संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के चुनाव में इस बार बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला। पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया ने कड़े मुकाबले में जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीटों पर कब्जा जमा लिया। वहीं मध्य एशियाई देश किर्गिस्तान ने भी इतिहास रचते हुए पहली बार सुरक्षा परिषद में जगह बनाई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए गुप्त मतदान के बाद घोषित नतीजों ने कई देशों को चौंका दिया। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल जर्मनी इस चुनाव में पर्याप्त समर्थन जुटाने में असफल रहा।
पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया को मिला बहुमत
मुख्य रूप से पश्चिमी देशों के समूह के लिए निर्धारित दो सीटों पर पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया के बीच मजबूत समर्थन देखने को मिला। मतदान में पुर्तगाल को 134 वोट और ऑस्ट्रिया को 131 वोट प्राप्त हुए। इसके विपरीत जर्मनी को केवल 104 वोट मिले, जिसके चलते वह चुनाव हार गया। जर्मनी इससे पहले छह बार सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है, लेकिन इस बार उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन के मोर्चे पर निराशा हाथ लगी। ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्रालय ने इस जीत को 15 वर्षों की लंबी कूटनीतिक कोशिशों का परिणाम बताते हुए इसे देश के प्रति वैश्विक विश्वास का प्रतीक बताया।
पहली बार सुरक्षा परिषद में पहुंचेगा किर्गिस्तान
एक अन्य महत्वपूर्ण मुकाबले में किर्गिस्तान और फिलीपींस के बीच कड़ी टक्कर हुई। चार चरणों तक चली वोटिंग के बाद किर्गिस्तान ने 143 वोट हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि फिलीपींस को 49 वोट मिले। इस जीत के साथ किर्गिस्तान पहली बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनेगा, जिसे उसकी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
जिम्बाब्वे और त्रिनिदाद एवं टोबैगो भी चुने गए
अफ्रीकी क्षेत्र से जिम्बाब्वे और कैरेबियाई क्षेत्र से त्रिनिदाद एवं टोबैगो निर्विरोध उम्मीदवार थे। दोनों देशों को 180 से अधिक वोट मिले और वे आसानी से सुरक्षा परिषद के लिए चुने गए। नवनिर्वाचित पांचों देश 1 जनवरी से अपना दो वर्षीय कार्यकाल शुरू करेंगे। वे डेनमार्क, ग्रीस, पाकिस्तान, पनामा और सोमालिया की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है सुरक्षा परिषद?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण संस्था मानी जाती है। 15 सदस्यीय परिषद में पांच स्थायी सदस्य होते हैं (संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस)। इन पांच देशों को वीटो का विशेष अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर दो वर्षों के लिए चुना जाता है।
हाल के वर्षों में सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष और ईरान से जुड़े मामलों में परिषद प्रभावी निर्णय लेने में असफल रही है। इसकी बड़ी वजह स्थायी सदस्यों द्वारा वीटो अधिकार का इस्तेमाल माना जाता है। इसी कारण दशकों से सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार की मांग उठती रही है। कई देश चाहते हैं कि वर्तमान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को देखते हुए परिषद की संरचना में बदलाव किया जाए। हालांकि अब तक सभी प्रयास सफल नहीं हो सके हैं, लेकिन सुधार को लेकर एक नया दौर फिर शुरू हो चुका है।