किसी व्यक्ति की उम्र 30 या 40 साल हो सकती है, लेकिन क्या उसके शरीर की उम्र उससे कहीं ज्यादा हो सकती है? विज्ञान में अब यह सवाल सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रह गया है।शोधकर्ताओं को बड़े पैमाने पर जुटाए गए स्वास्थ्य आंकड़ों में ऐसे संकेत मिले हैं कि अपेक्षाकृत नई पीढ़ियों के लोगों में शरीर के जैविक रूप से बूढ़ा होने की प्रक्रिया पिछली पीढ़ियों की तुलना में तेज हो सकती है। इस खोज का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। जिन लोगों के शरीर में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज दिखाई दी, उनमें 55 वर्ष की उम्र से पहले होने वाले ठोस कैंसर का जोखिम भी अधिक पाया गया।
यह निष्कर्ष कैंसर के बदलते पैटर्न को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि तेजी से जैविक उम्र बढ़ना कैंसर का सीधा कारण है। हम किसी की उम्र उसके जन्म के साल से गिनते हैं। इसे कालानुक्रमिक उम्र कहा जाता है। लेकिन शरीर के अंदर कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों पर उम्र का असर हर व्यक्ति में एक समान नहीं होता। इसी अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिक जैविक उम्र की अवधारणा का इस्तेमाल करते हैं। इसमें शरीर में होने वाले कई जैविक बदलावों को देखा जाता है। इसलिए समान उम्र के दो लोगों के शरीर की जैविक उम्र अलग हो सकती है। मसलन, 40 साल के दो लोगों में से एक का शरीर अपेक्षाकृत युवा जैविक प्रोफाइल दिखा सकता है, जबकि दूसरे में उम्र बढ़ने के संकेत ज्यादा हो सकते हैं। यही अंतर इस नए अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार बना।
पिछली पीढ़ी से नई पीढ़ी तक क्या-क्या बदला?
अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के यूके बायोबैंक में शामिल 1.54 लाख से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके साथ अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के ऑल ऑफ अस कार्यक्रम के 10 हजार से अधिक प्रतिभागियों के आंकड़ों को भी देखा गया। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग समय में जन्मे लोगों के जैविक उम्र बढ़ने के संकेतों की तुलना की। ब्रिटेन के आंकड़ों में 1965 से 1974 के बीच जन्मे लोगों में 1950 से 1954 के बीच जन्मे लोगों की तुलना में जैविक उम्र बढ़ने के संकेत अधिक थे। अमेरिकी आंकड़ों में यह अंतर और स्पष्ट दिखाई दिया। 1990 से 1999 के बीच जन्मे लोगों में 1965 से 1969 के बीच जन्मे लोगों की तुलना में शरीर के तेजी से बूढ़ा होने के अधिक संकेत मिले।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आज का हर युवा अपनी वास्तविक उम्र से बूढ़ा है। यह आबादी के बड़े समूहों के बीच दिखाई देने वाला सांख्यिकीय अंतर है। लेकिन इसी अंतर ने वैज्ञानिकों को अगला सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया क्या इसका संबंध कम उम्र में बढ़ रहे कैंसर से भी है?
शरीर जितना तेजी से बूढ़ा, कैंसर का जोखिम उतना ज्यादा?
जब शोधकर्ताओं ने जैविक उम्र बढ़ने के संकेतों और कैंसर के आंकड़ों को साथ देखा तो एक महत्वपूर्ण संबंध सामने आया।
जिन लोगों में जैविक उम्र बढ़ने की गति अधिक थी, उनमें 55 वर्ष से पहले होने वाले ठोस कैंसर का जोखिम करीब 8% अधिक पाया गया। जिन लोगों में जैविक उम्र बढ़ने के संकेत सबसे ज्यादा थे, उनमें सबसे कम संकेत वाले लोगों की तुलना में यह जोखिम करीब 15% अधिक था। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है। ये आंकड़े संबंध दिखाते हैं, कारण नहीं। यानी अभी यह कहना सही नहीं होगा कि शरीर के तेजी से बूढ़ा होने की वजह से ही कैंसर होता है। शोध में शरीर के अलग-अलग हिस्सों की जैविक उम्र को भी अलग से देखा गया। अपेक्षाकृत अधिक उम्र वाली प्रतिरक्षा प्रणाली का संबंध कम उम्र में फेफड़ों के कैंसर के बढ़े जोखिम से मिला। इसी तरह वसा ऊतक की अधिक जैविक उम्र का संबंध कम उम्र में आंत के कैंसर से देखा गया।
आखिर नई पीढ़ी पर क्या असर पड़ रहा है?
यहीं से शोध का सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। वैज्ञानिक अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि नई पीढ़ियों में जैविक उम्र बढ़ने के संकेत ज्यादा क्यों दिखाई दे रहे हैं। मोटापा, खान-पान में बदलाव, खतरनाक नशा, शराब का सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी और शरीर के चयापचय से जुड़ी गड़बड़ियां पहले से ही कई तरह के कैंसर के जोखिम से जुड़ी हैं। इसके अलावा पर्यावरण में बदलाव और आधुनिक जीवनशैली भी शरीर की लंबी अवधि की सेहत को प्रभावित कर सकती है।
लेकिन इनमें से किसी एक वजह को कम उम्र में कैंसर बढ़ने का अकेला कारण मानना जल्दबाजी होगी। कैंसर एक जटिल बीमारी है और इसके पीछे आनुवंशिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़े कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं।
आगे क्या-कुछ बदलेगा?
इस अध्ययन की सबसे बड़ी संभावित उपयोगिता भविष्य में जोखिम की पहचान से जुड़ी हो सकती है। अगर आगे के शोध यह स्पष्ट करते हैं कि जैविक उम्र और कम उम्र के कैंसर के बीच संबंध कितना मजबूत है, तो शरीर की जैविक उम्र के संकेत भविष्य में जोखिम का आकलन करने में मदद कर सकते हैं। इससे संभव है कि कुछ लोगों में कैंसर की रोकथाम या जांच पर उम्र के बजाय उनके जैविक जोखिम को भी ध्यान में रखा जाए। लेकिन अभी यह भविष्य की संभावना है, चिकित्सकीय सलाह या जांच की नई व्यवस्था नहीं। फिलहाल इस शोध ने एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण सवाल जरूर सामने रखा है,क्या हमारी वास्तविक उम्र बढ़ने से पहले ही शरीर पर उम्र का असर दिखाई देने लगा है? और अगर ऐसा है, तो आधुनिक जीवनशैली और बदलता पर्यावरण इसमें कितनी भूमिका निभा रहे हैं? इन सवालों के जवाब यह समझने में अहम हो सकते हैं कि आखिर कम उम्र में कैंसर के मामले क्यों बढ़ रहे हैं।