प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मलयेशिया की अपनी दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा के दौरान आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) के पूर्व सैनिक से संवाद किया। इस अवसर पर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में ईएनए की ऐतिहासिक भूमिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय समुदाय के बीच उसकी स्थायी विरासत को रेखांकित किया।
इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने ईएनए के वरिष्ठ सेनानी जयराज राजा राव से भेंट की और इस मुलाकात को अत्यंत प्रेरक बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि जयराज राजा राव का जीवन अदम्य साहस और बलिदान से भरा है, और उनके अनुभव सुनना बेहद प्रेरणादायक रहा।
नेताजी को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि
वहीं, जयराज राजा राव ने भी प्रधानमंत्री से हुई मुलाकात को अपने जीवन का यादगार पल बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से बातचीत के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस, स्वतंत्रता आंदोलन और आजादी के बाद भारत की प्रगति जैसे विषयों पर चर्चा हुई। उन्होंने देश के विकास के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व की सराहना भी की।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने आजाद हिंद फौज और उसके संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि भारत सदैव ईएनए के वीर पुरुषों और महिलाओं का ऋणी रहेगा, जिनके अदम्य साहस ने देश की तकदीर बदलने में अहम भूमिका निभाई।
वरिष्ठ सेनानियों से पीएम का संवाद ऐतिहासिक महत्व
विदेश मंत्रालय के पूर्वी मामलों के सचिव पेरियासामी कुमारन ने इस मुलाकात को प्रधानमंत्री की यात्रा का एक विशेष और भावनात्मक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि ईएनए के जीवित बचे वरिष्ठ सेनानियों से प्रधानमंत्री का संवाद ऐतिहासिक महत्व रखता है।
पीएम मोदी ने सराहना भी की
यह मुलाकात उस कार्यक्रम के बाद हुई, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने मलयेशिया में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय को संबोधित किया था। अपने संबोधन में उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय मूल के लोगों के बलिदान को याद करते हुए कहा कि कई लोगों ने भारत की धरती देखे बिना ही आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। प्रधानमंत्री ने मलयेशिया में नेताजी की स्मृति को सम्मान देने के प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारतीय सांस्कृतिक केंद्र का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर रखा गया है और नेताजी सेवा केंद्र व नेताजी वेलफेयर फाउंडेशन के प्रयासों की सराहना की।
इतिहास के पन्नों में झांकें तो वर्ष 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला था। सिंगापुर और तत्कालीन मलाया (अब मलयेशिया) से उन्होंने इस संगठन को नई ऊर्जा दी और भारतीय नागरिकों व युद्धबंदियों को जोड़कर इसे एक मजबूत आंदोलन का रूप दिया। ईएनए की विरासत आज भी मलयेशिया और सिंगापुर में बसे भारतीय समुदाय के दिलों में जीवित है। खास तौर पर रानी झांसी रेजिमेंट, जो पूरी तरह महिलाओं की टुकड़ी थी, ने स्वतंत्रता संग्राम में नारी शक्ति का ऐतिहासिक उदाहरण पेश किया और आज भी देशभक्ति की प्रेरणा बनी हुई है।