दुनियाभर में गंदे पानी को साफ करने वाले संयंत्रों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अब तक के अंतरराष्ट्रीय अनुमानों से करीब 2.5 गुना अधिक हो सकता है। स्वीडन की लिंशोपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की ओर से ड्रोन और अत्याधुनिक सेंसरों का इस्तेमाल किए गए अध्ययन में वैश्विक उत्सर्जन रिपोर्टिंग सिस्टम में एक गंभीर खामी की ओर संकेत किया है। शोध एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
इसमें स्वीडन के 12 वेस्ट-वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स के ऊपर विशेष सेंसर लगे ड्रोन उड़ाए गए, जिनसे मीथेन (सीएच4) और नाइट्रस ऑक्साइड (एन2ओ) जैसी ग्रीनहाउस गैसों का वास्तविक उत्सर्जन मापा गया। अध्ययन में पाया गया कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संस्था आईपीसीसी द्वारा अब तक जो अनुमान लगाए जाते रहे हैं, वास्तविक उत्सर्जन उनसे लगभग 2.5 गुना अधिक है। शोध से यह भी स्पष्ट हुआ कि सबसे अधिक उत्सर्जन उस समय होता है जब उपचारित कीचड़ को भंडारण में रखा जाता है। यह चरण अब तक रिपोर्टिंग में लगभग अनदेखा रहा।
आईपीसीसी अभी तक इन उत्सर्जनों की गणना उत्सर्जन गुणांक और आबादी आधारित अनुमान मॉडल से करता है। यानी यह माना जाता है कि एक निश्चित संख्या में घरों का मलजल कितना उत्सर्जन करेगा। अध्ययन के अनुसार यह तरीका वास्तविक उत्सर्जन को पकड़ नहीं पाता, क्योंकि संयंत्रों की तकनीक, कीचड़ प्रबंधन और संचालन तरीकों में भारी विविधता होती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अनुमान-निर्भर मॉडल के चलते नगरपालिकाएं सुधार करने पर भी रिपोर्टिंग में बदलाव नहीं दिखा पातीं।
अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन खास तौर पर गंभीर है। नाइट्रस ऑक्साइड का जलवायु प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक माना जाता है। अब तक की नीतिगत चर्चा में इसे अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया था, लेकिन अध्ययन बताता है कि कीचड़ भंडारण के दौरान यह गैस मीथेन के बराबर जलवायु जोखिम पैदा करती है।
भारत में भी उभर रहा खतरा
शोध के अनुसार भारत में भी वेस्ट-वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन एक उभरता हुआ चिंता का विषय है, लेकिन इस क्षेत्र में वास्तविक मापन-आधारित डेटा अभी सीमित है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत में स्थापित ट्रीटमेंट क्षमता और वास्तविक उपचार क्षमता में बड़ा अंतर है। लगभग 60% से अधिक गंदा पानी बिना उपचार के बह जाता है। शहरी निकायों में ज्यादातर संयंत्र पुराने मॉडल पर आधारित हैं, जहां उत्सर्जन का मूल्यांकन अनुमान के आधार पर किया जाता है न कि वास्तविक माप के आधार पर।
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नीति और वैश्विक जलवायु रणनीति पर असर
शोधकर्ताओं का कहना है कि अब समय आ गया है कि दुनिया अनुमान-आधारित रिपोर्टिंग के बजाय वास्तविक मापन- आधारित प्रणाली अपनाए। इससे न सिर्फ उत्सर्जन की सही तस्वीर सामने आएगी बल्कि नगरपालिकाओं को सुधार के परिणाम भी स्पष्ट रूप से दिखाने में मदद मिलेगी। यूरोपीय संघ के भीतर यह अध्ययन उत्सर्जन सत्यापन और डेटा पारदर्शिता को लेकर नई बहस को जन्म दे सकता है। ग्लोबल मीथेन प्लेज जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के संदर्भ में भी यह निष्कर्ष अहम हैं, क्योंकि शहरी गंदे पानी के संयंत्र अब एक महत्वपूर्णअनदेखे उत्सर्जक स्रोत साबित हो रहे हैं।