म्यांमार के उत्तरी रखाइन प्रांत में हाल ही में बढ़ी हिंसा के साथ साथ सोशल मीडिया पर भ्रमित करने वाली तस्वीरों की भी भरमार है। इनमें से बहुत सारी तस्वीरें वीभत्स और भड़काऊ हैं। कई वीडियो और तस्वीरें गलत भी हैं।
रखाइन प्रांत में पहले भी कई बार हो चुका है खूनी संघर्ष
रोहिंग्या मुस्लिमों और बहुसंख्यक बौद्ध लोगों के बीच गहरे अविश्वास के कारण रखाइन प्रांत में पहले भी कई बार खूनी संघर्ष हो चुका है। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को नागरिकता नहीं दी गई है और कई दशकों से इस अल्पसंख्यक समुदाय का उत्पीड़न होता रहा है।
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रखाइन प्रांत में पत्रकारों की पहुंच सीमित है और वहां से मिलने वाली जानकारी कम है। जो पत्रकार रखाइन प्रांत में पहुंच पाए हैं, उनके मुताबिक बेहद विस्फोटक स्थिति और रोहिंग्या मुस्लिमों के प्रति गहरी नफ़रत के कारण जानकारी जुटाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
रखाइन में क्या हो रहा है? वो बातें जो हमें पता हैं :-
कई महीनों तक तनाव के बाद पिछले हफ्ते, ख़ुद को अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी कहने वाले एक गुट ने कम से कम 25 पुलिस पोस्ट पर हमला कर दिया था।
कई इलाकों से संघर्ष की ख़बरें आईं। कई बार रोहिंग्या गांव वाले भी म्यांमार की सेना से लड़ाई में चरमपंथियों का साथ देते हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक़ कई मामलों में सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुस्लिमों के गांवों को जला दिया है। इसमें कई बार सेना को बौद्ध नागरिकों का समर्थन भी मिलता है।
बौद्ध समुदाय पर भी कई हमले हुए हैं और बौद्ध समुदाय के कई सदस्यों की मौत की ख़बरें हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 40,000 रोहिंग्या मुस्लिम सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंचे हैं। रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार की कई कहानियां सामने आईं हैं।
फर्ज़ी तस्वीरें ट्वीट कर निशाने पर आए
म्यांमार हिंसा की फर्जी तस्वीर
29 अगस्त को तुर्की के उप प्रधानमंत्री मेहमत सिमसेक ने चार तस्वीरें ट्वीट कीं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रोहिंग्या मुस्लिमों के जातीय नरसंहार को रोकने की अपील की थी। ट्विटर पर उनके पोस्ट को 1,600 बार रिट्वीट किया गया और 1,200 यूज़र्स ने इसे लाइक किया। लेकिन इन तस्वीरों की प्रामाणिकता पर सवाल करते हुए उनकी आलोचना भी हुई। उनके ट्वीट के तीन दिन बाद, कई लोगों ने इन तस्वीरों के सही होने पर सवाल उठाए और सिमसेक को इस पोस्ट को हटाना (डिलीट) करना पड़ा।
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फूले हुए शवों वाली पहली तस्वीर के बारे में इंटरनेट पर पता करना सबसे मुश्किल है। सिमसेक को चुनौती देने वाले म्यांमार में कई लोगों का कहना है ये तस्वीर साल 2008 में आए चक्रवात नरगिस से हुई तबाही की है। जबकि कई लोगों का मानना है कि तस्वीर में नज़र आ रहे शव म्यांमार में हुए नाव हादसों में मारे गए लोगों के हैं।
हादसों के बारे में पता करने पर नहीं मिली ऐसी तस्वीर
जबकि इन हादसों के बारे में पता करने पर ऐसी तस्वीर नहीं मिल पाती। लेकिन कई वेबसाइट पर पिछले साल की तारीख़ के साथ ये तस्वीर मिलती है। (विचलित करने वाली तस्वीरों के कारण उन वेबसाइट के लिंक हम यहां नहीं दे रहे हैं)। इससे ये समझा जा सकता है कि ये तस्वीर रखाइन प्रांत में हाल ही में हुई हिंसा की नहीं है। तो वहीं, बीबीसी ने दूसरी तस्वीर के बारे में पता लगाने की कोशिश की जिसमें एक पेड़ पर बंधे शव के पास रो रही महिला नज़र आ रही है। बीबीसी की छानबीन में पता चलता है कि ये तस्वीर समाचार एजेंसी रॉयटर्स के एक फ़ोटोग्राफर ने जून 2003 में इंडोनेशिया के आचेह में ली थी।
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तीसरी तस्वीर में दो नन्हे बच्चे अपनी मां के शव के पास रोते नज़र आ रहे हैं, ये तस्वीर जुलाई 1994 में रवांडा में ली गई थी। ये तस्वीर सिपा के लिए अलबर्ट फ़ाकेली ने ली थी और वर्ल्ड प्रेस अवॉर्ड जीतने वाली तस्वीरों में से एक है। जबकि चौथी तस्वीर के बारे में जानकारी हासिल करना भी मुश्किल है। एक नहर में खड़े लोगों की ये तस्वीर नेपाल में हाल ही में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए मदद मांगने वाली एक वेबसाइट पर देखी गई।
रोहिंग्या मुस्लिमों के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जंग
