महात्मा गांधी का सत्याग्रह न सिर्फ भारत में बल्कि पड़ोसी देश नेपाल में भी काफी लोकप्रिय हो चुका है। पेशे से ऑर्थोपेडिक सर्जन रहे अविवाहित प्राध्यापक गोविंद केसी मौजूदा समय में गांधी के अहिंसा आंदोलन के तहत सत्याग्रह का प्रयोग करके नेपाली सत्ता को चुनौती दे रहे हैं।
नेपाल में सत्ता परिवर्तन और अविश्वास प्रस्ताव के राजनैतिक माहौल के बावजूद डॉ. केसी का सत्याग्रह मीडिया की सुर्खियों में है। डॉ केसी खुद को गांधी का अनुयायी बताते हैं, लेकिन नेपाली समाज और चिकित्सा जगत के लोग उनको नेपाली गांधी के रूप में जानने लगे हैं। उनके सत्याग्रह और जनहित की मांग पर नेपाली संसद में चर्चा चल रही है।
नेपाल के प्रतिष्ठित अखबारों की हेडलाइन देखकर कोई भी कह सकता है कि डॉ. केसी के सत्याग्रह का समाचार सत्ता परिवर्तन जैसी बड़ी राजनीतिक घटना को भी चुनौती दे रहा है। पिछले तीन साल में उनका यह आठवां अनशन है।
इस बार वह 15 दिन से आमरण अनशन पर बैठे हैं। नेपाल के चिकित्सा सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता के स्तर में गिरावट, मुनाफाखोरी और गलत प्रवृत्तियों के खिलाफ आम नेपाली को उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा एवं शिक्षा सेवाएं सुलभ कराने को लेकर वह सालों से लगे हुए हैं।
अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘गांधी मेरे आदर्श हैं। उनके सत्याग्रह के पथ पर आमरण अनशन के जरिए ही मैं अपने सभी देशवासियों को उच्च गुणवत्ता की सहज और सुलभ चिकित्सा सेवा का अधिकार दिलाऊंगा।’ काठमांडू की सड़कों पर डॉक्टर, विद्यार्थी और आम नागरिक हरेक दिन डॉ केसी के सत्याग्रह के समर्थ और नेपाली सरकार के खिलाफ जुलूस निकालते हैं।
डा केसी दुनिया की किसी भी जगह भूकंप, सुनामी समेत अन्य प्राकृतिक आपदाओं पर अपने खर्चे पर ही लोगों को चिकित्सीय सेवाएं उपलब्ध कराने निकल पड़ते हैं। काठमांडू स्थित त्रिवि शिक्षण अस्पताल में ऑर्थोपेडिक के प्राध्यापक रहे डॉ केसी अपने वेतन से हर माह खुद पर छह हजार रुपये खर्च करते है।
इसके बाद बचे हुए पैसे से वह नेपाल के दुर्गम पहाड़ी जिलों में निरंतर या विदेशों में आपदा आने पर वहां का दौरा करते हैं और लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं।
डॉ केसी के पास संपत्ति के नाम पर कुछ नहीं
सरकारी आवास में रहने वाले डॉ केसी के पास संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं है। वह कभी भी प्राइवेट फीस लेकर इलाज नहीं करते हैं। उनका कहना है कि नेपाल में राजनीति भ्रष्टाचार चरम पर है। यहां की राजनीतिक पार्टियां जनता के हित में काम नहीं कर रही हैं। चारो ओर कुशासन का माहौल है।