कीनिया अफ़्रीका की उन तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिससे खासी उम्मीदे हैं, लेकिन बेरोज़गारी सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है।
जहाँ चीन से निवेश आने से कीनिया का एक वर्ग खुश है, एक दूसरा वर्ग बेरोज़गारी के लिए भ्रष्टाचार के साथ-साथ चीन की कंपनियों को भी ज़िम्मेदार ठहराता है।
राजधानी नैरोबी में एक अखबार की फ़ैक्टरी के बाहर मेरी मुलाकात 20-25 काले बेरोज़गार युवकों से हुई।
सभी की तरह कार्डिस ओइनो भी सुबह छह बजे से बड़े से लोहे के गेट के बाहर खड़े थे। दोपहर हो चली थी लेकिन फ़ैक्टरी के भीतर से कोई बुलावा नहीं आया था। काम भी कोई बहुत बड़ा नहीं। सामान को या तो ट्रक पर रखना था या फिर एक जगह से दूसरी जगह ले जाना था।
बेहद निराश आवाज़ में वो बोले, “चीन की कंपनियों अपने लोगों को साथ लाती हैं और यहीं काम करवाती हैं, वही काम जो हम कीनिया के लोग कर सकते हैं।”
असंतोष
अफ़्रीका में अपने लोग लेकर आ रही हैं जिसके कारण अफ़्रीका के कुछ हिस्सों में तनाव फैला है।
कुछ दिन पहले घाना में अधिकारियों ने सोने की खान में काम करने वाले चीन के अवैध श्रमिकों को गिरफ़्तार किया।
2009 में स्थानीय निवासियों और चीन के कर्मचारियों के बीच अल्जीरिया में झड़प हुई थी जिसमें कुछ कर्मचारी घायल हो गए थे।
2008 में ज़ांबिया से चीन के कर्मचारियों के साथ मारपीट की खबरें आई थीं।
आदिस अबाबा, मपूटो और नैरोबी में कई जगह आपको चीन के श्रमिक, कॉन्ट्रैक्टर, मशीनों पर चीनी भाषा में लिखी कंपनियों के नाम दिख जाएंगे।
स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि चीन की कंपनियाँ श्रमिक कानूनों का उल्लंघन करती हैं - श्रमिकों को कम तन्ख्वाह दी जाती है, ओवरटाइम के लिए कोई धन नहीं दिया जाता और सुरक्षा पर कम ध्यान दिया जाता है।
मपूटो में एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि चीन के कॉन्ट्रैक्टर चाहते हैं कि श्रमिक सप्ताहांत के अलावा छुट्टियों पर भी काम करें। ये बात स्थानीय श्रमिकों को पसंद नहीं आती क्योंकि मपूटो में निजी ज़िंदगी का बहुत महत्व है। आम दिनों में शाम छह बजे ही मपूटो के बाज़ारों में सन्नाटा छा जाता है।
चिंता
हॉंगकॉंग स्थित गैर-सरकारी संगठन चाइना लेबर बुलेटिन के संचार निदेशक ज्येफ़्री क्रॉथहॉल के मुताबिक ये बताना बहुत मुश्किल है कि अफ़्रीका में चीन के कितने श्रमिक या कॉंट्रैक्टर काम करते हैं।
वो कहते हैं, “10 लाख का आंकड़ा मैं बहुत दिनों से सुन रहा हूँ।”
यहाँ ये कहना भी ज़रूरी है कि अफ़्रीका में चीनी लोगों के एक बड़े हिस्से ने खुद ही अपना रास्ता तैयार किया है और उनका चीन सरकार की नीतियों से कोई ताल्लुक नहीं है।
चीन की कंपनियों, चीन के लोगों के आने से अफ़्रीकी जन-जीवन पर असर पड़ा है। बाज़ार में स्पर्धा के साथ-साथ चीन के सस्ते सामान के कारण स्थानीय व्यापारियों में चिंता बढ़ी है। चीन के लोग अफ़्रीका इसलिए भी आ रहे हैं क्योंकि यहाँ आने के नियम इतने सख़्त नहीं है। लेकिन अफ़्रीका आने के बाद चीन के लोग ज़्यादातर अलग-थलग होकर अपने गुटों में ही रहते हैं और स्थानीय लोगों से उनका मेल-मिलाप कम होता है।
दक्षिण अफ़्रीका के ब्रेंटहर्स्ट फ़ाउंडेशन के अनुसार चीन के लोग अफ़्रीका इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उन्हें चीन में काम मिलने में मुश्किलें आ रही थीं, साथ ही उन्हें सस्ते चीन के सामान के लिए अफ़्रीका आकर्षिक बाज़ार दिखता है।
