मालदीव के साथ भारत के संबंध बेहद नाजुक हैं जिसका कारण है हिंद महासागर में चीन का बढ़ता प्रभाव। अब भारत के लिए यह बहुत बड़ी दुविधा होगी कि जब एशिया महाद्वीप के लगभग सभी देश इंडोनेशिया का समर्थन कर रहे हैं तो वह मालदीव का समर्थन कैसे करेगा।
अस्थाई सदस्यता के लिए किसी भी देश को समर्थन देने का सीधा प्रभाव एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर पड़ेगा। इस पॉलिसी में इंडोनेशिया का अहम रोल माना जाता है। भारत के लिए सीधे तौर पर इंडोनेशिया को मना करना आसान नहीं होगा। वहीं भारत के लिए मालदीव को मना करना भी आगे चलकर देश की विदेश नीति के सामने मुसीबत खड़ी कर सकता है। जानकारी के लिए बता दें एक्ट ईस्ट पॉलिसी की शुरुआत मोदी सरकार ने की थी। जिसका उद्देश्य एशिया प्रांत क्षेत्र में ध्यान केंद्रित करना था।
वहीं सोमवार को हुई वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री
सुषमा स्वराज ने मालदीव के बारे में कहा था, "पिछले दिनों मालदीव के साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव आया है। लोकिन मालदीव के साथ ना रिश्ते टूटे हैं और ना ही कभी टूट सकते हैं।" अब भारतीय अधिकारियों पर निर्भर करता है कि अपनी सूझ बूझ से वह किसे समर्थन देते हैं।