पोप लियो 14वें ने शुक्रवार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों की वेटिकन में हुई एक बैठक को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि एआई की दौड़ के सामने सबसे जरूरी चुनौती ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की पहचान करना है, जो एआई के विकास को दिशा देने वाले नैतिक सिद्धांतों को लागू कर सकें।
अमेरिका में जन्मे पोप लियो ने एआई को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। उन्होंने कहा कि नैतिक सिद्धांत पहले से ही पता हैं। लेकिन ऐसी संस्थाओं की कमी है, जो वैश्विक साझा हितों की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकें।
पोप ने क्या कहा?
उन्होंने बैठक में कहा, इसके लिए साझा मानकों, स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही के स्पष्ट तंत्र की जरूरत है। इससे एआई के विकास और इस्तेमाल से जुड़े फैसलों की जांच की जा सकेगी। जरूरत पड़ने पर उन्हें चुनौती दी जा सकेगी। साथ ही, उनसे होने वाले किसी भी नुकसान के लिए उचित समाधान भी उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
यह बैठक वेटिकन में आयोजित की गई थी। इसका सह-आयोजन पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ लाइफ और फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट ने किया था। पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ लाइफ वेटिकन की जैव-नैतिकता से जुड़ी वैचारिक संस्था है। इस बैठक के जरिये वेटिकन के आंतरिक एआई आयोग को इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ बातचीत करने का मौका मिला।
एआई पर पोप के संदेश में क्या था?
लियो के 2026 के एआई से जुड़े संदेश (एनसाइक्लिकल) 'मैग्निफिसेंट ह्यूमैनिटी' में एआई के लिए मजबूत नियम बनाने की अपील की गई थी। इसमें कहा गया था कि एआई विकसित करने वालों को मुनाफे के बजाय साझा हितों के लिए काम करना चाहिए।
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शुक्रवार को लियो ने अपने इस संदेश में कई प्रमुख बातों पर जोर दिया। उन्होंने खास तौर पर कहा कि एआई का भविष्य पहले से तय नहीं है। यह काफी हद तक उन फैसलों पर निर्भर करेगा, जो एआई विकसित करने वाले लोग और राजनीतिक नेता आज लेंगे। इसके अलावा, उन्होंने जोर देकर कहा कि मशीनें उपकरण हैं, व्यक्ति नहीं। इसलिए उन्हें कानूनी दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। न ही उन्हें जीवन और मृत्यु से जुड़े फैसले लेने की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
हालांकि, उन्होंने कहा कि एआई के क्षेत्र के सामने मौजूद सभी चुनौतियों में सबसे जरूरी चुनौती संस्थागत नैतिक ढांचे की है। यानी ऐसे संस्थानों की व्यवस्था बनाना जरूरी है, जो एआई के विकास और इस्तेमाल में नैतिक सिद्धांतों को लागू कर सकें।