कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी शुक्रवार को अफगानिस्तान के दौरे पर पहुंचे। कंधार में कतर के प्रतिनिधिमंडल ने तालिबान के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की। कतर के प्रधानमंत्री के अफगानिस्तान दौरे पर के बड़े मायने निकाले जा रहे हैं। बता दें कि साल 2020 में जब अमेरिका, अफगानिस्तान से निकला था, तो दोनों देशों के बीच बातचीत में कतर ने ही मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
दोनों देशों में सहयोग बढ़ाने पर होगी चर्चा
कतर के प्रधानमंत्री, अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद हसन अखुंद से मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं की मुलाकात से पहले तालिबान के प्रवक्ता जैबुल्लाह मुजाहिद ने ट्वीट करते हुए लिखा कि 'दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात में संबंधों को मजबूत करने और दोनों देशों के बीच विश्वास को बढ़ाने पर चर्चा होगी। साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक क्षेत्रों में भी अफगानिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।'
अमेरिका और तालिबान के बीच कराई थी मध्यस्थता
29 फरवरी 2020 को अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इस शांति समझौते में कतर ने ही मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। साल 2013 में कतर ने ही पहली बार तालिबान को दोहा में अपना कार्यालय खोलने की इजाजत दी थी। अमेरिका और तालिबान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाकर कतर की पश्चिम एशिया में भूमिका बढ़ी है।
पश्चिम एशिया की राजनीति में पकड़ मजबूत करने की चाह
विदेश मामलों पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि कतर, पश्चिम एशिया की राजनीति में अपनी ताकत को बढ़ाना चाहता है। अभी पश्चिम एशिया में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान का दबदबा है लेकिन ऊर्जा क्षेत्र की ताकत होने के चलते अब कतर भी पश्चिम एशिया की राजनीति में अपनी पकड़ को मजबूत करने में जुट गया है। अमेरिका और तालिबान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाकर कतर ने अपनी इस महत्वकांक्षा की तरफ कदम भी बढ़ा दिए हैं। कतर की सऊदी अरब और यूएई के साथ तनातनी का इतिहास रहा है, यही वजह है कि पश्चिम एशिया में तेजी से बदल रहे हालातों को देखते हुए कतर पीछे नहीं रहना चाहता।