म्यांमार हिंसा की फर्जी तस्वीर
रोहिंग्या मुस्लिमों के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जैसे जंग छिड़ी हुई है और दोनों पक्षों पर एक दूसरे को जवाब देने वाली कहानियां पोस्ट करने की होड़ है। बीबीसी संवाददाता के पास भी कई ऐसी तस्वीरें आईं हैं जो इस नरसंहार का शिकार हुए लोगों की हालत दिखाती हैं लेकिन इनकी प्रामाणिकता की पुष्टि आसान नहीं है। लेकिन ये साफ़ है कि कई तस्वीरें बिल्कुल ग़लत है। तस्वीर जो बीबीसी संवाददाता को भेजी गई थी, कथित तौर पर रोहिंग्या मुस्लिमों को राइफ़ल के साथ दिए जा रहे प्रशिक्षण की है, लेकिन ये तस्वीर 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ले रहे बांग्लादेशियों की है।
तस्वीरों और वीडियो की सच्चाई जानना एक बड़ी समस्या
इसी साल संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने रखाइन प्रांत में कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर शोध किया, इस आयोग ने ऐसी किसी तस्वीर या वीडियो का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जो उसने खुद न लिया हो क्योंकि इस तरह की तस्वीरों और वीडियो की सच्चाई जानना एक बड़ी समस्या है। ये रिपोर्ट आयोग की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तृत जानकारी देती है।
इस रिपोर्ट में रोहिंग्या समुदाय के साथ हो रही क्रूरता और मानवता के खिलाफ़ अपराध जैसी कार्रवाई के बारे में बताया गया था। म्यांमार की सरकार ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया और फ़ैक्ट फ़ाइडिंग मिशन के सदस्यों को रखाइन प्रांत का वीज़ा देने से इनकार कर दिया। यहां जो जानकारी हम दे रहे हैं वो अलग अलग स्रोतों से जुटाकर ली गई है, इससे रखाइन प्रांत में गंभीर संघर्ष और बड़े पैमाने पर हो रही मौतों की तस्वीर साफ़ होती है।
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ऐसा लगता है कि दोनों तरफ़ से हमले किए जा रहे हैं लेकिन सुरक्षा बल और हथियारबंद स्थानीय नागरिकों के लगातार हमलों से रोहिंग्या मुस्लिमों की हालत ज़्यादा ख़राब हो गई है। रखाइन प्रांत में तटस्थ पर्यवेक्षकों की सीमित पहुंच के कारण यहां की तस्वीर तो पूरी तरह साफ़ होने में वक्त लगेगा। लेकिन सोशल मीडिया पर अपुष्ट फर्ज़ी तस्वीरों और वीडियो के कारण दोनों पक्षों में कड़वाहट भी बढ़ेगी और संभव है कि हिंसक संघर्ष और गहराता जाएगा।
'रोहिंग्या मुसलमानों के 700 से अधिक घर जलाकर तबाह किए'
म्यांमार में इन दिनों भयंकर हिंसा भड़क उठी है। रोहिंग्या मुसलमान और सुरक्षाबलों के बीच हुए संघर्ष में अब तक लगभग 400 लोग मारे गए हैं। हिंसा के चलते म्यांमार में हालात ऐसे हैं कि स्थानीय रोहिंग्या मुस्लिम मजबूरन भागकर बांग्लादेश पहुंच रहे है।
तबाही के बारे में गंभीरता से सोचने पर विवश
मानवाधिकार समूह ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि म्यांमार से मिली नई सैटेलाइट तस्वीरों से साफ़ पता चलता है कि रोहिंग्या मुसलमानों के एक गांव में 700 से अधिक घर जलाकर तबाह कर दिए गए हैं। समूह का कहना है कि ताज़ा तस्वीरें उत्तरी रखाइन प्रांत में तबाही के बारे में गंभीरता से सोचने पर विवश करती हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, पूर्वोत्तर म्यांमार में इस हफ्ते अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान और सुरक्षाबलों के बीच हुए संघर्ष में लगभग 400 लोग मारे गए हैं। हिंसा की वजह से रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी वाले गांवों से लगभग 40 हज़ार लोग भागकर बांग्लादेश चले गए हैं।
सड़कों के किनारे कई अस्थायी तंबू
बांग्लादेश में मौजूद संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी की एक वरिष्ठ अधिकारी विवियन टेन का कहना है, ''यहां पर इस समय एक अनुमान के मुताबिक दस हज़ार ऐसे लोग हैं जो शरणार्थी शिविर में नए-नए आए हैं। सड़कों के किनारे कई अस्थायी तंबू नज़र आ रहे हैं। हर खाली जगह भरती जा रही है।'' विस्थापित हुए रोहिंग्या मुसलमानों का आरोप है कि सैनिक जान-बूझकर उनके ठिकानों में आग लगाते हैं। हालांकि म्यांमार की सरकार इस आरोप से इंकार करती है।
आख़िर रोहिंग्या कौन हैं? इनसे म्यांमार को क्या दिक्क़त है? ये भागकर बांग्लादेश क्यों जा रहे हैं? इन्हें अब तक नागरिकता क्यों नहीं मिली? आंग सान सू ची दुनिया भर में मानवाधिकारों की चैंपियन के रूप में जानी जाती हैं और उनके रहते यह ज़ुल्म क्यों हो रहा है?
