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इधर भारत आजाद हुआ, उधर अफगानिस्तान की बदलने लगी थी तस्वीर 

बीबीसी हिंदी Updated Fri, 09 Feb 2018 04:19 PM IST
क्या अफगानिस्तान आज जैसा है, वैसा ही उसका अतीत भी था? हाल ही में एक पुरानी अफगान मैगजीन का डिजिटल वर्जन जारी किया गया तो ऐसा लगा जैसे कोई पुराना मौसम अचानक लौट आया हो। रंग बिरंगे, खूबसूरत और जानकारी से भरे हुए 'जवानदुन' (जिंदगी) मैगजीन के नए डिजिटल किए गए पन्ने सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दौर में अफगानिस्तान के अमीर तबके के लोगों की तमन्नाओं का दस्तावेज हैं। ये मैगजीन बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से में लंबे समय तक पब्लिश होती रही थी। 

इस मैगजीन में वैश्विक मामलों, सामाजिक मुद्दे और इतिहास से जुड़े लेखों के अलावा फैशन और फिल्मी सितारों पर भी कॉलम होते थे। 'टाइम' मैगजीन जैसी ही थी 'जवानदुन', बस इसमें कहानियों और कविताओं के लिए भी जगह थी। राजनीतिक उतार-चढ़ावों से भरे पांच दशकों में 'जवानदुन' के पन्ने पर उस दौर की उथलपुथल दिखाई देती थी। इसके अलावा इन पन्नों पर एक नाजुक पक्ष भी होता था- वो था पाठकों के सपने और उम्मीदें। 
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ये वो दौर था जब यूरोपीय साम्राज्य की ताकतें दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपना असर खो रहीं थीं

Javanan magazine - फोटो : BBC
जिस देश की बहुसंख्यक आबादी निरक्षर हो उसके एक खास हिस्से के लिए ही 'जवानदुन' प्रकाशित होती थी। उसके लेखक और पाठक ज्यादातर काबुल में ही रहते थे। वो प्रगतिवादी लोग थे जिनके पास सिनेमा देखने का समय और सामर्थ्य था और जो पहनावे में बदलाव के बारे में भी सोच सकते थे। अफगानिस्तान में 1920 के दशक के बाद से जो पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहीं थीं, 'जवानदुन' उनके चंचल पक्ष को दिखाती थी। 

वहीं काबुल पत्रिका अफगानिस्तान के सबसे चर्चित लेखकों और विचारकों का जरिया थी। अदब काबुल यूनिवर्सिटी की सम-सामयिकी पत्रिका थी जबकि चिंल्ड्रेंस कंपेनियन (कामकायानो अनीस) में पहेलियां और बाल कहानियां भरी होती थीं। जवानदुन पत्रिका का प्रकाशन 1949 में शुरू हुआ था। ये वो दौर था जब यूरोपीय साम्राज्य की ताकतें दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपना असर खो रहीं थीं।

अफगानिस्तान के पड़ोसी देश भारत, पाकिस्तान और ईरान में औपनिवेशिक युग खत्म होने के बाद की सोच पनप रही थी। उस वक्त अफगानिस्तान एक नए राष्ट्र की स्थापना की ओर जा रहा था और उसके पास पैसा भी था। देश के उस समय के बादशाह शाह जाहिर ने अपने मंसूबों को विकसित करने के लिए विदेशी सलाहकार बुलाए थे। और वो अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से सहयोग मांग रहे थे।

उस दौर में एरियाना एयरलाइंस ने आधी दुनिया से अफगान का संपर्क जोड़ दिया था

Javanan magazine - फोटो : BBC
उस दौर में स्थापित होने वाली एरियाना एयरलाइंस ने आधी दुनिया से अफगानिस्तान का संपर्क स्थापित कर दिया था। उसका सबसे चर्चित रूट काबुल से फ्रैंकफर्ट था। ये उड़ानें ईरान, दमिश्क, बेरुत और अंकारा होकर जाती थीं। इसे तेरहवी शताब्दी के इतालवी यात्री मार्को पोलो के नाम पर मार्को पोलो रूट कहा जा था। वहीं अंदरूनी तौर पर अफगानिस्तान के जो शहर पहाड़ों और रेगिस्तान की वजह से एक दूसरे से कटे हुए थे उनके बीच भी सीधा संपर्क स्थापित हो गया था।

