खून, टिश्यू या फिर बालों की जड़ से डीएनए लिया जा सकता है। अगर शव को दबे कई दिन हो चुके हैं और वो काफी खराब हालत में है तो ह्यूमरस या फीमर जैसी लंबी हड्डियों से सैम्पल लिए जा सकते हैं। इसके अलावा दांत भी डीएनए सैम्पल लेने के काम आते हैं। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के फॉरेंसिक चीफ डॉक्टर सुधीर गुप्ता ने बीबीसी को बताया डीएनए को दुनिया भर में सबसे वैज्ञानिक तरीका माना जाता है और सैम्पल जांच के लिए ब्लड रिलेटिव चाहिए होता है।
शव कैसे पहचाना जाता है?
मां-बाप, बेटा-बेटी या दादा-दादी, पोता-पोती हो, इनसे सैम्पल लिया जा सकता है। इसके बाद शव के सॉफ्ट टिश्यू या बोन मैरो को इस सैम्पल से मिलाया जाता है। लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि एक सैम्पल का 70 फीसदी मैच मिला है, इसका क्या मतलब है? डॉ गुप्ता ने कहा, ''इसमें पर्सेंटेज कुछ नहीं होता। लोकाई होता है। अगर एक स्तर तक लोकाई मैच होता है, तो सैम्पल मैच माना जाता है। 12-15 चीजें मैच की जाती हैं। और इन सभी के नतीजे मिलकर फैसले तक पहुंचाते हैं।''
शव सड़ जाए, फिर भी मैचिंग?
शव इतने दिन तक दबा रहता है, फिर टिश्यू कैसे बचे रहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''बोन मैरो से सैम्पल मिल जाते हैं, बालों से मिल जाते हैं।'' और कितने वक्त बाद तक शव इस स्थिति में रहता है कि उससे सैम्पल के लिए टिश्यू मिल जाएं, इस पर उन्होंने कहा, ''जब तक शव में से टिश्यू मिल सकते हैं, डीएनए मैच किया जा सकता है।'' ''और टिश्यू कब तक बचे रहते हैं, ये अलग-अलग बातों पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में सालों-साल तक। खास तौर से बोन मैरो से सैम्पल मिल जाते हैं।''
डीएनए से पहले क्या होता था?
किन चीजों से डीएनए मैच किया जा सकता है, डॉ गुप्ता ने कहा, ''खून, बाल, नाखून, लार, बोन मैरो, इन सभी से मैचिंग की जा सकती है।'' डीएनए मैचिंग से पहले शवों की पहचान कैसे की जाती थी, उन्होंने बताया, ''बहुत मुश्किल या यूं कहें कि करीब-करीब नामुमकिन होता था।'' ''जबड़े के आकार या फिर दूसरी शारीरिक संरचनाओं से अंदाजा लगाया जाता था लेकिन डीएनए के बाद ये सब बहुत आसान हो गया।''