फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मास्को की आधी आबादी एलर्जी की चपेट में 

Fri, 29 Jun 2018 06:09 AM IST
मास्को से प्रकाश पुरोहित
विज्ञापन
Moscow
विज्ञापन
जब हम रूस की कल्पना करते हैं तो लाल-लाल माहौल में सफेद-सफेद बरफ उड़ती दिखाई देती है। रूस और बरफ का जैसे अटूट रिश्ता हो....! हम कल्पना ही नहीं करते हैं कि रूस में चटख धूप भी निकल रही है। इन दिनों मास्को में मौसम गरम जरूर है, लेकिन सफेद-सफेद बरफ का एहसास इसलिए हो रहा है कि रूई के फाहे मास्को की सड़कों, हवाओं में तैरते नजर आ रहे हैं। जैसे सेमल के बीजों की रूई होती है ना, ठीक वैसी ही रूई मास्को की सड़कों पर उड़ती रहती है। पहले दिन तो यही लगा था कि आसपास कोई रूई की फैक्टरी या गोदाम होगा, लेकिन दो-तीन दिन में ही समझ आ गया कि ये रूई तो पूरे शहर पर कब्जा किए है। 
विज्ञापन


कहीं बहुत ज्यादा है तो कहीं कम! यहां के लोग इन रूई के फाहों के आदी हैं तो इन्हें फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन जो बाहर से आता है, हैरत से देखता रहता है, चेहरा साफ करता है और कपड़े झाड़ता रहता है! अगर थूकने का कोई वर्ल्ड कप होता तो यकीनन रूस को ही मिलता, क्योंकि यहां का आम आदमी दिनभर में न जाने कितनी बार सड़क पर थूकता है। अचरज की बात यह है कि इस बात पर कोई एतराज भी नहीं करता और न ही कहीं लिखा देखा है कि, ‘थूकने पर 500 रूबल दंड देना होगा।’ यह धारणा पहले ही दिन दम तोड़ चुकी थी कि भारत के लोग सड़कों पर ज्यादा थूकते हैं। 

एक और चौंकाने वाली बात यह देखी कि मास्को की सड़कों पर सुबह-सुबह रोज धुलाई होती है। सरकारी गाड़ी आती है और पानी फैला कर चली जाती है। समझ नहीं आया कि ऐसी साफ-सुथरी सड़कों को धोने या पानी डालने की जरूरत क्या है। सफाई करने वाले तो नजर नहीं आते हैं, लेकिन पानी ढोलने वाली गाड़ियां रोज ही नजर आ जाती हैं। ऊपर लिखी सभी बातों का आपस में गहरा रिश्ता है। 
विज्ञापन


पहली बात...मास्को में पोपोल-सीड नाम का पेड़ होता है, जिसमें सर्दी में पीले फूल खिलते हैं, लेकिन जब गरमी का मौसम आता है तो ये पीले फूल धूप में सूखने लगते हैं और फिर हवा के साथ रूई के फाहों की तरह उड़ने लगते हैं। दरअसल ये उड़ते ही नहीं हैं, लोगों के मुंह में भी रेशा-रेशा होकर चले जाते हैं, जिसकी वजह से मुंह में सरसराहट होती है, गले में खसखसाहट होती है और घबरा कर आदमी थूकने लगता है। सड़क पर पानी भी इसलिए ढोला जाता है कि जो रूई सड़क पर बैठ गई है, पानी से गीली हो जाए और उड़ न सके। 

पूरे मास्को में इस तरह के लाखों पेड़ हैं, इसलिए इन्हें एकदम साफ भी नहीं किया जा सकता कि आबोहवा के लिए जरूरी हैं। जहां ज्यादा हो जाते हैं, वहां आरी भी चल जाती है। फूल ही धूप में गरमी पाकर सफेद रूई छोड़ने लगते हैं, वरना तो पूरा पेड़ हरा रहता है। कुछ-कुछ जवान पेड़ ऐसे भी देखे हैं, जैसे जवानी में बुढ़ापा आ गया है- पूरे के पूरे सफेद! केरल के रहने वाले हड्डी के सर्जन डॉ. रवि ने बताया कि इस मौसम में एलर्जी के मरीज बेतहाशा बढ़ जाते हैं। आधी आबादी तो पक्की तौर पर एलर्जी की शिकार हो ही जाती है। कई ऐसे हैं, जो गरमी का मौसम आते ही एंटी-एलर्जिक दवाइयां खाने लगते हैं। 

ऐसा वे बरसों से कर रहे हैं। दमे की शिकायत आम बात है। जब दुनियाभर के सैलानी इस हसीन मौसम में रूस घूमने आते हैं, रूस यानी खासतौर पर मास्को के लोग कहीं और घूमने निकल जाते हैं, ताकि रूई के फाहे न फांकना पड़े और एंटी-एलर्जिक दवाइयां न खाना पड़े। सबसे ज्यादा मुसीबत बच्चों की होती है, जो बचपन से ही इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। सच है कोई देश कितना ही ताकतवर या महान क्यों न हो जाए, प्रकृति के सामने घुटने टेक देता है। रूस को तो रूई के फाहे ने ही हिला कर रखा हुआ है। इसका इलाज यही है कि पूरी जमीन से ये पीले फूलवाले पेड़ जड़ से साफ कर दिए जाएं। और ऐसा होना अभी तो संभव नजर नहीं आ रहा है।
विज्ञापन



 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें