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'फोटोग्राफी मेरे लिए सिर्फ एक शौक नहीं, जीवन जीने का वास्तविक तरीका है'

Sat, 28 Apr 2018 06:52 PM IST
महमूद अबु जीद (शॉकन)
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Mahmoud Abou Zeid
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फोटोग्राफी सिर्फ एक शौक नहीं है, मेरे लिए यह जीवन जीने का वास्तविक तरीका है। कैमरा पकड़कर तस्वीर खींचने से बढ़कर यह एक ऐसा जरिया है, जिसके माध्यम से आप अपने आस-पास का जीवन और सब कुछ देख सकते हैं।

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दुनिया 2013 को कैसे भूल सकती है, जब मिस्र में लाखों प्रदर्शनकारियों ने एक लंबे आंदोलन के बाद राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को अपनी कुर्सी से उतरने के लिए विवश कर दिया था। उस आंदोलन में सत्ता, सेना और आम लोगों के बीच मीडिया ने अपनी भूमिका उल्लेखनीय ढंग से निभाई थी। मैं भी अपने कैमरे से ली गईं तस्वीरों के जरिये मिस्र की हिंसक उथल-पुथल दुनिया को दिखा रहा था। फोटोग्राफी मेरा जुनून है, लेकिन फिलहाल मैं जेल के भीतर इसी जुनून की कीमत चुका रहा हूं।

तस्वीरें निकालने के कारण हुआ गिरफ्तार
बाईस वर्ष की उम्र में 2010 में मैंने ब्रिटिश फोटो एजेंसी डिमोटिक्स के लिए अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। 2013 में देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री और सैन्य प्रमुख जनरल अब्दल फतह अल सीसी (मिस्र के वर्तमान राष्ट्रपति, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप एक बेहतरीन शख्स कहते हैं) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की तस्वीरें खींची थीं। ये तस्वीरें टाइम और बीबीसी समेत दुनिया भर के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने प्रकाशित की थीं। उसी साल चौदह अगस्त को जनरल अब्दल ने सुरक्षा बलों के माध्यम से काहिरा के उन दो जगहों पर धावा बोल दिया, जहां प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए थे। मैं सुरक्षा बलों की अमानवीय और दमनकारी हरकतों को अपने कैमरे में कैद कर रहा था। अचानक मुझे दो अन्य विदेशी फोटोग्राफरों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन दोनों विदेशी प्रत्रकारों को तो छोड़ दिया गया, लेकिन मेरी कैद बरकरार रही।

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अपराध किए बगैर दंड, मृत्युदंड

गिरफ्तार होने के अगले लगभग ढाई साल तक मैं बिना किसी आरोप के सलाखों के पीछे रहा। बाद में मुझ पर सुरक्षा बलों की हत्या और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसे कई गंभीर आरोप मढ़ दिए गए। मैं उस प्रदर्शन स्थल पर एक फ्रीलांस पत्रकार की हैसियत से मौजूद था, इसका एक मात्र सबूत था मेरा कैमरा। लेकिन सरकार की नजरों में वह सबूत भी मुझे किसी राजद्रोही सरीखा अपराधी बनने से नहीं रोक पाया। मैंने आजीवन बंदूक को हाथ नहीं लगाया, हिंसा का तो कभी ख्याल ही नहीं आया। फिर भी मार्च, 2016 में देश की अदालत ने  कुल छह संगीन अपराधों में दोषी ठहराते हुए मुझे मृत्युदंड की सजा सुना दी।

पर अब भी उम्मीद बाकी
मैं जेल में बीमार पड़ा और हेपेटाइटिस-सी का शिकार हो गया। मैंने पत्रों के माध्यम से अपनी पीड़ा दुनिया को बताई है। ऐसे ही एक पत्र में मैंने लिखा कि इस चारदीवारी में कैद और बीमार होने के बाद मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात की है कि मेरे सपने मर रहे हैं। मेरे सपने कुछ और नहीं, बल्कि ऐसे रंगों से दूर रहना है, जिनमें न जीवन है, न ही कोई रोमांच। और यहां जेल में ऐसे ही कोरे रंग मेरी चारों तरफ हैं। जेल से लिखे मेरे पत्रों ने दुनिया में थोड़ी हलचल जरूर मचाई है। इसी का नतीजा है कि अनेक मानवाधिकार संगठन और अंतरराष्ट्रीय समूहों ने मेरी रिहाई का मोर्चा खोल रखा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी ऑनलाइन पिटिशन के जरिये पत्रकारों की रक्षा करने वाली समिति से मेरी आजादी की गुहार लगाई है।

-हाल में यूनेस्को वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज से नवाजे गए जेल में बंद मिस्र के पत्रकार से संबंधित विभिन्न रिपोर्टों पर आधारित।
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