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भूटान चुनाव: दोकलम विवाद के बाद चीन से बढ़ रही है नजदीकी, भारत से बढ़ेगा तनाव

Mon, 17 Sep 2018 12:21 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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इन दिनों भूटान में चुनाव  चल रहे हैं। राजशाही खत्म होने के बाद यह भूटान का तीसरा चुनाव है। पहले राउंड का चुनाव 15 सितंबर को हुआ जिसपर भारत और चीन के सामरिक पर्यवेक्षकों की नजर लगी है। चुनावों का दूसरा दौर कल यानि 18 अक्टूबर को होना है। बाकी देशों की तरह यहां का मुख्य मुद्दा आर्थिक विकास, रोजगार, अपराध और भ्रष्टाचार है। इन सबके बीच भारत के साथ इसके संबंध को लेकर भी बीच-बीच में बातें उठती रही है। 

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भूटान के शासन में जनतांत्रिक सरकार की भूमिका अहम हो गई है और इसके चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा ही भूटान की अहम विदेश नीति की भावी दिशा तय की जा रही है। इसलिये भूटान की नई सरकार भारत औऱ चीन के साथ अपने रिश्तों को किस तरह पारिभाषित करती है अब यह भारत के लिए  चुनौती का विषय बन गई है।  

अगर पिछले कुछ दिनों से भारत के साथ भूटान के रिश्तों को देखें तो यह पता चलेगा कि भारत को पड़ोसी देशों से मिल रही चुनौती में अब नया नाम भूटान  का जुड़ सकता है। 
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नेपाल की चीन से निकटता के बाद भूटान में पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी के चुनाव में पिछड़ना भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। वैसे तो पार्टी के प्रमुख और मौजूदा प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे के लिए कहा जाता है कि वह भारत के प्रति उदार और सहयोगी हैं। 

जिस तरह से भूटान चुनाव में पहले राउंड के बाद शेरिंग की पार्टी पिछड़कर तीसरे नंबर पर पहुंच गई है   और न्यामरूप शोगपा की पार्टी डीएनटी लोगों की पहली पसंद बनी है। वहीं बहुत तेजी से लोगों ने मुख्य विपक्षी दल फेंसुम शोगपा की डीपीटी को पसंद किया है और उम्मीद की जा रही है कि 18 अक्टूबर को होने वाले दूसरे राउंड में  यह पार्टी सरकार बनाने के लिए मजबूत दाबेदार होगी। 
अभी तक भारत और भूटान एक दूसरे के कट्टर समर्थक रहे हैं। भारत हमेशा से नेपाल और भूटान को अपना ही अंग मानता रहा है और मुसीबत के दौरान बढ़ चढ़ कर मदद करता रहा है। 

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पिछले साल भूटान के दावे वाले दोकलम इलाके में चीन द्वारा सड़क निर्माण को लेकर भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई तनातनी के बाद भूटान के लोगों की राय पर सभी  की निगाहें टिकी हैं। भारत की विदेश नीति में भूटान  हमेशा प्राथमिकता दी गई है और भूटान की विदेश नीति भारत के दिखाए कदमों पर ही चलती रही है। 

लेकिन अब समय बदल रहा है। माना जा रहा है कि डीपीटी के द्रुक फ्युनसंम त्सोगपा डीपीटी जीत के काफी करीब हैं। भारत और भूटान रिश्ते पर करीब से नजर रखने वालों का मानना है कि अभी तक नई दिल्ली से कोई भी फोन नहीं गया है लेकिन इस चुनाव कोई भी जीते भारत उसके साथ काम करने को तैयार है। 

लेकिन इस चुनाव में पहले जैसी बात नजर नहीं आ रही है। 2013 के चुनाव में जिस तरह से भारत चुनाव प्रचार का हिस्सा था अब नहीं रहा है। यह हाल तब है जब दोकलम विवाद ने दोनों देशों को हिला कर रख दिया था। लेकिन यह देखा जा रहा है कि जीते कोई भी पार्टी दोनों भारत से बेहतर रिश्ता रखना चाहते हैं। 


डीपीटी अगर सत्ता में आई तो क्या होगा रिश्ता भारत 
भारत भूटान को हमेशा से अपना ही अंग मानता रहा है। भूटान की राजनीति को करीब से देखने वालों का मानना है कि लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। डीपीटी अगर सत्ता में आई तो यह समीकरण बदल सकता है। 2008 से 2013 तक जब डीपीटी पार्टी की सरकार भूटान में थी तब भारत और भूटान के बीच रिश्तों में कुछ खास गर्माहट नजर नहीं आई।

इसकी खास वजह थी कि तत्तकालीन भूटान के प्रधानमंत्री और डीपीटी की पार्टी लाइन चीन  के प्रति झुकाव रखती है। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में भी कहा है कि देश का 80% से अधिक उत्पाद भारत में निर्यात करने के कारण देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है। हालांकि, नतीजों के बाद भारत को लेकर किसी पार्टी की तरफ से कोई नकारात्मक बात नहीं कही गई है। 
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क्या नेपाल की तरह बदल जाएगा भूटान
नेपाल भले ही भारत से कुछ कह नहीं रहा है लेकिन दोनों के रिश्ते काफी उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। नेपाल भारत का अहम सहयोगी रहा है, लेकिन नई ओली सरकार लगातार चीन के साथ अपने रिश्ते बढ़ा रही है। हाल ही में भारत के साथ एक सैन्य अभ्यास में शामिल होने से नेपाल ने इनकार कर दिया, लेकिन चीन के साथ एक बड़ा सैन्य अभ्यास करने जा रही है। 

कब बिगड़े नेपाल से रिश्ते

नेपाल के साथ रिश्ते में खटास होने की शुरुआत 2015 में हुई थी। भारत ने मधेसी लोगों के हितों के लिए नेपाल के साथ जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति 2 महीने के लिए बंद कर दी थी और उस वक्त नेपाल में नए संविधान के लिए काम हो रहा था।

 मधेसियों के समान हित का मुद्दा भारत लगातार उठा रहा था। हालांकि, दबाव बनाने के लिए भारत का उठाया कदम मोदी सरकार पर उल्टा पड़ गया और नेपाल ने भारत के साथ दूरी बरतनी शुरू कर दी। 

जब भूटान से बिगड़े रिश्ते

अब जब भारत भूटान नेपाल का खुद को बड़ा भाई मानता है तो कई बार कुछ ऐसा कदम उठा लेता है जिससे रिश्ते बिगड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिला 2013 में, जब भारत ने भूटान को केरोसिन और कुकिंग गैस पर दी जा रही सब्सिडी बंद कर दी। उस वक्त भूटान में चुनाव थे और वहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें काफी बढ़ गई थीं।  उस वक्त भूटान के प्रधानमंत्री ने चीन के प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी जिसका विरोध भारत ने इस तरह से किया था।  
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