अमेरिका अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की तैयारी में है, वहीं एक ताजा रिपोर्ट से इस देश में जारी खतरनाक हालत का खुलासा हुआ है। अमेरिका के रोड्स आइलैंड स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि अफगानिस्तान में पिछले तीन साल में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के हवाई हमलों में मारे गए नागरिकों की संख्या में 330 फीसदी का इजाफा हुआ है। अमेरिका ने तकरीबन दो दशक पहले अपने ‘आतंक से युद्ध’ अभियान के तहत अपने सैनिक अफगानिस्तान भेजे थे। लेकिन ये रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि अमेरिका का सैनिक अभियान अपने मकसद में कामयाब नहीं रहा।
इस रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में हवाई हमलों में तकरीबन 700 नागरिक मारे गए। यह 2001 के बाद की सबसे ऊंची संख्या है। 2001 में ही अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अपने सैनिक अफगानिस्तान भेजे थे। अनुसंधानकर्ताओं ने कहा है कि हवाई हमलों में बढ़ोतरी इसलिए हुई, क्योंकि अब जमीन पर अमेरिका के सैनिकों की संख्या पहले से काफी कम है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हवाई हमले बढ़ाने के पीछे अमेरिका का मकसद तालिबान पर दबाव बढ़ाना भी हो सकता है, ताकि वो शांति वार्ता में शामिल हो। इसमें ध्यान दिलाया गया है कि इस साल फरवरी में तालिबान के साथ अमेरिका का समझौता होने के बाद अमेरिकी हवाई हमलों में कमी आई है।
लेकिन हवाई हमलों में निर्दोष लोगों की हुई मौत अमेरिकी अभियान पर एक बड़ा सवाल है। साथ ही इससे यह प्रश्न भी उठा है कि क्या अफगानिस्तान से अपनी फौजी लौटाने के बाद भी अमेरिका इस देश पर हवाई हमले जारी रखेगा। साथ ही निर्दोष लोगों की मौत के लिए क्या कोई जवाबदेही तय की जाएगी? ब्रिटिश विश्लेषक टॉम फाउडी ने रशिया टुडे वेबसाइट पर लिखा है- सवाल है कि आगे क्या होगा? यह एक ऐसा मकड़जाल है, जिसका कोई जवाब नहीं है। साफ है कि विद्रोहियों को पराजित नहीं किया जा सकेगा। अफगानिस्तान सरकार के साथ वे मिलकर रहें, ये संभावना दूर नजर आती है। अमेरिकी हस्तक्षेप से लड़ाई और भड़केगी। इसका अंतिम नुकसान देश के आम लोगों को उठाना पड़ रहा है।
हालांकि ये दावा किया गया है कि इस साल अमेरिकी हवाई हमलों में कमी आई है, लेकिन ताजा रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 2020 के पहले छह महीनों में अफगान सरकार के हवाई हमलों में 86 नागरिक मारे गए। इन हमलों में 103 लोग जख्मी हुए। पिछले महीने गैर सरकारी संस्था 'सेव द चिड्रेन' ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि अफगानिस्तान में पिछले 14 वर्षों में हर दिन औसतन पांच बच्चे या तो मारे गए या जख्मी हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक 2005 से 2019 के बीच अफगानिस्तान में हुए हमलों में 26,025 बच्चे मारे गए या विकलांग हुए।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका की अपनी फौज वापस बुलाने की तैयारी के कारण अफगानिस्तान में शक्ति संतुलन में बदलाव आ रहा है। अब हालत को संभालने की पूरी जिम्मेदारी अफगानिस्तान की अपनी सेना पर आ गई है। इससे नागरिकों की मौतों की संख्या और बढ़ी है। इस कारण देश में असंतोष और उग्रवाद बढ़ने का अंदेशा जताया जा रहा है। इसीलिए आलोचकों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फौज वापसी के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ट्रंप अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों सौंप कर अपनी जिम्मेदारी से कदम वापस खींच रहे हैं।
आलोचकों ने कहा है कि पिछले 20 साल तक तालिबान के खिलाफ चलाए गए तमाम अभियान के बावजूद इस कट्टरपंथी इस्लामी संगठन को खत्म नहीं किया जा सका है। जबकि इसी मकसद के लिए अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान आई थीं। इस दौरान विनाश और नरसंहार खूब हुए, लेकिन जो असल मकसद था, उसमें अमेरिका और उसके सहयोगी देश नाकाम रहे हैं।