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दुनिया भर के अंदर समुद्र में जल का स्तर कितना बढ़ जाएगा?

Tue, 26 Apr 2016 12:08 PM IST
विवियन कमिंग/बीबीसी अर्थ
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आख़िर समंदर का स्तर कितना ऊंचा उठ सकता है? - फोटो : BBC
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हम काफी दिनों से सुन रहे हैं कि धरती गर्म हो रही है। जलवायु परिवर्तन हो रहा है। पर्यावरण में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। इस वजह से जल्द ही ध्रुवों पर जमी बर्फ़ पिघलेगी। इससे समुद्र में पानी बढ़ेगा। समंदर किनारे बसे शहर, छोटे-छोटे द्वीप डूब जाएंगे। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई के समुद्र तट वीरान हो जाएंगे। न्यूयॉर्क, सिडनी और मयामी के ख़ूबसूरत समंदर किनारे, पानी में डूब जाएंगे।
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अपने पसंदीदा समुद्री तट के ऐसे पानी में डूबने का तसव्वुर डराता है। मगर पर्यावरण की निगरानी करने वाले वैज्ञानिक काफ़ी वक़्त से ऐसे हालात के बारे में आगाह कर रहे हैं। वो कहते हैं कि समुद्र में पानी तेज़ी से बढ़ रहा है। इस दावे को मज़बूत बनाने के लिए वो कई सबूत होने का दावा भी करते हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो आख़िर समंदर का स्तर कितना ऊंचा उठ सकता है? इससे समुद्र के क़रीब रहने वालों पर क्या असर पड़ेगा?



पहले-पहल बीसवीं सदी की शुरुआत में वैज्ञानिकों की नज़र समुद्रों में पानी बढ़ने की तरफ़ गई थी। 1941 में जर्मन मूल के अमरीकी वैज्ञानिक बेनो गुटेनबर्ग ने समुद्र की लहरों, पानी के स्तर को मापा था। तभी उन्हें लगा था की समंदर के अंदर कुछ तो गड़बड़ हो रही है। समंदर में आने वाले ज्वार भाटा के क़रीब सौ साल के आंकड़ों का हिसाब लगाया गया तो गुटेनबर्ग का शक सही निकला। पिछले सौ सालों से समुद्र का स्तर बढ़ रहा था। हालांकि आज की तारीख़ में ज्वार-भाटा के आंकड़े भरोसेमंद नहीं माने जाते। लेकिन 1993 में अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और फ्रेंच स्पेस कंपनी ने सैटेलाइट से समुद्र के जल स्तर के आंकड़े जुटाए। इनसे साफ़ हो गया है कि समुद्र में पानी बढ़ रहा है। आज की तारीख़ में हमें ये भी मालूम है कि समंदरों का पानी, धरती के बढ़ते तापमान की वजह से ही बढ़ रहा है। विज्ञान का नियम ही ये कहता है कि गर्म होने पर पानी का दायरा बढ़ जाता है। अमरीकी वैज्ञानिक जॉन क्रैस्टिग कहते हैं कि पिछले सौ सालों में समंदर का स्तर जो बढ़ा है वो, धरती पर बढ़ रही गर्मी के चलते ही हुआ है। आगे भी ऐसा होता रहने का डर है। गर्मी बढ़ेगी तो धरती के ग्लेशियर पिघलेंगे। इनसे निकलने वाला पानी भी समंदर में ही जाकर मिलेगा। इससे कितना बुरा हो सकता है?
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इस ख़तरे का अंदाज़ा हम समंदर के पुराने स्तर का पता लगाकर कर सकते हैं। वैज्ञानिक आज समुद्र की तलहटी, वहां की चट्टानों को देखकर, ये पता लगा सकते हैं कि पहले समुद्र का पानी कहां तक पहुंचता रहा होगा। समंदर में मिलने वाले कंकाल भी इस बात की गवाही दे सकते हैं। आज से तीस लाख साल पहले धरती पर प्लायोसीन युग था। इस दौरान समंदर का पानी कहां तक था, इससे आने वाले हालात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मौरीन रेमो, पर्यावरण की दुनिया की बड़ी वैज्ञानिक हैं। वो अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़ी हैं। वो कहती हैं कि प्लायोसीन युग में धरती का तापमान आज से दो से तीन डिग्री सेल्सियस ज़्यादा था। पिछले साल ही पेरिस में हुई क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस में धरती के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी की ही पाबंदी तय हुई है। ऐसे में प्लायोसीन युग के समंदर के स्तर का पता लगाकर हम आने वाले ख़तरे को समझ सकते हैं। डराने वाली बात ये है कि प्लायोसीन युग के दौरान के समुद्र के स्तर का जो अंदाज़ा लगाया जाता है वो आज के स्तर से दस से चालीस मीटर ज़्यादा थी। मौरीन कहती हैं कि अगर इसी हिसाब से धरती गर्म होती रही, तो आगे चलकर इतना ही पानी समंदर में बढ़ना तय है।



