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दो साल में बांग्लादेश से म्यांमार लौटेंगे 7.50 लाख रोहिंग्या

Wed, 17 Jan 2018 05:29 AM IST
एजेंसी, यंगून
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rohingya muslims
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म्यांमार से विस्थापित होकर बांग्लादेश पहुंचे रोहिंग्या मुस्लिमों की दो साल में वापसी को लेकर म्यांमार और बांग्लादेश के बीच समझौता हो गया है। ये रोहिंग्या म्यांमार में सैन्य कार्रवाई के बाद विस्थापित होकर बांग्लादेश भागने को मजबूर हो गए थे। रोहिंग्या मुस्लिमों की स्वदेश वापसी की अनिश्चित स्थितियों के बीच भी हजारों रोहिंग्याओं की वापसी को लेकर पहली स्पष्ट समयसीमा निर्धारित हुई है।
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म्यांमार की राजधानी नेपीडॉ में इस हफ्ते यह समझौता हुआ। इसके तहत लगभग साढ़े सात लाख रोहिंग्याओं की वापसी का रास्ता साफ हुआ है। ये रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार में अक्तूबर, 2016 से शुरू हुई हिंसा की दो बड़ी घटनाओं के बाद भाग गए थे। इसकी शुरुआत तब हुई जब राज्य विहिन अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी ने पहले उत्तरी रखाइन राज्य के सीमा सुरक्षा बलों पर हमला किया था। बांग्लादेशी सरकार ने अपने बयान में कहा कि इस समझौते का उद्देश्य दो साल के अंदर रोहिंग्याओं की स्वदेश वापसी करवाना है।

हालांकि बांग्लादेश सरकार के बयान में इस बात की जिक्र नहीं है कि इन शरणार्थियों की वापसी की शुरुआत किस तारीख से होगी। वहीं म्यांमार सरकार ने कहा है कि वह 23 जनवरी से रोहिंग्याओं की वापसी के लिए तैयार है। दोनों देश रखाइन राज्य में शरणार्थियों के सामानों की पहचान के लिए एक फॉर्म भरने को लेकर सहमत हुए हैं। 
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नहीं होगी दो लाख रोहिंग्याओं की वापसी 

rohingyan - फोटो : rohingyan
म्यांमार में बांग्लादेश के राजदूत मोहम्मद सुफिउर रहमान ने कहा कि बांग्लादेश ने कहा है कि पहचान फॉर्म परिवार के सदस्यों की संख्या पर आधारित होगा जिसमें अनाथ और पूरी घटना से बाहर पैदा हुए बच्चे भी शामिल किए जाएंगे। वहीं अगले महीने रोहिंग्याओं की वापसी शुरू किए जाने के म्यांमार के बयान पर उन्होंने कहा कि यह असंभव है। 

इस समझौते के तहत उन दो लाख रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी नहीं हो सकेगी जो अक्तूबर 2016 के पहले से ही बांग्लादेश में रह रहे हैं। ये रोहिंग्या मुस्लिम इससे पहले हुई हिंसा और सैन्य कार्रवाई के बाद भागकर बांग्लादेश में शरण लेने को मजबूर हुए थे। 

यूएन और अमेरिका का है दबाव

पिछले साल अगस्त में सैन्य कार्रवाई के बाद म्यांमार से भागने को मजबूर हुए रोहिंग्याओं की सकुशल स्वदेश वापसी को लेकर म्यांमार पर बहुत अधिक कूटनीतिक दबाव है। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ पहले ही इस पूरी कार्रवाई को जातीय सफाया करार दे चुके हैं।

 
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