श्रीलंका में इतने आंदोलनों, प्रदर्शनों और विद्रोह जैसे हालात के बावजूद सत्ता के खेल में रानिल विक्रमसिंघे की सियासत भारी पड़ रही है। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपने बचपन के साथी और स्कूल के सहपाठी दिनेश गुणवर्धने को देश का प्रधानमंत्री बना दिया है और दावा किया जा रहा है कि ये दोनों साथी मिलकर नई रणनीति के साथ श्रीलंका को मौजूदा आर्थिक संकट से उबारने की कोशिश करेंगे।
दिनेश गुणवर्धने को प्रधानमंत्री बनाने के बाद रानिल विक्रमसिंघे ने प्रदर्शनकारियों से अपील भी की कि नई सरकार को काम करने का मौका दिया जाए, ताकि देश को कर्ज से उबारा जा सके और लोगों को महंगाई से बचाया जा सके। लेकिन प्रदर्शनकारी और खासकर मुख्य विपक्षी पार्टियों का गठबंधन ये मानने को तैयार नहीं हैं। उनका आरोप है कि विक्रमसिंघे को कमान सौंपने के पीछे राजपक्षे परिवार को भ्रष्टाचार की किसी भी जांच से बचाए रखना है। ये भी कहा जा रहा है कि गोटाबाया भले ही अभी देश के हालात को देखते हुए विदेश भाग गए हों, लेकिन मामला शांत होने के बाद उन्हें फिर से वापस लाने का रास्ता तलाशने का काम भी ये नई सरकार कर सकती है। विपक्ष इस मिलीभगत को बेनकाब करने पर उतारू है।
देश के आम लोग गंभीर बिजली संकट झेल रहे हैं। कम से कम 8 से 10 घंटे बिजली कटौती हो रही है। कीमतें अभी भी आसमान छू रही हैं। श्रीलंका पर कुल 35 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज है जिसमें 10 फीसदी कर्ज़ अकेले चीन का है। दूसरी तरफ श्रीलंका के गंभीर बिजली संकट पर वहां के अखबार श्रीलंका मिरर ने लिखा है कि बहुत जल्द चार शिपमेंट फ्यूल लेकर कोलंबो पहुंच रहे हैं। हमें उम्मीद है कि नई सरकार इसके बाद भी फ्यूल का बंदोबस्त कर लेगी। इसकी वजह यह है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ डील का एक बड़ा हिस्सा फ्यूल पर खर्च किया जा रहा है।
अब रानिल विक्रमसिंघे की ओर से दिनेश गुणवर्धने को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद विरोधियों को नया मुद्दा मिल गया है। गुणवर्धने गोटाबाया के राष्ट्रपति रहते हुए सरकार में गृहमंत्री रह चुके हैं। शिक्षा मंत्री और विदेश मंत्री भी वो रह चुके हैं। अनुभवी तो हैं लेकिन देश को मौजूदा संकट से उबारने में विक्रमसिंघे के साथ मिलकर कितने कामयाब हो पाएंगे, इसमें विरोधियों को संदेह है। जाहिर है नई सरकार को कुछ वक्त तो देना ही होगा।