श्रीलंका में राजनीतिक संकट के पीछे भारत और चीन की आपसी खींचतान नजर आ रही है। दोनों देश बंदरगाह, एयरपोर्ट जैसे बड़े आधारभूत परियोजना के लिए जोर लगा रहे हैं। मालूम हो कि चीन की कंपनी श्रीलंका में 1.5 अरब डॉलर से एक नए कॉर्मिशियल डिस्ट्रिक्ट का निर्माण किया है। इसमें होटल और मोटर रेसिंग ट्रैक जैसी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।
चीन श्रीलंका में एक बड़ा कंटेनर टर्मिनल भी बना चुका है। वहीं भारत भी श्रीलंका में बंदरगाह समेत अन्य परियोजना में भागीदारी कर रहा है। श्रीलंका में राष्ट्रपति सिरिसेना और पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के बीच के विवाद को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अधिकारियों और विदेशी राजनयिकों का कहना है कि श्रीलंका में भारतीय हित को सुरक्षित करने के मसले पर ही यहां की सरकार में विवाद पैदा हुआ।
सिरिसेना ने 26 अक्टूबर को रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर चीन समर्थक राजनेता माने जाने वाले महिंदा राजपक्षे को पीएम बनाया था। विक्रमसिंघे ने बताया है कि पिछले महीने राष्ट्रपति के नेतृत्व वाली कैबिनेट बैठक में तीखी बहस हुई। यह बहस कोलंबो बंदरगाह के प्रॉजेक्ट को जापान-भारत के जॉइंट वेंचर को देने के प्रस्ताव पर हुई। हालांकि विक्रमसिंघे ने राष्ट्रपति का नाम नहीं लिया लेकिन कहा कि कैबिनेट बैठक में इसे भारत-जापान को नहीं देने का पत्र पेश किया गया था।
विक्रमसिंघे के मुताबिक उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि अंतिम फैसले में भारत, जापान और श्रीलंका के बीच हुए एमओयू का सम्मान होना चाहिए। इस बैठक में मौजूद श्रीलंका के पूर्व मंत्री रजीता सेनारत्ने ने इस बात की पुष्टि की है कि राष्ट्रपति और पीएम के बीच बहस हुई थी। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि श्रीलंका के विकास में सहयोग देने के लिए उसकी प्रतिबद्धता है।