यूरोपियन यूनियन (ईयू) के नेताओं ने कोरोना महामारी से हुए आर्थिक नुकसान से उबरने, और नई ग्रीन (पर्यावरण संरक्षण संबंधी) नीतियों और डिजिटल टेक्नोलॉजी के कारण पैदा हो रही उथल-पुथल का मिल कर सामना करने का संकल्प लिया है। ये संकल्प 'सोशल यूरोप' नाम से पोर्तो में दो दिनी सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित कर लिया गया।
इस आयोजन को यूरोप में काफी अहमियत दी गई है। इसमें ज्यादातर देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आए हैं। कोरोना महामारी आने के बाद ये पहला मौका है, जब ईयू के सभी 27 सदस्य देशों के नेता यहां व्यक्तिगत रूप से आए है। सम्मेलन में उनके बैठने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल करते हुए खास इंतजाम किया गया है। सम्मेलन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईयू में रोजगार की उम्र वाले कम से कम 78 प्रतिशत लोग रोजगार में रहें।
साथ ही 60 फीसदी कर्मचारियों की हर साल नई ट्रेनिंग हो। सम्मेलन का मकसद ऐसे उपायों पर विचार करना भी है, जिससे ईयू क्षेत्र में गरीबी रेखा के नीचे जाने का जोखिम रखने वाले लोगों की संख्या घटा कर डेढ़ करोड़ की जाए। ईयू के नेताओं ने कहा है कि नई नीतियों और तकनीक के कारण यह जरूरी हो गया है कि कर्मचारियों की जीवन भर ट्रेनिंग जारी रखने के इंतजाम किए जाएं, ताकि उनका रोजगार बचा रहे। विश्लेषकों का कहना है कि इसका व्यवहार में मतलब यह होगा कि बुनियादी शिक्षा का बच्चों के अधिकार का दायरा बढ़ा कर उसमें रिटायरमेंट की उम्र तक के सभी लोगों शामिल किया जाए।
गौरतलब है कि यूरोपीय आयोग ने व्यक्तियों के जीवन भर प्रशिक्षण की एक योजना का प्रस्ताव पेश किया था। उसका मकसद यह बताया गया कि लोगों के कौशल में हमेशा इजाफा होता रहे, ताकि नई डिजिटल अर्थव्यवस्था में वे बार-बार नए करियर को अपना सकें।
कहने में आसान, अमल उतना ही मुश्किल : विशेषज्ञ
विश्लेषकों का कहना है कि ये बातें कहने में जितनी आसान है, उन्हें अमली जामा पहनाना उतना ही मुश्किल होगा। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि 'सोशल यूरोप' सम्मेलन मोटे तौर पर उन देशों की पहल पर हो रहा है, जहां वामपंथी रुझान वाली सरकारें हैं, जबकि पिछले महीने 11 देशों ने सम्मेलन के मकसद का तो समर्थन किया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी थी कि इसे देशों की अंदरूनी नीतियों में दखल का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
सम्मेलन में कोरोना वैक्सीन पर से पेटेंट संरक्षण हटाने के मुद्दे पर भी विचार होगा। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस पर गहरे मतभेद उभर सकते हैं, क्योंकि जर्मनी जैसे देश इसके बिल्कुल पक्ष में नहीं हैं। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष वॉन डेर लियेन ने सम्मेलन में दिए अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि महामारी ने उन महत्त्वपूर्ण कर्मियों पर रोशनी डाली है, जिन्हें सामाजिक सुरक्षाओं से वंचित रखा गया है।
उन्होंने कहा कि महामारी ने हमारी अर्थव्यवस्था के विरोधाभासों को जाहिर कर दिया। उन जरूरी कर्मियों के बारे में सोचिए, जिनमें स्वास्थ्य कर्मी से लेकर क्लर्क, सफाई कर्मी और डिलिवरी पर्सन शामिल हैं। अब हम सभी जानते हैं कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी उन पर निर्भर है। महामारी के दौरान उनका योगदान बहुमूल्य रहा है। लेकिन उनमें से बहुतों को समान अधिकार और सामाजिक सुरक्षाएं प्राप्त नहीं हैं। अब यूरोप की सामाजिक अर्थव्यवस्था को उनके हित में काम करना होगा।’
2020 में बनी थी सोशल यूरोप की योजना
'सोशल यूरोप' सम्मेलन की योजना 2020 के आरंभ में बनाई गई थी। इसे पिछले साल फरवरी में आयोजित किया जाना था। लेकिन कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण इसे टाल दिया गया। इसके पीछे मुख्य पहल पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंतोनियो कोस्टा की रही है। कोस्टा सोशल डेमोक्रेट हैं। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि सम्मेलन में महत्त्वाकांक्षी बातें हुई हैं।
यूरोप में इनको लेकर कोई आम सहमति नहीं है। सामाजिक कल्याण की नीति कैसी हो, यह ईयू के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इसे अलग-अलग देशों की सरकारें तय करती हैं। ऐसे में पूरे क्षेत्र के लिए एकरूप नीति का प्रारूप तय करना एक आदर्शवादी बात है। वैसी नीति पर अमल और भी ज्यादा मुश्किल है।