आख़िर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान
म्यांमार हिंसा
ऐसा कहा जाता है कि दुनिया में रोहिंग्या मुसलमान ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिस पर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हो रहा है। आख़िर रोहिंग्या कौन हैं? इनसे म्यांमार को क्या दिक्क़त है? ये भागकर बांग्लादेश क्यों जा रहे हैं? इन्हें अब तक नागरिकता क्यों नहीं मिली? आंग सान सू ची दुनिया भर में मानवाधिकारों की चैंपियन के रूप में जानी जाती हैं और उनके रहते यह ज़ुल्म क्यों हो रहा है?
रोहिंग्या कौन हैं?
दरअसल म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक़ 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। रखाइन स्टेट में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।
बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था।
आख़िर रखाइन राज्य में हो क्या रहा है?
आपको बता दें कि म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर 9 पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बाद पिछले महीने रखाइन स्टेट में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया था। सरकार के कुछ अधिकारियों का दावा है कि ये हमला रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने किया था। इसके बाद सुरक्षाबलों ने मौंगडोव ज़िला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और एक व्यापक ऑपरेशन शुरू किया।
रोहिंग्या कार्यकर्ताओं का कहना है कि सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप लग रहे हैं। सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या के आरोप लग रहे हैं। हालांकि सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। कहा जा रहा है कि सैनिक रोहिंग्या मुसलमानों पर हमले में हेलिकॉप्टर का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या म्यांमार सरकार इसके लिए दोषी है?
म्यांमार हिंसा
म्यांमार में 25 वर्ष बाद पिछले साल चुनाव हुआ था। इस चुनाव में नोबेल विजेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली थी। हालांकि संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं। सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। हालांकि कहा जाता है कि वास्तविक कमान सू ची के हाथों में ही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सू ची निशाने पर हैं। आरोप है कि मानवाधिकारों की चैंपियन होने के बावजूद वे खामोश हैं। सरकार से सवाल पूछा जा रहा है कि आख़िर रखाइन में पत्रकारों को क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है। राष्ट्रपति के प्रवक्ता ज़ाव हती ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी ग़लत रिपोर्टिंग हो रही है।
क्या कर रही हैं आंग सान सू ची?
आंग सान सू ची अभी अपने मुल्क की वास्तविक नेता हैं। हालांकि देश की सुरक्षा आर्म्ड फोर्सेज के हाथों में है। यदि सू ची अंतराष्ट्रीय दवाब में झुकती हैं और रखाइन स्टेट को लेकर कोई विश्वसनीय जांच कराती हैं तो उन्हें आर्मी से टकराव का जोखिम उठाना पड़ सकता है। उनकी सरकार ख़तरे में आ सकती है।
पिछले 6 हफ्तों से आंग सान सू ची पूरी तरह से चुप हैं। वह इस मामले में पत्रकारों से बात भी नहीं कर रही हैं। जब इस मामले में उन पर दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा था कि रखाइन स्टेट में जो भी हो रहा है वह 'रूल ऑफ लॉ' के तहत है। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आवाज़ उठ रही है। म्यांमार में रोहिंग्या के प्रति सहानुभूति न के बराबर है। रोहिंग्या के ख़िलाफ़ आर्मी के इस क़दम का म्यांमार में लोग जमकर समर्थन कर रहे हैं।
बांग्लादेश की आपत्ति
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को म्यांमार के राजदूत से इस मामले पर गहरी चिंता जताई है। बांग्लादेश ने कहा कि परेशान लोग सीमा पार कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में यहां आ रहे हैं।बांग्लादेश ने कहा कि सीमा पर अनुशासन का पालन होना चाहिए। बांग्लादेश अथॉरिटी की तरफ से सीमा पार करने वालों को फिर से म्यांमार वापस भेजा जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसकी कड़ी निंदा की है और कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।
बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा है। रोहिंग्या और शरण चाहने वाले लोग 1970 के दशक से ही म्यांमार से बांग्लादेश आ रहे हैं। इस हफ्ते की शुरुआत में ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक सैटलाइट तस्वीर जारी की थी। इसमें बताया गया था कि पिछले 6 हफ्तों में रोहिंग्या मुसलमानों के 1,200 घरों को तोड़ दिया गया।