गिरफ्तार होने के अगले लगभग ढाई साल तक मैं बिना किसी आरोप के सलाखों के पीछे रहा। बाद में मुझ पर सुरक्षा बलों की हत्या और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसे कई गंभीर आरोप मढ़ दिए गए। मैं उस प्रदर्शन स्थल पर एक फ्रीलांस पत्रकार की हैसियत से मौजूद था, इसका एक मात्र सबूत था मेरा कैमरा। लेकिन सरकार की नजरों में वह सबूत भी मुझे किसी राजद्रोही सरीखा अपराधी बनने से नहीं रोक पाया। मैंने आजीवन बंदूक को हाथ नहीं लगाया, हिंसा का तो कभी ख्याल ही नहीं आया। फिर भी मार्च, 2016 में देश की अदालत ने कुल छह संगीन अपराधों में दोषी ठहराते हुए मुझे मृत्युदंड की सजा सुना दी।
पर अब भी उम्मीद बाकी
मैं जेल में बीमार पड़ा और हेपेटाइटिस-सी का शिकार हो गया। मैंने पत्रों के माध्यम से अपनी पीड़ा दुनिया को बताई है। ऐसे ही एक पत्र में मैंने लिखा कि इस चारदीवारी में कैद और बीमार होने के बाद मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात की है कि मेरे सपने मर रहे हैं। मेरे सपने कुछ और नहीं, बल्कि ऐसे रंगों से दूर रहना है, जिनमें न जीवन है, न ही कोई रोमांच। और यहां जेल में ऐसे ही कोरे रंग मेरी चारों तरफ हैं। जेल से लिखे मेरे पत्रों ने दुनिया में थोड़ी हलचल जरूर मचाई है। इसी का नतीजा है कि अनेक मानवाधिकार संगठन और अंतरराष्ट्रीय समूहों ने मेरी रिहाई का मोर्चा खोल रखा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी ऑनलाइन पिटिशन के जरिये पत्रकारों की रक्षा करने वाली समिति से मेरी आजादी की गुहार लगाई है।
-हाल में यूनेस्को वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज से नवाजे गए जेल में बंद मिस्र के पत्रकार से संबंधित विभिन्न रिपोर्टों पर आधारित।