आज फ़िक्र समंदर में बढ़ते पानी की ही नहीं, इसकी रफ़्तार को लेकर भी है। जितनी तेज़ी से समुद्र का स्तर बढ़ रहा है वो वाक़ई डराने वाला है। 2016 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक़ पिछले सौ सालों में समंदर का पानी बढ़ने की रफ़्तार, पिछली सत्ताईस सदियों से ज़्यादा तेज़ रही है। जिन आंकड़ों की मदद से ये बात कही जा रही है वो पहले के मुक़ाबले ज़्यादा भरोसेमंद हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि धरती के तापमान में मामूली बढ़ोतरी से भी समंदर के तेवर तल्ख़ हो जाते हैं। दिक़्क़त की बात सिर्फ़ ये है आंकड़े ये तो बताते हैं कि समंदर का पानी बढ़ रहा है। मगर ये बढ़कर कहां तक पहुंचेगा, इस बारे में ये आंकड़े कोई इशारा नहीं करते। वैसे कुछ वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जवाब तलाशने की भी कोशिश की है। इस बारे में हुई एक स्टडी के आंकड़े डराने वाले हैं। इनके मुताबिक़, अगर धरती का बढ़ता तापमान रोकने की कोशिश न हुई तो दुनिया भर में समुद्र का स्तर पचास से 130 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के क्लाइमेट चेंज पैनल की रिपोर्ट ने भी यही आशंका जताई है। हालांकि इसमें थोड़ा हेर-फेर हो सकता है। अगले सौ सालों में इंसान, धरती का तापमान बढ़ने से रोकने में कामयाब भी हो सकता है। या इसमें तेज़ी भी आ सकती है। दोनों ही सूरतों का अंदाज़ा लगाकर ही ये अनुमान बताए गए हैं। हालांकि अभी भी ये साफ़ नहीं कि ग्लेशियर किस रफ़्तार से पिघलने वाले हैं।



ये स्टडी जर्मनी के पॉट्सडैम में स्थित, ''क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट'' ने की थी। इससे जुड़े आंद्रे लेवरमन कहते हैं कि कंप्यूटर के मॉडल से जुटाए गए आंकड़े बेहतर तो हुए हैं। मगर ये पूरी तरह भरोसेमंद नहीं। आज अगर अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड पर जमी सारी बर्फ़ पिघल जाए तो समुद्र का स्तर एक से दो मीटर तक बढ़ जाएगा। अगर समुद्र का स्तर दो मीटर तक बढ़ता है तो ख़तरा बहुत भयानक है। हालांकि प्लायोसीन युग के आज से चालीस मीटर ऊंचे समुद्र तल के मुक़ाबले ये बहुत कम है। अमरीकी वैज्ञानिक मौरीन रेमो कहती हैं कि अब तक पहाड़ी ग्लेशियर्स की बर्फ़ ही समंदर का पानी बढ़ा रही थी। मगर धरती के बढ़ते तापमान से अब अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ़ भी पिघलने लगी है। आगे चलकर इन्हीं से समंदर में पानी बढ़ने वाला है। हालांकि इसका असर कई सदियों मे दिखेगा। सवाल ये है कि आख़िर समुद्र का स्तर कितना ऊंचा उठ सकता है?

वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर आज धरती पर मौजूद सारी बर्फ़ पिघल जाए तो समुद्र का पानी पचपन मीटर तक ऊंचा उठ सकता है। हालांकि ये हाल-फिलहाल नहीं होने जा रहा। मौरीन रेमो कहती हैं कि आख़िरी बार धरती पर ऐसा चार करोड़ साल पहले हुआ था। उस वक़्त धरती पर आज से ढाई गुना ज़्यादा कार्बन डाई आक्साइड थी। हालांकि अगर समुद्र का पानी दो मीटर भी ऊपर उठता है तो दुनिया भर में समंदर के कई किनारे डूब जाएंगे। कई द्वीपों का नामो-निशां मिट जाएगा। लाखों लोगों के रहने के ठिकाने ख़त्म हो जाएंगे। ऐसा होने से तभी रोका जा सकता है जब समंदर किनारे ऊंची दीवार बनाकर, पानी को ज़मीन पर घुसने से रोका जाए। हालांकि ये इतना महंगा होगा कि करना मुमकिन ही नहीं। दिक़्क़त ये भी है कि पूरी धरती पर समंदर का पानी एक जैसा नहीं बढ़ने वाला। कहीं इसका असर कम होगा तो कहीं ज़्यादा। अटलांटिक महासागर में पानी बढ़ने की रफ़्तार ज़्यादा तेज़ है। वहीं प्रशांत महासागर में इसके मुक़ाबले कम तेज़ी से पानी बढ़ रहा है। ऐसे में अटलांटिक महासागर के किनारे बसे इलाक़ों पर असर ज़्यादा होना तय है। तो क्या हम समुद्र के बढ़ते स्तर को रोक सकते हैं? वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसा मुमकिन है। शर्त ये है कि सरकारें और धरती का हर इंसान इस बात को लेकर संजीदा हो। हमें इसके लिए धरती का तापमान बढ़ने से रोकना होगा। इसके लिए हमें अपनी मौजूदा लाइफ़-स्टाइल में बदलाव लाना होगा।



कुछ वैज्ञानिकों ने ये भी नुस्खा बताया है कि हम समंदर से पानी वापस अंटार्कटिका पर फेंके, जहां पर ये फिर जम जाएगा। जर्मनी के ''पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट ऑफ क्लाइमेट चेंज'' ने इस नुस्खे को कंप्यूटर के मॉडल पर आज़माया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि समंदर का पानी वापस अंटार्कटिका में पंप किया जा सकता है। ये जम भी जाएगा। मगर इसके वज़न से नीचे की पिघली बर्फ़ तेज़ी से समंदर की की तरफ़ भागेगी। फिर ये काम इतना महंगा है कि मुमकिन ही नहीं। जर्मन वैज्ञानिक आंद्रे लेवरमन कहते हैं कि अगर, इंसान जिस तरह आज रह रहा है, वैसा तरीक़ा बदस्तूर जारी रहा तो ये नुस्खे भी फेल हो जाने हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि धरती को गर्म करने वाली ग्रीनहाउस गैसों की तादाद कम करनी ही होगी। साथ ही समंदर के किनारे स्थित बस्तियों की सुरक्षा के इंतज़ामों पर भी ध्यान देना होगा। ये काम कितना बड़ा है इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि धरती की कुल आबादी के चवालीस फ़ीसद लोग, समुद्र तट से डेढ़ सौ मीटर के दायरे में रहते हैं। इन लोगों को समुद्र के किनारों से दूर हटाना बड़ा काम है। कोई भी अपना बसा बसाया घर छोड़कर नहीं जाना चाहेगा। फिर समुद्र किनारे उन्हें तरह-तरह के रोज़गार मिल जाते हैं। आज से बीस हज़ार साल पहले इंसान ने धरती पर हिम युग का सदमा झेला था। तब समुद्र का स्तर आज से एक सौ बीस मीटर कम था। पानी, ग्लेशियरों में बंद था। आज से क़रीब आठ हज़ार साल पहले जब ग्लेशियर पिघले और पानी का स्तर बढ़ा तब तक समुद्र तट क़रीब सौ मीटर पीछे खिसक चुके थे।



उस वक़्त इंसान ने क़ुदरत का दिया ये सदमा जिस तरह झेला था उसके क़िस्से आज भी आदिवासियों के बीच चलन में हैं। इंग्लैंड के समुद्र तट से कुछ ही दूरी पर उस युग की यादें समंदर की लहरों के अंदर देखने को मिलती हैं। जहां सदियों पहले इंसान के रहने के निशां मिले हैं। ब्रिटेन हमेशा से एक द्वीप नहीं था। कभी ये यूरोप से जुड़ा हुआ था। समुद्र के बढ़ने स्तर ने इसे यूरोप से अलग कर दिया।
आज हम फिर उसी ख़तरे के मुहाने पर खड़े हैं। धरती का बढ़ता तापमान और समुद्र का पानी हमें उस ख़तरे की तरफ़ धकेल रहा है, जिसका सामना आने वाली पीढ़ियों को करना पड़ सकता है।
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