इस दृश्य में कुछ भी असाधारण नहीं है, सिवाय इसके कि ये रेस्तरां, ‘एम्मा की टॉर्च’ नामक एक गैर-लाभकारी उद्यम के एक खास मिशन का हिस्सा है। यहां शरणार्थियों, प्रवासियों और मानव तस्करी से बचे लोगों को पाक-कला सिखाई जाती है, ताकि वे अमेरिका में अपने लिए एक बेहतर जीवन बना सकें।
रेस्तरां का नाम ही उसके मिशन की कहानी भी बयां करता है जिसका आशय 'स्टैचू ऑफ लिबर्टी' की मशाल और एम्मा लजारस से है जिन्होंने 1883 में "द न्यू कोलोसस" नामक कविता लिखी थी। इसकी मशहूर पंक्तियां “मुझे अपने थके हुए, गरीब, डरे हुए लोग दे दो, जो खुली हवा में सांस लेने के लिए तरस रहे हैं” एक ऐसे समय में लिखी गई थी जब बड़े पैमाने पर विस्थापित, नावों में भर कर पास के एलिस द्वीप से होकर आए थे।
‘एम्मा की टॉर्च’ की रसोई में काम कर रहे एक छात्र खोसे लोपेज ने यूएन न्यूज को बताया कि, “होंडुरस में जीवन खतरनाक था। आपको गिरोहों और आस-पास के सभी लोगों से सावधान रहना पड़ता था।
अपने देश में 12 साल की उम्र में बावर्ची के रूप में काम शुरू करने की वजह से अपने साथियों की तुलना में खोसे के पास पहले से ही इस काम का थोड़ा कुछ अनुभव था।
‘एम्मा की टॉर्च' से पढ़ाई पूरी करते ही उन्हें पास की एक केटरिंग कंपनी में ‘लाइन कुक’ के रूप में काम करने का प्रस्ताव मिल चुका है लेकिन दूसरे कई छात्रों की तरह ही उनका सपना अपना रेस्तरां खोलना है जहां होंडुरस के बालेडास और नारियल के सूप जैसे खास व्यंजन पेश कर सकें।
रसोई कर्मचारियों का एक अन्य सदस्य रॉबर्टो मिबुआ अंगोला से आए शरणार्थी हैं। रॉबर्टो का कहना है कि जब तक अंगोला में राजनैतिक स्थिति नहीं बदलती वह अपने मूल देश वापस नहीं जाना चाहेेंगे। लोपेज की तरह उन्हें रेस्तरां आने से पहले रसोई का कोई अनुभव नहीं था। लेकिन अब वो कहते हैं, "जब तक मैं सक्षम हूं और ये कर सकता हूं, तब तक मेरे पास बावर्ची का ये करियर होगा।
‘एम्मा की टॉर्च’ मशाल के पाक-कला निदेशक और हेड शेफ, अलेक्जेंडर हैरिस ने विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और शैक्षिक स्तर से आए, अलग-अलग उम्र के लोगों को प्रशिक्षण दिया है।
उनका कहना है कि, "यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इनमें से ज्यादा से ज्यादा लोगों को काम पर लगा सकूं, इसलिए मैंने उन्हें मूल बातें सिखाने पर जोर दिया है - जैसे कि इस तरह के फ्रांसीसी शब्द और तकनीकें जिनकी अपेक्षा किसी को भी अपने अपने कर्मचारी से होगी।
न्यूयॉर्क और न्यू-अमेरिकन
इसके अलावा अलेक्जेडर हैरिस अपने स्टाफ की विविधता को ध्यान में रखते हैं और मैन्यू में कलात्मक विधि में विभिन्न संस्कृतियों के प्रभावों को भी शामिल करते हैं।
वो इसे "नया अमेरिकी" भोजन कहते हैं जिसे वे लोग तैयार करते हैं जो नए अमेरिकी हैं।एक शाम जब यूएन न्यूज ने रेस्तरां का दौरा किया तो वह ताहिनी के साथ काले मटर का हुमूस और बारबेक्यू विंग्स, क्रस्टेड फिश और ग्रिट्स के साथ वैजिटेबल टैगाइन जैसे व्यंजन परोस रहे थे।
न्यूयॉर्क में दुनिया भर से विभिन्न प्रकार के व्यंजनों की बहार दरअसल यहां की आप्रवासी आबादी की वजह से है।
अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के ब्लॉग पर हाल ही में एक प्रवासी लेखक ओमेर एल्टिगानी का लेख प्रकाशित हुआ है।
वह कहते हैं, “दुनिया के कोने-कोने से आकर लोगों ने इस अभूतपूर्व शहर और उसकी असाधारण विविधता में चार चाँद लगाए हैं। न्यूयॉर्क सबूत है - प्रवासन की सकारात्मक कहानी का और उसके लक्ष्यों व क्षमता का।
ओमेर का परिवार सूडान से है।वह न्यूयॉर्क और अन्य प्रमुख शहरों में भोज्य कार्यक्रमों की मेजबानी करते हैं जहां भोजन के माध्यम से सूडान की कहानी सुनाई जाती है और उसके जरिए देश के इतिहास और संस्कृति की शिक्षा भी।
वह कहते हैं कि सूडानी भोजन सूडान में आने और जाने वाले लोगों की कहानी बयां करता है जो यहां आकर अपनी छाप छोड़ते हैं और जाते समय यहां की संस्कृति और भोजन को अपने साथ ले जाते हैं।
