दुनिया भर में आज आम लोग यह कहते सुने जाते हैं कि इंसान में दया, दूसरे के लिए सम्मान का भाव, ईमानदारी आदि जैसे गुण खत्म होते जा रहे हैं। लेकिन मनोवैज्ञानिकों की दलील है कि ऐसी राय सिर्फ एक स्वभावगत भ्रम है। विशेषज्ञों ने कहा है कि लोगों की मान्यता महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि अकसर उससे ही उनका व्यवहार निर्देशित होता है। इसलिए लोगों में इस बारे में जागरूकता लाना जरूरी है।
यह मुद्दा एक नए अध्ययन से चर्चित हुआ है। मशहूर पत्रिका नेचर के ताजा अंक में यह अध्ययन रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। अध्ययन 60 देशों में हुए एक सर्वेक्षण पर आधारित है। इस सर्वे के दौरान ज्यादातर लोगों ने यही राय जताई कि बीते छह-सात दशकों में नैतिकता में भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन अमेरिका के कोलंबिया बिजनेस स्कूल में अनुसंधानकर्ता एडम मैस्त्रियानी के नेतृत्व में हुआ। इस दौरान लोगों से एक सवाल यह पूरा गया कि उनकी राय में 2020, 2010 और साल 2000 में कौन से से ऐसा वक्त था, जब लोगों में दया की भावना ज्यादा थी।
सर्वे के दौरान आम राय उभरी की दया की भावना और नैतिकता में गिरावट आई है। ऐसी राय हाई स्कूल में पढ़ रहे छात्रों से लेकर उनके माता-पिता की पीढी तक ने जताई। साथ ही राजनीतिक रूप से लिबरल और कंजरवेटिव दोनों तरह के व्यक्तियों में इस मामले में समान राय उभरी।
लेकिन अतीत में हुए सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि तब भी लोगों ने ऐसी ही राय जताई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि नैतिक पतन की बात एक भ्रम है। हालांकि मैस्त्रियोआनी ने आगाह किया है कि उनके ऐसा करने का यह मतलब यह दलील देना नहीं है कि आज नैतिकता का स्तर बेहतर है।
मैस्त्रियोआनी के मुताबिक ऐसे कई संभव कारण हो सकते हैं, जिनकी वजह से सामूहिक भ्रम पैदा होता है। इनमें दो तरह की मनोवैज्ञानिक परिघटनाएं शामिल हैं। इंसान का स्वभाव ऐसा है, जिसमें वह नकारात्मक सूचनाओं पर सकरात्मक सूचनाओं की तुलना में अधिक ध्यान देता है। इसके अलावा देखा गया है कि मनुष्य की बुरी यादें अच्छी यादों की तुलना में जल्दी भूल जाती हैं। इस तरह अकसर यह महसूस होता है कि पहले स्थितियां बेहतर थीं।
यूनिवर्सिटी ऑफ वॉटरलू में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड आईबाक ने कहा है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष इसी प्रकार के भ्रम की मौजूदगी की पुष्टि करते हैं। दूसरे मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक ताजा अध्ययन से पहले हुए अध्ययनों के इस निष्कर्ष की पुष्टि होती है कि लोगों में निराशावाद की तरफ झुकाव अधिक होता है।
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक माता-पिता अकसर कहते सुने जाते हैं कि उनकी पहली संतान के जन्म के बाद से दुनिया अधिक खतरनाक जगह होती चली गई है। आईबाक ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम ने कहा- ‘जब आपकी संतान का जन्म होता है, तो आप वैसे जोखिम और खतरों पर अधिक ध्यान देने लगते हैं, जिन्हें पहले आप नजरअंदाज कर देते थे। इसी तरह आप खतरनाक सूचनाओं पर अधिक ध्यान देने लगते हैं। उससे खतरे की धारणा या भ्रम मन में गहराती चली जाती है।’