रूस ने दुश्मनों को धोखा देने के लिए गुब्बारेनुमा हथियारों को अपने शस्त्रागार में जगह दी है। रूस ने इन हथियारों की तैनाती भी शुरू कर दी है। गुब्बारे जैसे इन हथियारों में जेट, मिसाइल, टैंक, मिलिट्री ट्रक और एयरक्राफ्ट भी शामिल हैं। ये हथियार इतने कारगर हैं कि कई बार यूएस और नाटो के सर्विलांस सिस्टम या रडार भी इनके असली या नकली होने का पता नहीं लगा पाते हैं। असली एयरक्राफ्ट और टैंक जैसा दिखने वाला यह गुब्बारे जैसा हथियार महज पांच मिनट में तैयार हो जाता है।
रूस में इसे ‘मास्किर्वोका’ कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है ‘बनावटी’। किसी भी युद्ध के लिए यह प्रयास एक मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा होते हैं, जिसे खुलकर इस्तेमाल करने के लिए रूस ने अपने शस्त्रागार में इसे स्थान दिया है। कई बार इसका इस्तेमाल दूसरे देशों की सेना को आश्चर्य में डालने और धोखा देने के लिए भी किया जाता है। रूस की सेना के लिए ये हथियार ‘रसबल’ कंपनी बना रही है, जिसे हॉट बैलून बनाने में महारत हासिल है। ‘रसबल’ के पास गुब्बारे जैसे हथियारों की काफी बड़ी रेंज है।
रूस ने 2014 में क्रीमिया में इस तकनीकी का इस्तेमाल किया था। सेना ने सरकारी भवनों पर मास्क पहने ‘लिटिल ग्रीन मैन’ को तैनात किया था। ये अपने साथ भारी हथियार लिए हुए थे। इसके बाद, 2015 में सीरिया और यूक्रेन में जवानों को वॉलंटियर्स बनाकर भेजा गया और लोगों को विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों से बाहर निकाला गया था। इस तकनीकी को ‘इन्फ्लेटेबल वेपनरी टेक्नीक’ कहा जाता है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध में भी इस्तेमाल किया गया था। 1944 में यूरोप के मित्र देशों के हमले के पहले शहरों में लकड़ी, फैब्रिक या इन्फ्लेटेबल रबड़ के वाहन तैनात किए गए थे।
खतरनाक हथियारों के वर्जन भी बेड़े में शामिल
रूसी हथियार
रूसी शस्त्र बेड़े के लिए ‘रसबल’ कंपनी ने गुब्बारेनुमा मिग 31, एसयू-27 जैसे लड़ाकू विमान और टी-72 और टी-80 जैसे टैंक भी बना लिए हैं। यही नहीं बल्कि जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल एस-300 का बैटरी वर्जन भी रूस के बेड़े में शामिल हो चुका है जिसे मीडिया रिपोर्ट के हिसाब से पिछले हफ्ते सीरिया भेजा गया था।
इसके अलावा कंपनी ने गुब्बारानुमा टेंट, रडार स्टेशन और शॉर्ट-रेंज टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल भी बनाए हैं, जिन्हें आसानी से कमांड और कंट्रोल किया जा सकता है।
पांच मिनट में तैयार हो जाता है टी-80 टैंक
रूसी हथियार
इन्फ्लेटेबल टी-80 टैंक की लागत करीब 10.70 लाख रुपए है। इसकी खासियत यह है कि यह पांच मिनट में तैयार और पैक हो जाता है। इसका मतलब है कि 31 फर्जी टैंक की पूरी बटालियन को खड़ा करने में करीब ढाई घंटे का वक्त ही लगता है। जबकि इस पूरी कवायद की लागत पड़ती है मात्र 3.30 करोड़ रुपये। इस हिसाब से दुश्मन को धोखा देने के लिए यह बहुत सस्ती तकनीकी साबित होगी। इसीलिए रूस इसमें काफी रुचि दिखा रहा है।