सीरिया की राजधानी दमिश्क में जिदगी पहले से बिल्कुल बदल चुकी है। लड़ाई के बीच इस शहर में लोगों को डर और असुरक्षा की भावना में जीना पड़ रहा है।
आज सुबह फिर बिस्तर से निकलने में अजीब सा डर लग रहा है, एक ऐसा डर जिसकी सीरिया में अब आदत सी हो गई है। मैं पक्षियों के चहचहाने का आवाज सुनने की कोशिश कर रही हूं लेकिन मुझे सुनाई देता है एक तेज शोर।
ये शोर है मिग लड़ाकू हवाई जहाजों का। मैं आंखे बंद कर लेती हूं कि शायद इस सच्चाई से बच सकूं लेकिन एक के बाद एक बम के धमाकों की आवाज मुझे बार बार इस दुनिया में खींच लाती है।
धमाके
मैं ये सोचने की कोशिश नहीं करती की ये बम कहां गिरे होंगे, मैं अपनी कॉफी बनाने लगती हूं। लेकिन इसमें भी मुझे अपराध बोध महसूस होता है। आखिर सीरिया में आज कॉफी भी एक भोग-विलास की चीज बन गई है। अपनी कॉफी लेकर में छत पर जाती हूं कि मुझे दूसरा बड़ा धमाका सुनाई देता है।
छत पर मुझे मेरे पडो़सी भी नजर आते हैं। सब देख रहे हैं कहां बम फटा है, कौन मरा है, कौन बच गया। लोग अपने घर की छतों से नीचे उतर आते हैं और फिर जैसे सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो गया हो ऐसा महसूस होता है।
मैं टीवी चालू करती हूं तो उसमें तस्वीरें आ रही हैं कि विरोधी लड़ाके सेना के जवानों को मौत के घाट उतार रहे हैं। मेरा दिल कांप उठता है और मैं टीवी बंद कर कुछ संगीत सुनने की कोशिश करती हूं। हां संगीत। ये कोशिश है निराशाजनक हालातों में भीं ज़िंदगी तलाशने की।
मेरे ज्य़ादातर दोस्त दमिश्क छोड़ चुके हैं। जो नहीं जा सकते सिर्फ वही यहां रह गए हैं। उन्हें पता है कि मौत कभी भी दरवाजा खटखटा सकती है लेकिन ये वक्त तो किसी तरह गुज़ारना ही है। मौत के इस अहसास के बीच हमारे रिश्ते ज़्यादा मज़बूत हो गए हैं। हम अपने दुख के बीच भी हंसने की कोशिश करते हैं। हम ज़िंदा रहने के लिए हंसते हैं, मौत पर चुटकुले सुनते-सुनाते हैं।
हम हंसते हैं कि हमारी खूबसूरत यादें हमारे साथ बनी रहें। मौत के इस अहसास के बीच भी प्यार जिंदा है। सड़कों पर अभी भी प्रेमी हाथों में हाथ डाले नज़र आ सकते हैं। युवा लड़के और लड़कियां पेड़ों के नीचे प्यार का वो खूबसूरत पल चुराते अभी भी दिख पड़ते हैं। मैं खुश होती हूं कि उम्मीद जिंदा है। लड़ाई के समय हर अहसास कितना गहरा हो जाता है। हम चल रहे हैं क्योंकि हमें ज़िदगी से बेहद प्यार है और मौत और कत्ल से हम नफ़रत करते हैं।
उम्मीद
जिंदगी चल रही है क्योंकि हमें उम्मीद है कि हम फिर से घरों में मसालों की खुश्बू मिलेगी, बाजारों में दुकानदारों की आवाजें सुनाई देगी, सड़कों पर किस्सागो से अलिफ-लैला के किस्से फिर सुनने को मिलेंगी। मैं सोचती हूं कि हम चल रहे हैं क्योंकि हमें एक बेहतर कल की उम्मीद है।
लेकिन मेरे सोचने की कड़ी मिग विमान के शोर से फिर टूट जाती है। ये आवाज़ पिछले मिग की गूंज नहीं है, ये कोई नया हमला है। तस्वीरें नकली नहीं है, ये लाशें सचमुच लोगों के हैं। मुझे बच्चों की चीखें सुनाई दे रही हैं। माफ करना, मैं अभी भी जिंदा हूं।
(लिना सिंजाब/बीबीसी संवाददाता)