विपक्ष की तरफ से पेश अविश्वास प्रस्ताव को लेकर प्रधानमंत्री इमरान खान का आत्म-विश्वास डोल रहा है। पाकिस्तानी अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक इमरान खान ने सार्वजनिक रूप से विपक्ष पर हमला बोलना जारी रखा है, लेकिन अंदरखाने वे बातचीत से रास्ता निकालने की कोशिश में भी जुटे हुए हैं। बताया जाता है कि सत्ताधारी नेताओं ने विपक्षी नेताओँ से संपर्क कर उन्हें मनाने की संभावना पर विचार किया है।
"मैच फिक्सिंग में यकीन करते हैं इमरान"
रविवार को एक जन सभा में इमरान खान ने कहा कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमे चल रहे हैं, वे उनकी सरकार गिराने के लिए एकजुट हो गए हैं। ये नेता सांसदों की खरीद-फरोख्त की कोशिश कर रहे हैं। इमरान खान ने कहा कि अगर खरीद-फरोख्त की कोशिश होती है, तो उसे रोकना सरकार और न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। इसके जवाब में विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने कहा कि अपनी तय हार को देखते हुए प्रधानमंत्री खान ऐसे आरोप लगा रहे हैं। बिलावल ने कहा- इमरान ऐसे व्यक्ति हैं, जो सिर्फ मैच फिक्सिंग में यकीन करते हैं।
लेकिन अखबार द न्यूज की एक खबर के मुताबिक पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की सरकार विपक्षी नेताओं के सामने उनकी मांगों को लेकर एक पेशकश करने के बारे में सोच रही है। इसके तहत वह समय से पहले आम चुनाव कराने और चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल के लिए बनाए गए कानून को रद्द करने की विपक्ष की मांग स्वीकार कर लेगी।
इस बारे में पूछे गए एक सवाल पर सूचना मंत्री फव्वाद चौधरी ने कहा- एक राय यह है कि विपक्ष से बातचीत की कोशिश होनी चाहिए, ताकि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव वापस लेने पर राजी किया जा सके। उन्होंने कहा ‘मेरे जैसे लोग व्यक्तिगत तौर पर यह महसूस करते हैं कि अविश्वास प्रस्ताव पर चाहे किसी की जीत या हार हो, उससे जनता में सियासी विभाजन बढ़ेगा और वैसी विभाजनकारी राजनीति इस मौके पर जनहित में नहीं होगी।’
इस्लामाबाद में दस लाख लोगों की रैली
प्रधानमंत्री इमरान खान ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दिन इस्लामाबाद में दस लाख लोगों की रैली करने का एलान किया है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस घोषणा के पीछे प्रधानमंत्री के दो मकसद हैं। पहला, वे अपनी पार्टी के असंतुष्ट नेताओं पर दबाव बनाना चाहते हैं। उनकी दूसरी मंशा यह है कि अगर अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया, तो वे तुरंत जन अभियान की शुरुआत कर दें।
विपक्ष पहले से जन आंदोलन छेड़ चुका है। पीपीपी के नेता बिलावल इस समय लॉन्ग मार्च का नेतृत्व कर रहे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि बढ़ते सियासी तापमान के कारण दोनों खेमों में घबराहट है। इस बात को दोनों तरफ समझा जा रहा है कि अगर देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई, अर्थव्यवस्था और सामाजिक शांति पर उसका बहुत खराब असर हो सकता है।
फिलहाल, सबकी नजर पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू), एमक्यूएम (पी), बलूचिस्तान अवामी पार्टी और ग्रैंड डेमोक्रेटिक एलायंस (जीडीए) के रुख पर है। उम्मीद जताई गई है कि बुधवार तक इन पार्टियों के रुख के बारे में ठोस संकेत मिल जाएंगे। पीटीआई सरकार बचेगी या नहीं, यह उनके ही रुख पर निर्भर करता है। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में बहुमत के लिए 172 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। फिलहाल, यह तय नहीं है कि इतने सदस्य इमरान खान के साथ हैं या नहीं।