1960 के उस दशक में जवानदुन के पन्ने विज्ञापनों से भरे होते थे। कारों, फ्रिज, बेबी मिल्क जैसे उत्पाद जहां बड़ी आबादी की पहुंच से बाहर थे। लेकिन वहीं एक छोटी आबादी, खासकर महिलाओं के लिए ये जीवनशैली में आई क्रांति का प्रतिनिधित्व करते थे। पर 1973 आते-आते चीजें बदल गईं, शाह जाहिर के भाई मोहम्मद दाऊद ने उन्हें सत्ता से हटा दिया। सदियों से चली आ रही परंपरा को किनारे कर उन्होंने अपने आपको बादशाह के बजाए नए गणतंत्र का राष्ट्रपति घोषित कर दिया। 

दाऊद खान ने अफगानी फैक्ट्रियों और सेवाओं को बढ़ावा दिया और इस दौरान भी जवानदुन में विज्ञापनों की तादाद बढ़ती गई। लेकिन अफगानिस्तान में भी नए राजनीतिक विचारों ने जन्म ले लिया और दाऊद खान को 1978 में वामपंथी सैन्य अधिकारियों ने पद से हटा दिया। इस विद्रोह ने अफगानिस्तान में जिस युद्ध को शुरू किया वो आज तक चल रहा है। साल 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत यूनियन के हमले के बाद पत्रिकाओं से वाणिजयिक विज्ञापन गायब हो गए। 

लेकिन इस दौरान भी जवानदुन अलग तरह के सपनों का प्रतिबिंब बनी रही। हॉलीवुड के फिल्मी सितारों की जगह सोवियत सिने सितारों ने ले ली। टेप रिकॉर्डरों और फ्रिजों की जगह अब खेती के उपकरणों के विज्ञापन छपने लगे। हमें सोवियत संघ के कब्जे से पहले के दौर के आदर्शलोक के प्रतिबिंब भी दिखते हैं। लेकिन जो चीज इन विज्ञापनों को देखते हुए महसूस की जा सकती है वो ये है कि ये अमेरिका और रूस में तरक्की को लेकर विचार कितने मिलते जुलते थे। 

1990 के दशक में सोवियत संघ की हार के बाद 'जवानदुन पत्रिका' का प्रकाशन बंद हो गया

Javanan magazine - फोटो : BBC
1990 के दशक में सोवियत संघ की हार के बाद जवानदुन, काबुल और अन्य पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। वो एक उथल-पुथल का दौर था जब बहुत से लेखक, पेंटर और पाठक देश छोड़ कर चले गए। तालिबान के उदय का एक असर ये भी हुआ कि इनमें से बहुत से लोग कभी देश नहीं लौट सके और ये अहम सामाजिक रिकॉर्ड गायब ही हो गया। 
लेकिन अफगानिस्तान की पत्रिकाएं ऐसी नहीं थीं की पाठक पढ़ कर फेंक दें। संग्रहकर्ताओं और लाइब्रेरियों ने इन्हें सहेज कर रखा।

अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस ने अफगान सीमा के दूसरी ओर पाकिस्तान में इन पत्रिकाओं को पूरी तरह संरक्षित रखा है। कार्नेगी कॉरपोरेशन के सहयोग से अब इनमें से सैकड़ों पत्रिकाओं को डिजीटल रूप में सहेज कर वर्ल्ड डिजिटल लाइब्रेरी का हिस्सा बना लिया गया है। आप इन पत्रिकाओं को यहां पढ़ सकते हैं। अफगान प्रोजेक्ट के बारे में अधिक जानकारी यहां ले सकते हैं। हालांकि अब इनकी पेपर कॉपियों को खोजना बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी कभी-कभी ये बाजार में दिख ही जाती हैं। 

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