नेपाली आर्मी के रेडियो स्टेशन चलाने के प्रस्ताव पर पूरे देश में जोरदार बहस चल रही है। स्थानीय मीडिया की खबरों से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोग सवाल
पूछ रहे हैं कि किसी लोकतंत्र में सेना को प्रसारक की भूमिका निभानी चाहिए या नहीं।
दूसरी तरफ नेपाली आर्मी का कहना है कि रेडियो स्टेशन का इस्तेमाल लोगों को सेना की गतिविधियों और कामकाज के बारे में बताने के लिए किया जाएगा। हालांकि
आलोचक इस पर आशंका जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन रेडियो स्टेशनों के दुरुपयोग की संभावना है और आने वाले समय में सेना अपना प्रभुत्व कायम करने
की कोशिश कर सकती है।
नेपाल फिर से बनेगा हिंदू राष्ट्र?
पिछले महीने सेना ने देश के सुदूर पश्चिमी शहर दीपायल में एक एफ़एम रेडियो चैनल का टेस्ट ट्रांसमिशन शुरू किया। दिसंबर, 2016 में नेपाल के सूचना और प्रसारण
मंत्रालय ने इस योजना को मंजूरी दी थी जिसके तहत सेना ये कदम उठा रही है।
सेना की गतिविधियां
योजना के तहत नेपाल की सेना को देश के सभी सात राज्यों में एफ़एम रेडियो स्टेशन चलाने की इजाजत दी गई थी। देश की असैनिक परियोजनाओं में नेपाली सेना भूमिका
निभाती रहती है जैसे मेडिकल कॉलेज चलाना, पेयजल संयंत्र लगाना और यहां तक कि शादी के लिए बैंक्वेट वेन्यू का भी वो प्रबंधन करती है।
सेना ने रेडियो स्टेशन चलाने की योजना को अपनी इन्हीं गतिविधियों के हिस्से के तौर पर देखा। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल की सरकार ने मई में एक सड़क परियोजना
का काम सेना को सौंप दिया था जिसके लिए विपक्षी पार्टियों और लोकल मीडिया ने उन्हें जमकर आड़े हाथों लिया था। और अब ये सवाल उठ रहा है कि सेना एक स्वतंत्र
प्रसारक के तौर पर क्यों काम करना चाहती है।