सीएनएन के मुताबिक जिन लोगों को अधिकारी शुरुआत में ही उठा ले गए, उनमें बर्मी लेखक और इतिहास के प्रोफेसर मुआंग थार चो भी हैं। मुआंग नौजवानों में काफी लोकप्रिय हैं। उनके दिए भाषण यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर मौजूद हैं, जिन्हें हजारों की संख्या में लोगों ने सुना है। मुआंग को ले जाने वाले अधिकारियों ने उनके परिजनों से कहा था कि वे उनसे बातचीत के लिए उन्हें अपने साथ ले जा रहे हैं और उनका पूरा ख्याल रखा जाएगा। लेकिन उन अधिकारियों ने अपना कोई परिचय नहीं बताया। परिजनों के मुताबिक दो और तीन फरवरी को मुआंग ने उन्हें फोन किया था। उसके बाद से उनका कोई पता नहीं है।
मुआंग जैसा व्यवहार अनेक लोगों के साथ हुआ है और ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद नौजवान विरोध आयोजन पर अडिग हैं। जानकारों का कहना है कि 1988 (जब सेना ने पिछली बार सत्ता हथियाई थी) और इस बार में फर्क यह है कि अब आज की पीढ़ी को लोकतंत्र का तजुर्बा हो चुका है। साथ ही आज की पीढ़ी अधिक पढ़ी- लिखी और जागरूक है। इसलिए ये लोग लोकतंत्र वापसी के लिए संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैँ।
सीएनएन की रिपोर्ट में ऐसे कई प्रदर्शनकारियों का जिक्र है, जिन्होंने अपना नाम ना बताने की शर्ते पर उसके संवाददाता से बातचीत की। इनमें एक ऐसी महिला प्रदर्शनकारी भी शामिल हैं, जिन्होंने लोकतंत्र के लिए संघर्ष में भागीदारी के मकसद से बिजनेस डेवलपमेंट मैनेजर की अपनी नौकरी छोड़ दी है। उन्होंने कहा- ‘अब सब कुछ जनता के हाथ में है। वे लोकतंत्र का स्पर्श कर रहे हैं। हमारे देश में अभी लोकतंत्र की शुरुआत ही हुई थी। यह अभी आरंभिक चरण में था। इंटरनेट पर रोक के बावजूद लोग संगठित हो रहे हैं। हम उस तरह संगठित हो रहे हैं, जैसे लोग फेसबुक, ट्विटर के पहले के युगों में होते थे।’