तकनीक के तहत इन-विट्रो मैचुरेशन (आईवीएम) में सुधार किया है।
दुनिया भर में मां बनने की चाहत रखने वाली महिलाओं के लिए यह वैकल्पिक उपचार बेहतर साबित होगा।
इससे भ्रूण में 50 फीसदी तक सुधार होगा
ऑस्ट्रेलियाई और बेल्जियम वैज्ञानिकों के मुताबिक नई तकनीक के तहत महिलाओं के अंडाशय में अंडे की गुणवत्ता में सुधार किया जाएगा। साथ ही इससे भ्रूण में 50 फीसदी तक सुधार होगा। यह नई तकनीक प्राकृतिक है। इसमें महिलाओं को आईवीएफ की तुलना में कम दवाएं लेनी पड़ती हैं।
इससे मां और नवजात को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से भी नहीं जूझना पड़ता है। वहीं, आईवीएफ के इलाज में महिलाओं को मां बनने के लिए तमाम प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है। इससे कई दफा मां और नवजात का स्वास्थ्य भी खराब हो जाता है।
नई तकनीक का प्री-क्लीनिक टेस्ट भी किया जा चुका है। ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का कहना है कि नई तकनीक के तहत प्रजनन क्षमता बढ़ाया जाता है और अंडे की गुणवत्ता में सुधार किया जाता है।
क्या है इस तकनीक में खास
- फोटो : Joanna Giannouli
आईवीएफ के तहत महिला के अंडाशय में अंडे की कोशिकाओं को उत्तेजित करने के लिए फोलिकल स्टीमुलेटिंग हार्मोन्स की मदद ली जाती है। साथ ही महिलाओं को बेहद कीमती दवाएं काफी मात्रा में खानी पड़ती हैं।
जबकि नई तकनीक के तहत अंडों की गुणवत्ता में अपरिपक्व अवस्था में ही सुधार किया जाता हैं। फिर उसको लैब में परिपक्व किया जाता है। इसके लिए विकसित करने वाले कारक और कैंप मोड्युलेटर्स का सहारा लिया जाता है।
इसमें ज्यादा दवाएं भी नहीं लेनी पड़ती हैं। इससे मां और नवजात का स्वास्थ्य भी प्रभावित नहीं होता है।