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रहस्यों से भरी है एंजला मर्केल की जिंदंगी

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जर्मनी में नए चांसलर के चुनाव में एंजेला मर्केल की कंज़र्वेटिव पार्टी सीडीयू को 41।5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए है। इस का मतलब यह कि एंजेला मर्केल तीसरी बार जर्मनी का चांसलर बन गई है। 1990 के बाद यह पार्टी का बसे अच्छा प्रदर्शन है।
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इस चुनाव का असर यूरोप के एक बड़े हिस्से मसलन ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, इटली, ग्रीस और कई दूसरे देशों के भविष्य पर पड़ेगा।

मर्केल का जटिल व्यक्तित्व

एंजेला मर्केल असामान्य तौर पर निजता बरतने वाली और कम बोलने वाली राजनीतिज्ञ हैं। उनमें बड़बोलापन या आत्मप्रदर्शन जैसी बात नहीं दिखती।

जर्मनी के लोगों के लिए भी मर्केल को जानना बेहद मुश्किल है। चुनाव से पहले वह कोई साक्षात्कार नहीं देना चाहती थीं और खासतौर पर अंग्रेज़ी भाषा में बिल्कुल नहीं। हालांकि वह अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं।

हमने उनके कई दोस्तों, राजनीतिक सहयोगियों और उनके आलोचकों से बात की। हमने काफ़ी पड़ताल कर उस शहर का पता लगाया, जहां वह पली-बढ़ी हैं। यह बर्लिन से 50 मील दूर पूर्वी जर्मनी का टेंपलिन शहर है।
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जर्मनी चुनाव एंजेला मर्केल

हमने उनके बचपन के दोस्तों और स्कूल के उन सहपाठियों से बात की, जो मर्केल को तब से जानते हैं, जब राजनीति बेहद ख़तरनाक और पेचीदा हुआ करती थी।

मर्केल का जन्म पश्चिमी जर्मनी के हैमबर्ग में हुआ था। उनके पिता मार्टिन लूथर के विचारों का अनुसरण करने वाले पादरी थे। 1954 में उनके पिता परिवार के साथ पूर्वी जर्मनी आ गए। तब मर्केल सिर्फ कुछ हफ़्ते की थीं।

धार्मिक विचारों की बात हो तो राजनेता के बतौर मर्केल बेहद उदार रही हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि उनके पिता चर्च से जुड़े थे, जिसका उन पर गहरा असर रहा है। इससे नैतिक रूप से उनके सशक्त होने की स्थिति बनी।

उनके बचपन पर शीतयुद्ध का भी असर रहा। मर्केल के समाजवादी पिता पादरियों से जुड़े अपने शिक्षा संस्थान में राजनीतिक सभाएं आयोजित कराते रहते थे। जब वह बड़ी हुईं, तो उन्होंने अपने घर में खाने की मेज़ पर गंभीर चर्चाएं होते देखीं।

युवा हो रही मर्केल को सीखना पड़ा कि उन्हें कैसे बातें ख़ुद तक सीमित रखनी हैं, ताकि खुफ़िया पुलिस स्तासी का ध्यान न जाए।

दीवार गिरी, क़द बढ़ा

पूर्वी जर्मनी में अपने विचारों को खुले तौर पर जताने का मौका न मिलने से लोगों पर कई तरह से असर पड़ा।

मर्केल के स्कूल के एक दोस्त हार्टमूट होहेंसी इसकी तुलना उस स्थिति से करते हैं जिसमें यह उम्मीद की जाती है कि सर्दी का मौसम गुज़रेगा और अंततः फूल खिलेंगे।

1989 में बर्लिन की दीवार टूटी तो मर्केल का राजनीतिक करियर आगे बढ़ना शुरू हुआ।

दीवार के गिरने के बाद जर्मनी की राजनीति में उथलपुथल की स्थिति बन गई। कॉफी हाउस की चर्चा सड़कों के विरोध प्रदर्शनों में बदली तो आंदोलन राजनीतिक दलों में तब्दील हो गए।

पहली दफ़ा लोगों ने देश को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश शुरू की थी। इसी दौर में एंगेला मर्केल ने राजनीतिक जीवन चुना। तब उनकी उम्र महज़ 35 साल थी।

क्वांटम केमिस्ट्री में डॉक्टरेट करने वाली मर्केल इसी राजनीतिक दुनिया में अव्वल बनकर उभरीं।

बर्लिन दीवार

बर्लिन दीवार गिरने के बाद एंजेला मर्केल के राजनीतिक करियर का उभार हुआ।

साम्यवाद के परिवेश में पली-बढ़ी पूर्वी जर्मनी की यह महिला लोगों को हैरान करते हुए पुरुष प्रधान दल क्रिश्चियन डेमोक्रेट यूनियन (सीडीयू) से जुड़ गईं।

सीडीयू पश्चिमी जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टी थी। 1990 के दशक के आख़िर में वह सीडीयू से जर्मनी की संसद के निचले सदन बूंदेस्ताक की सदस्य बनीं और फिर शीर्ष की ओर बढ़ती चली गईं।

जर्मनी के चांसलर हेलमुट कोल एकीकरण के बाद मंत्रिमंडल में किसी महिला को शामिल करना चाहते थे, जो शांत हो और उसका ताल्लुक पूर्वी जर्मनी से हो। दि मेज़ेयर ने मर्केल की सिफ़ारिश की। मंत्री के रूप में शुरुआत करने के बाद उनका क़द धीरे-धीरे बढ़ने लगा और वह पर्यावरण मंत्री बन गईं।

