असद ने दमिश्क यूनिवर्सिटी से 1988 में नेत्र विज्ञान की पढ़ाई की थी और आगे की पढ़ाई के लिए 1992 में वह लंदन चले गए थे। जब भाई की मौत हुई तो वह लंदन में ही थे। सियासत में उनकी रुचि कम थी, लेकिन सत्ता संभालने की तैयारी के लिए पिता ने उन्हें वापस दमिश्क बुला लिया। 1994 में बशर एक टैंक बटालियन कमांडर बने, फिर 1997 में लेफ्टिनेंट कर्नल बने और 1999 में कर्नल बना दिए गए। पिता के निधन के बाद साल 2000 में बशर अल-असद राष्ट्रपति बने। उन्हें एक नियंत्रित और दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था विरासत में मिली थी, जहां शासक के करीबी लोगों में अलावी शिया समुदाय के सदस्यों का वर्चस्व था। असद परिवार भी इसी समुदाय से है। 74 फीसदी सुन्नी आबादी वाले सीरिया में अलावी शिया समुदाय की आबादी सिर्फ 5 से 10 फीसदी है।
खुलकर नहीं चला पाए आधुनिकतावादी एजेंडा
उस वक्त आधुनिकतावादी और इंटरनेट समर्थक कहे जाने वाले बशर ने वादा किया कि वे नए सिरे से स्वतंत्रता लाएंगे और सीरियाई बाजार को खोलेंगे। उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया और मीडिया पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी। इस दौरान राजनीतिक बहस और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में निडर होकर बातें कही गईं। लेकिन उनके ये खुलेपन वाले सुधारवादी प्रयास ज्यादा समय तक नहीं चल सके। बदलाव की गति ने सेना, उनकी अपनी बाथ पार्टी और अलावी शिया समुदाय के कान खड़े कर दिए। असुरक्षा के डर और अपना असर घटने की आशंका को देखते हुए उन्होंने असद पर दबाव बनाकर न सिर्फ इस बदलाव की गति को धीमा किया, बल्कि कई मोर्चों पर पुरानी परंपरावादी स्थितियों की हिमायत की।
विदेश नीति
विदेश नीति के मोर्चे पर बशर अल-असद ने इसराइल पर अपने पिता की तरह कठोर विदेश नीति अपनाई। उन्होंने बार बार कहा कि जब तक कब्जाई गई जमीन पूरी तरह लौटाई नहीं जाती, शांति नहीं स्थापित होगी। उन्होंने इसराइल के विरोधी चरमपंथी गुटों को समर्थन देना भी जारी रखा। 2003 में इराक में अमेरिका की अगुवाई वाले दखल की उन्होंने कड़ी आलोचना की। सीरिया की ओर से इराक के विद्रोही गुटों को समर्थन भी दिया गया, जिससे अमेरिका खासा नाराज हुआ। साल 2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या के बाद अमेरिका और सीरिया के संबंध और खराब हो गए। इस हत्या का शक राष्ट्रपति असद, उनके करीबी शिया बहुल 'इनर सर्कल' और सीरियाई सुरक्षा सेवाओं पर जाहिर किया गया। असद सरकार को रूस, अपने पारंपरिक सहयोगी ईरान और ईरान के समर्थन वाले लेबनानी चरमपंथी गुट हिजबुल्ला से मजबूत कूटनीतिक और सैन्य सहयोग मिलता रहा।
फिर 2011 में जब मशहूर 'अरब स्प्रिंग' विरोध प्रदर्शनों ने ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्तापलट कर दिया तो असद ने कहा कि सीरिया इस क़िस्म की बगावतों से पूरी तरह सुरक्षित है। बड़ी संख्या में लोग असद सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे, जिनमें निगरानी समूहों के मुताबिक, दो हजार से ज्यादा मौतें हुईं। असद ने प्रदर्शनकारियों की मांगें पूरी करने से इनकार कर दिया और प्रदर्शनों का हिंसक दमन किया। लेकिन सुरक्षा बलों की निर्मम कार्रवाइयां भी अरब स्प्रिंग की आवाज को दबा नहीं सकीं, बल्कि इसके बाद ये प्रदर्शन सशस्त्र संघर्ष में बदल गए। इन विद्रोहियों से असद की सरकारी सेनाएं लड़ रही हैं और एक समांतर लड़ाई इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों से भी जारी है। इस गृह युद्ध में अब तक एक करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हो चुके हैं। तब से असद सीरिया की सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
क्षेत्रीय और विश्व शक्तियों को इस विवाद में दखल देना पड़ा है। ईरान और रूस सीरिया की सरकार को सैन्य और वित्त सहयोग दे रहे हैं, जबकि सुन्नी बहुल विपक्ष को अरब के खाड़ी देशों, तुर्की और पश्चिमी देशों का समर्थन है। दोनों पक्ष कहते हैं कि राजनीतिक हल ही इस विवाद को सुलझा सकता है। लेकिन युद्धविराम रोकने और संवाद शुरू करने की कई कोशिशें नाकाम रही हैं। इसीलिए सीरिया के गृह युद्ध के समाधान में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि असद को सत्ता में रहना चाहिए या नहीं। कई जानकार यह मानते हैं कि बशर नैसर्गिक तौर पर सुधारवादी ही थे और पूरी नेकनीयती से सीरिया में खुलापन लाना चाहते थे लेकिन उनके पिता के विश्वस्त परंपरावादी गुटों ने उन्हें विवश रखा। लंदन स्थित रिसर्च इंस्टिट्यूट चैथम हाउस के नील क्विलियम मानते हैं कि इसके बावजूद बशर ने पूरी सतर्कता से कुछ पश्चिमी पत्रकारों, अकादमिकों और नीति-निर्माताओं से संबंध रखे, ताकि वह उनकी पहुंच में दिख सकें।