जलवायु बिगाड़ने का जिम्मेदार कौन है, ओजोन परत को किसने नुकसान पहुंचाया और आसमान में इतना कार्बन किसने भेजा? बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के मंच से बृहस्पतिवार को यह तीखा सवाल उछालने वाले केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल शुक्रवार को यूरोप का शुक्रिया अदा करते दिखे।
दौरे के समापन पर उन्होंने कहा कि कल जो कहा वह तथ्य था, पर यह भी सच है कि पर्यावरण के मामले में यूरोप बहुत से देशों से आगे है और भारत के साथ उसकी साझेदारी तेजी से बढ़ रही है। सवाल की धार और शुक्रिया की मिठास, बर्लिन में भारत की कूटनीति के दोनों रंग एक साथ दिखे।
माफ कीजिए...सब जिम्मेदार नहीं
बृहस्पतिवार की चर्चा में जब गोयल ने पूछा कि कार्बन किसने भेजा, तो साथ बैठे एक वक्ता ने कहा, हम सभी ने। गोयल ने तुरंत टोका, नहीं, माफ कीजिए। उन्होंने याद दिलाया कि दुनिया की 17 फीसदी आबादी वाला भारत वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में तीन फीसदी से भी कम हिस्सेदार है। उन्होंने कहा कि 2015 के पेरिस समझौते में तय हुआ था कि दशकों तक जलवायु बिगाड़कर फल चखने वाले विकसित देश ज्यादा कीमत चुकाएंगे और विकासशील देशों की मदद करेंगे, पर 11 साल बाद भी एक पाई नहीं दिखी, सब वादे ही वादे हैं। गोयल ने कहा कि यूरोप ने सस्ती ऊर्जा के लिए दिन-रात कोयला जलाया, अपने विकास के लिए यह उनकी मजबूरी रही होगी, पर समस्या वहीं से शुरू हुई। शुक्रवार को सुर संतुलित था। गोयल ने कहा कि पेरिस समझौते के बाद भारत ने अपने लक्ष्य समय से पहले पार किए हैं और यूरोप इसकी कद्र करता है।
बाजार नहीं, अब भागीदार
यूरोप से रिश्ते की असली तस्वीर कंपनियों के बोर्डरूम से निकली। सीमेंस, बर्टेल्समान, फोक्सवागन और स्कोडा जैसी कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के बाद गोयल ने कहा कि हर मेज पर एक ही बात सुनाई दी, जर्मन कंपनियां अब भारत को सिर्फ बाजार नहीं, विनिर्माण, शोध और नवाचार का ठिकाना मानती हैं। करीब 2,000 जर्मन कंपनियां पहले से भारत में काम कर रही हैं। गोयल ने इसकी वजह भी साफ बताई। आज जर्मन उद्योग के सामने सबसे बड़ी जरूरत लागत घटाकर दुनिया के बाजार में टिके रहने की है, इसलिए वह भारत में कहीं बड़े पैमाने पर उत्पादन की सोच रहा है।
पैसा नहीं, माहौल चाहिए
जर्मनी में पढ़ रहे और शोध कर रहे युवा भारतीयों से बातचीत में गोयल ने पूछा कि भारत लौटकर काम करने के लिए उन्हें क्या चाहिए। उन्होंने कहा कि जवाब ने चौंकाया, मामला सिर्फ पैसे का नहीं, अनुकूल माहौल और मजबूत तंत्र का है। लौटकर वह सरकार, शिक्षण संस्थानों, शोध संस्थानों और उद्योग को एक मेज पर लाकर इसका खाका तैयार करेंगे। जर्मनी में करीब 3.3 लाख भारतीय मूल के लोग और 60 से 70 हजार भारतीय छात्र हैं, और गोयल के मुताबिक ये छात्र अपनी सीख लेकर भारत लौटने को उत्साहित हैं, क्योंकि असली हलचल अब वहीं है।
समझौते की असली कसौटी
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर इस साल के अंत तक दस्तखत होने और अगले साल लागू होने की उम्मीद है। गोयल ने कहा कि आने वाले वर्षों में इसकी कामयाबी दस्तावेजों से नहीं, नए कारोबार, नए ऑर्डर, बढ़ते निवेश और तकनीकी साझेदारियों से मापी जाएगी, जिनका अंतिम नतीजा भारतीय युवाओं के लिए रोजगार होगा।
दुनिया के मेलों में भारत का डंका
विदेशों में होने वाले मेलों और प्रदर्शनियों की सूची बनाने के लिए दूतावासों को लिखने की योजना पर गोयल ने कहा कि वह विदेश मंत्री एस जयशंकर से बात करेंगे और दोनों मिलकर सभी दूतावासों को जोड़ेंगे, ताकि दुनिया भर में भारत की कहानी और ताकत की गूंज हो।