निष्ठुर राजनीतिज्ञ

मगर 1999 में टेंपलिन की इस शांत लड़की ने हर किसी को दंग कर दिया। हेलमुट कोल जो मर्केल को अपनी छोटी बच्ची कहा करते थे, वह दान राशि को गोपनीय अवैध फंड में डालते थे, जिसका इस्तेमाल वे अपने दोस्तों के लिए करते थे।

कोई भी कोल का सामना करने को तैयार नहीं था, लेकिन एंगेला मर्केल ने सबकी राय मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने एक प्रमुख रूढ़िवादी अख़बार के पहले पन्ने पर छपी ख़बर में अपने पूर्व सलाहकार की निंदा की और इस्तीफ़ा देने को कहा।

जर्मन चांसलर

यहां युवा मर्केल को पूर्व चांसलर हेल्मुट कोल के साथ देखा जा सकता है।

यह क़दम अपने किसी राजनीतिक गुरु की हत्या करने के समान था, लेकिन इसके साथ ही मर्केल जर्मनी की राजनीति में शीर्ष की तरफ़ बढ़ती चली गईं।

जोनाथन पॉवेल उन्हें तब से जानते हैं जब वह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के सेना प्रमुख थे।

वह कहते हैं, "लोग उनके बारे में एक बात नहीं समझ पाते कि वह वास्तव में एक निष्ठुर राजनीतिज्ञ हैं। वह सीडीयू में जिस तरह अपने प्रतिद्वंद्वियों से निपटी हैं वह असाधारण रूप से कपटपूर्ण रणनीति थी। वह अगर सिर्फ अपनी भौंहें भी तानतीं तो भी उन्हें आसानी से छुटकारा मिल जाता।"

एंगेला मर्केल 2000 में सीडीयू की अध्यक्ष बनीं और पांच साल बाद वह जर्मनी की पहली महिला चांसलर बन गईं।

यूरोज़ोन संकट

एक नेता के बतौर आठ साल में एक निर्णायक क्षण यूरोज़ोन के वित्तीय संकट के साथ आया। ग्रीस ने माना कि वह बड़े कर्ज़ संकट से जूझ रहा है।

साथ ही यह भी अंदाज़ा हुआ कि यूरोपीय संघ के अन्य देशों की आर्थिक स्थिति भी ख़राब है। पूरे यूरोप की निगाहें अब जर्मनी पर आ टिकीं कि यूरोज़ोन के सदस्यों को जर्मनी राहत पैकेज देने को तैयार होगा या वह उन्हें अपनी मुश्किलें ख़ुद सुलझाने की बात कहेगा।

यूरोज़ोन के आर्थिक संकट पर मर्केल की धीमी प्रतिक्रिया की लोगों ने आलोचना की।

मर्केल के काम करने के तरीक़े में सावधानी और आम सहमति वाला बिंदु ज़रूर शामिल होता है।

2005 से ही मर्केल के हर मंत्रिमंडल में काम करने वाले उर्सुला वोन दर लीयेन के मुताबिक़ "आप इस तरह से संकट का प्रबंधन सबको साथ लेकर ही कर सकते हैं।"

बहुस्तरीय चरित्र

वह कहते हैं, "एंगेला मर्केल जानती थीं कि इसका तरीक़ा क्या हो सकता है पर उन्होंने वक़्त लेकर ऐसा रास्ता तलाशने की कोशिश की, जिस पर सब साथ चल सकते थे।"

मैं यह दावा नहीं करती कि मैंने मर्केल को समझ लिया है लेकिन वह दुनिया भर के राजनेताओं के मुकाबले असामान्य रूप से एक जटिल और बहुस्तरीय चरित्र की हैं।

मर्केल की ज़िंदगी की दास्तां कुछ हद तक मार्गरेट थैचर से मिलती-जुलती है। अंतर बस इतना है कि मर्केल का ताल्लुक लिंकनशायर के बजाय पूर्वी जर्मनी के एक सामान्य परिवार से है।

उनका पालन-पोषण एक धार्मिक पिता ने किया था। राजनीतिक करियर चुनने से पहले वह एक गंभीर वैज्ञानिक थीं।

पार्टी के भीतर एडवर्ड हीथ के बजाय उनके राजनीतिक संरक्षक कोल ने उन्हें ऐसी प्रतिभाशाली महिला के रूप में चुना, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता था।

लेकिन उन्होंने कोल को उनके पद से हटवाने में बेरहमी दिखाकर और अंततः सत्ता की चाभी ख़ुद अपने हाथ लेकर सबको हैरान कर दिया। थैचर की तरह ही मर्केल काफी मेहनती हैं और वह एक चतुर नेता हैं।

हालांकि इन समानताओं से ज़्यादा अहम इन दोनों नेताओं के बीच का अंतर है। पूर्वी जर्मनी की पृष्ठभूमि से आने वाली मर्केल सामाजिक एकजुटता और ट्रेड यूनियनों के साथ काम करने में यक़ीन रखती हैं।

वह गठबंधन आधारित राजनीतिक प्रणाली में आम-सहमति की पैरोकार हैं और ज़रूरत के हिसाब से कुछ फ़ैसले लेने में देरी करती हैं।

दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण महिला राजनीतिज्ञ ज़्यादा हैरान नहीं होतीं। हमने जितना महसूस किया है उससे भी कहीं ज़्यादा हमारे लिए और पूरे यूरोपीय संघ के संकट के लिए एंजेला मर्केल अहम हैं।

क्या वह भविष्य में भी इतनी ही अहम रहेंगी? शायद यह हो भी सकता है। जर्मनी के चुनाव नतीजे की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती लेकिन अगर मर्केल जीतती हैं, जैसा कई लोगों ने भविष्यवाणी की है, तो निश्चित रूप से उनके पास अपनी विरासत सुरक्षित करने का एक और मौक़ा होगा।
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