ये "पारस्परिक व्यवस्था अनगिनत बार दोहराई जाती है।" यह कहानी दर्शाती है कि न्यूयॉर्क के कई बड़े बावर्चियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले कई स्थानीय मसाले व सामग्रीयां आप्रवासन का उत्पाद हैं।
उदाहरण के लिए, न्यूयॉर्क के रेस्तरांओं में खाद्य सामग्री की आपूर्ति करने वाला विश्व-प्रसिद्ध नॉरिच मीडोज फार्म विदेशी सब्जियां उगाने के लिए मिस्र के किसानों की सेवाएँ लेता है। इसका उद्देश्य बेहतर उपज के लिए वहां की तकनीकों और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना है।
धारणाओं में बदलाव
भोजन में सांस्कृतिक संबंध बनाने की शक्ति है और इसे संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) द्वारा समर्थित एक परियोजना, 'रैफ्यूजी फूड फेस्टिवल' द्वारा मान्यता दी गई है। ये प्रोजेक्ट 2016 में पेरिस में शुरू हुआ था और अब न्यूयॉर्क समेत 14 शहरों में फैल चुका है।
जब योरोप में "शरणार्थी संकट" सुर्खियों में था तब इस उत्सव के संस्थापकों ने शरणार्थियों और प्रवासियों पर चल रही नकारात्मक बातों को रोकने और उन लोगों की धारणाओं को बदलने के लिए खाना पकाने के सिद्धान्तों का उपयोग करने का फैसला किया।
ये वो लोग थे जो एक नया जीवन शुरू करने के लिए अपने घरों को छोड़ देते हैं। उत्सव में हिस्सा लेने वाले शहरों के रेस्तरां अपनी रसोइयों को शरणार्थी समुदाय के बावर्चियों के लिए खोल देते हैं और अपने मेन्यू को उनके अनुरूप ढालते है।
2019 संस्करण के दौरान न्यूयॉर्क के कुछ प्रसिद्ध रेस्तरां लोगों को श्रीलंकाई, सीरियाई, ईरानी और अफगान व्यंजन चखने का निमंत्रण देते भी दिखाई दिए।
यूएन शरणार्थी एजेंसी के एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि उत्सव में शामिल होने वाले 70 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि इससे उन्हें शरणार्थियो के जीवन के बारे में सकारात्मक रूप से सोचने का अवसर मिला।
90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने भविष्य में उनका समर्थन करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का मन बनाया है. साथ ही शरणार्थी बावर्चियों को भी इससे बहुत फायदा मिला। उत्सव में हिस्सा लेने वालों में से लगभग दो-तिहाई को पेशेवर रसोई में काम करने, प्रशिक्षण पाने या अपना रेस्तरां खोलने जैसे अवसर भी प्राप्त हुए हैं।
क्योंकि 'यही सही है'
अलेक्जेडर हैरिस ने खुद अनुभव किया है कि पाक-कला क्षेत्र के करियर की ओर कदम बढ़ाने से उनके कई छात्रों के जीवन में कितना बदलाव आया है।
"इस कार्यक्रम में भाग लेने के सबसे अद्भुत हिस्सों में से एक वो सफ़र है, जो पहले दिन से अंतिम दिन तक हर छात्र तय करता है।उनके व्यक्तिगत विकास से लेकर सांस्कृतिक और तकनीकी जागरूकता अभूतपूर्व है। शुरूआत में वो ये मानने से हिचकते हैं कि उनके लिए ऐसा करना संभव है, लेकिन फिर यहां से मुस्कुराते हुए निकलते हैं - आत्मविश्वास से भरे हुए और दुनिया को जीतने के लिए तैयार।
रेस्तरां के कार्यकारी निदेशक कैरी ब्रॉडी कहते हैं कि यह अनुभव न केवल छात्रों के लिए फायदेमंद है बल्कि उन सभी लोगों और अमेरिकियों के लिए भी, जो रेस्तरां में खाना खाने आते हैं.
"हम ये काम केवल इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि हमारे छात्र हमसे कम प्रतिष्ठित हैं; हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि एक अमेरिकी होने के नाते हम मानते हैं कि जब हम अपने सबसे अच्छे बर्ताव पर होते हैं तो इसी तरह का व्यवहार करते हैं, क्योंकि यही सही है।
“यहां कोई ‘हम’ और ‘वो’ नहीं है, लेकिन अगर होता भी तो मैं यही कहता कि ‘वो’ ‘हमें’ बेहतर और मजबूत बनाते हैं।हमारे छात्रों का योगदान अनमोल है और हम भाग्यशाली हैं कि हमें उनके साथ काम करने और इस समुदाय में उनका स्वागत करने का मौका मिल रहा है।”