करीब 60,000 छात्रों वाले नैरोबी विश्वविद्यालय के पिछवाड़े स्थित एक छोटे से दफ़्तर में मेरी मुलाकात चाइना वूई कंपनी में काम करने वाले वरिष्ठ इंजीनियर शिंयोंग खाएहुआ से हुई।
उनकी कंपनी नैरोबी विश्वविद्यालय के लिए 22 मंज़िला शानदार इमारत बनाने का काम कर रही है। ये प्रोजेक्ट दो साल में पूरा होगा और पूरा हो जाने पर ये नैरोबी की सबसे ऊँची इमारतों में से एक होगी।
चाइना वूई कंपनी कीनिया में पिछले 12 सालों से कार्यरत है और अभी 18 परियोजनाओं पर काम कर रही है। तंज़ानिया और सूडान में भी कंपनी के प्रोजेक्ट हैं।
कंपनी ने पूर्वी अफ़्रीका के सबसे शानदार 50 किलोमीटर लंबे ठीका सुपरहाइवे के एक हिस्से को भी पूरा किया था। चीन की मदद से बनाए गए आठ लेन के इस सुपरहाइवे को कीनिया में गर्व से देखा जाता है।
लैपटॉप पर काम कर रहे काले कीनियाई इंजीनियरों की ओर इशारा करते हुए शियोंग ज़ोर देकर कहते हैं कि उनकी कंपनी स्थानीय कर्मचारियों की मदद से इस परियोजना पर काम कर रही है।
वो कहते हैं,"मुझे दूसरी कंपनियों का नहीं पता लेकिन हमारी कंपनी ने प्रबंधन का तरीका निर्धारित किया है जिसमें स्थानीय कर्मचारियों की अहमियत है।”
दूसरी कंपनियों की तरह चाइना वूई कंपनी ने भी चीन सरकार की आर्थिक मदद से बनाए जा रहे प्रोजेक्ट के सहारे कीनियाई बाज़ार में प्रवेश किया लेकिन फिर दूसरी व्यवसायिक योजनाओं को हाथ में लिया।
दोहन
नैरोबी विश्वविद्यालय में आठ साल से चल रहे कन्फ़ूशियस इंस्टिट्यूट के प्रमुख प्रोफ़ेसर सा तछुआन के मुताबिक, “कीनियाई जानना चाहते हैं कि चीन ने मात्र 30 सालों में इतनी प्रगति कैसे की है। चीन के लोग अफ्रीका का दोहन करने नहीं, बल्कि संपदा को बांटने के लिए आ रहे हैं।”
इस संस्था में करीब 400 बच्चे चीन की भाषा और संस्कृति को जानने के लिए पढ़ रहे हैं। एक उभरती महाशक्ति में प्रचलित भाषा और संस्कृति को कौन नहीं जानना चाहेगा। लेकिन एक दूसरा वर्ग चीन को शक़ की निगाह से देखता है।
मार्क कापचांगा स्थानीय अख़बार द स्टैंडर्ड में काम करते हैं और चीन की पत्रिकाओं में भी लिखते हैं। वो मानते हैं कि चीन द्वारा हवाई अड्डे और बंदरगाह बनाए जाने से आवाजाही में खर्च होने वाले समय में कटौती हुई है लेकिन वो चीन की कंपनियों पर अफ़्रीका में सस्ती वस्तुओं की डंपिंग का आरोप भी लगाते हैं।
वो कहते हैं, “चीन की कंपनियाँ कीनिया में सेकेंड-हैंड वस्तुओं को बेचने के लिए बदनाम हैं। इससे लोग खुश नहीं हैं।”
लेकिन चीन की तरह भारतीय कंपनियों पर भी तो अफ़्रीका का दोहन करने का आरोप लगते हैं?
इसपर मार्क कहते हैं, “भारतीयों को यहाँ भाई की तरह देखा जाता है। अमीर कीनियाई इलाज के लिए भारत जाते हैं। नैरोबी में भारतीयों का दबदबा है लेकिन चीन को ऐसे देखा जाता है कि ये हमारा फा़यदा उठाने आए हैं और ये हमें लूटकर भाग जाएंगे।”
जब भारतीयों के बारे में इतनी सकारात्मक सोच है तो क्यों भारत सरकार और कंपनियाँ चीन का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं?
1941 में कीनिया में पैदा हुए भारतीय मूल के व्यापारी मूलजीभाई पिंडोलिया भारतीय नेताओं और अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं।
वो कहते हैं, “भारत सरकार में कटिबद्धता नज़र नहीं आती। भारतीयों को चीन की कंपनियों से सीखना चाहिए। उन्हें यहाँ आकर संयुक्त उपक्रम लगाने चाहिए। सिर्फ़ सम्मेलन आयोजित करने से कुछ नहीं होगा। योजनाओं पर कार्यान्वयन भी ज़रूरी है।”