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8000 लोगों की मौत और बर्बादी का मंजर, कैसे ठहर गया नेपाल?

Wed, 27 Apr 2016 01:18 PM IST
जस्टिन रॉलेट/बीबीसी न्यूज़, दक्षिण एशिया संवाददाता
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8000 लोगों की मौत और बर्बादी का मंजर - फोटो : BBC
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नेपाल में भयानक भूकंप को एक साल बीत चुका है पर यह अब भी तिरपालों, टैंटों और टिन की छतों वाले ढांचों का देश बना हुआ है। मुझे लग रहा था कि फिर से इमारतें बननी शुरू हो चुकी होंगी पर लगता है कि यह देश ठहर गया है। सड़कों से मलबा साफ़ हो चुका है और पूरी तरह अस्थिर लगने वाले ढांचे गिरा दिए गए हैं और साथ ही तथाकथित 'पुनर्निर्माण की कोशिशें' थम गई हैं। जिन आठ लाख इमारतों की भूकंप में नष्ट होने की पुष्टि की गई थी, उनमें से वस्तुतः एक भी फिर से नहीं बनाई गई है। ग्रामीण इलाक़ों में पुनर्निर्माण की स्थिति और ख़राब है। पूरे के पूरे गांव अब भी टूटे-फूटे और दरके हैं। 25 अप्रैल, 2015 को नेपाल की राजधानी काठमांडू और आसपास के इलाक़े में 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें 8,000 लोगों की मौत हो गई थी।
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12 मई 2015 को पूर्वी नेपाल में माउंट एवरेस्ट के पास 7.3 तीव्रता का दूसरा बड़ा झटका आया। इसमें 100 से ज़्यादा लोग मरे और हज़ारों घायल हुए। सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िलों में थे सिंधुपालचौक, जहां 2,000 लोग मारे गए और काठमांडू में 1,000 से ज़्यादा लोग मरे। जब मैं भूकंप से सबसे ज़्यादा प्रभावित प्रांत सिंधुपाल चौक गया तो मुझे ग़ुस्से से उबलते लोगों से मिलने की उम्मीद थी। इसके बजाय वहां ज़्यादा निराशाजनक चीज़ दिखी-नाउम्मीदी। हमें तीन बच्चों की मां बेली बिष्टा मिलीं। उनके पति पहले भूकंप के बाद झटकों में मारे गए थे। वह सफ़ेद कपड़ों में थीं और उनके दो बेटों ने हिंदू परंपरा के अनुसार सिर मुंडवा रखे थे। एक साल बाद भी उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं था बल्कि यह और ख़राब ही हुई थी। उन्होंने मुझे बताया, "हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया। किसी ने भी हमारी मदद नहीं की। ज़िंदा रहने के लिए मुझे अपनी ज़मीन बेचनी पड़ी।"



वह अब भी अपने पुराने घर के मलबे से बनाए गए एक अस्थाई टिन की छत वाले एक कमरे में रहती हैं। देशभर में यह कहानी जगह-जगह दोहराई जा रही है। रेडक्रॉस के मुताबिक़ चार करोड़ लोग अब भी घटिया क़िस्म के अस्थायी आश्रम स्थलों में रह रहे हैं। भूकंप प्रभावित लोगों को अपने परिजनों के जीवन और असबाब के लिए सरकार से मामूली रक़म मिली। यह आश्वासन भी मिला कि हर परिवार को उसके घर के नुक़सान के एवज़ में 2000 डॉलर (1.33 लाख रुपए से ज़्यादा) मिलेंगे। ज़्यादातर मामलों में इस राशि का भुगतान नहीं किया गया। इन भूकंपों में नेपाल के कई ऐतिहासिक स्थल बुरी तरह बर्बाद हुए थे जिनमें मंदिर और स्मारक शामिल हैं। काठमांडू घाटी में यूनेस्को वैश्विक धरोहरों में शामिल सात में से चार स्थान बुरी तरह प्रभावित हुए। आखिर कोई भी शासन कैसे अपने लोगों को निराश्रित छोड़ सकता है और उसके बाद भी यह उम्मीद कर सकता है कि उसे शासन करने का जनादेश मिला है।
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मगर नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली, बेली बिष्टा की तरह ख़ुद को भी हालात का शिकार मानते हैं। यह पूछने पर कि क्या वह पुनर्निर्माण कार्यों की रफ़्तार से ख़ुश हैं, वह सवाल से बचने की कोशिश नहीं करते बल्कि कहते हैं, "बेशक इनकी रफ़्तार कम है। इनमें देर हो गई है। मैं इससे ख़ुश नहीं हूं पर यह हक़ीकत है और मुझे इसे मानकर आगे बढ़ना होगा।" वह बताते हैं कि नेपाल एक बहुत ग़रीब देश है और जो घर नष्ट हुए हैं उनमें से बहुत से बहुत दूरदराज़ के इलाक़ों में हैं। मैं ध्यान दिलाता हूँ कि इससे पुनर्निर्माण के प्रयासों में कमी की वजह साफ़ नहीं होती। दुनिया की सहानुभूति नेपाल के लिए उमड़ी थी और देश के पुनर्निर्माण के लिए 4।1 अरब डॉलर (27.34 खरब रुपये से ज़्यादा) जमा हुए थे। यह पैसा अब तक ख़र्च नहीं हो पाया है। जब मैंने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया तो ओली ने कहा कि मेरा सवाल 'अपमानजनक' है और कहा कि कुछ धर्मार्थ संस्थाओं ने मामला इसलिए उठाया है ताकि दान देने वाले सरकार के बजाय उन्हें पैसा दें।



लेकिन ट्रांस्पेरेंसी इंटरनेशनल की नज़र में भ्रष्टाचार-मुक्त देशों की रैंकिंग में सबसे निचले पायदान पर मौजूद देश के लिए भ्रष्टाचार वास्तव में विचार का मुद्दा है। वह कहते हैं कि इस देरी की मुख्य वजह देश में राजनीतिक उठापटक रही है। यह सच भी है कि नुक़सान की भरपाई के बजाय नेपाल के नेता बहु-प्रतीक्षित नए संविधान की लड़ाई में उलझ गए थे। इस पर चर्चा 2008 में राजशाही के ख़ात्मे के समय से जारी है। उम्मीद थी कि संवैधानिक समझौते पर तेज़ी से पहुँचने से पुनर्निर्माण के काम में तेज़ी आएगी पर हुआ इसके विपरीत। नए संविधान को मंज़ूरी मिलने के बाद नेपाल और भारत के बीच तराई इलाक़ों में जातीय समुदायों ने विद्रोह किया, इस वजह से सीमा पर नाकाबंदी हो गई। खाने और ईंधन समेत ज़रूरी सामानों की कमी हो गई।

वरिष्ठ नेपाली पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार कनकमणि दीक्षित कहते हैं, "वो ग़ुस्से में हैं, दुखी हैं, लेकिन नेपाली लोग अख़बार भी पढ़ते हैं और इसीलिए वो जानते हैं कि जो हो रहा है वह क्यों हो रहा है।" हम एक बाल्कनी में खड़े होकर बात कर रहे हैं जहां से कभी काठमांडू की शान रहे धाराहारा टावर का मलबा दिख रहा है। दीक्षित कहते हैं, "राहत और बचाव में हमने ठीक-ठाक काम किया। फिर संविधान निर्माण की राजनीति बलवती हो गई और यह बहुत ध्रुवीकरण वाली घटना थी। इसके बाद सीमा पर नाकेबंदी हुई जिससे ख़ुद ही एक संकट खड़ा हो गया।" हो सकता है कि लोग देरी की वजह समझते हों पर ग्रामीण इलाक़ों में मुझे लोगों के सब्र का पैमाना छलकता लगता है। प्रधानमंत्री ने मुझे भरोसा दिलाया कि जब हम बात कर रहे थे तब पुनर्निर्माण के लिए राशि की पहली क़िस्त जारी हो रही थी। नेपाल के लोग एक मॉनसून और नेपाल की कड़ी सर्दी तो झेल चुके हैं लेकिन एक और मॉनसून आने वाला है और लगता नहीं कि उन्हें राहत इससे पहले मिल पाएगी।
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