बीमारी का सामना करने वाले ज्यादातर लोग इलाज की तलाश में डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन कुछ वैज्ञानिकों ने अपनी बीमारी को ही शोध का विषय बना लिया। वर्षों तक असहनीय दर्द, गलत निदान और बीमारी के डर से जूझने के बाद इन मरीज-शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला का रास्ता चुना। मकसद सिर्फ खुद के लिए इलाज तलाशना नहीं, बल्कि उन मरीजों के लिए बेहतर उपचार खोजना है जिनकी बीमारियां दुर्लभ या अब तक लाइलाज हैं।
नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक इटली की आणविक जीवविज्ञानी फ्रांसेस्का ग्रानाटा इसका उदाहरण हैं। बचपन से ही उन्हें त्वचा में इतना तेज दर्द होता था कि मां का गले लगाना भी असहनीय लगता था। 2008 में जांच के बाद पता चला कि उन्हें एरिथ्रोपोएटिक प्रोटोपोरफीरिया है। यह आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाओं में प्रोटोपोरफीरिन जमा होने से रोशनी के संपर्क में त्वचा में तेज जलन और दर्द होता है। गंभीर मामलों में यकृत भी प्रभावित हो सकता है।
मां की मौत ने शोध पर किया मजबूर
अमेरिकी वैज्ञानिक सोनिया वल्लभ की कहानी भी ऐसी ही है। 2010 में उनकी 52 वर्षीय मां की तेजी से बढ़ती स्मृतिभ्रंश की बीमारी से मौत हुई। जांच में पता चला कि वह आनुवंशिक प्रायन बीमारी से पीड़ित थीं। बाद में वल्लभ ने भी जांच कराई और पाया कि उनमें भी इस बीमारी से जुड़ा जीन परिवर्तन मौजूद है। वल्लभ उस समय कानून के क्षेत्र में काम कर रही थीं। मां की मौत और खुद में बीमारी का खतरा सामने आने के बाद उन्होंने करियर बदलकर विज्ञान की पढ़ाई शुरू कर दी। अब वह अपने पति और संगणकीय जीवविज्ञानी एरिक मिनिकल के साथ प्रायन बीमारी के इलाज पर शोध कर रही हैं।
बीमारी से मिला इलाज का रास्ता
कैसलमैन बीमारी से पीड़ित चिकित्सक-शोधकर्ता डेविड फाजेनबॉम ने अपनी बीमारी के इलाज में पहले से मौजूद दवा के नए इस्तेमाल का रास्ता खोजा। बीमारी के कारण वह कई बार गंभीर स्थिति में पहुंचे। अपने रक्त परीक्षण और वैज्ञानिक शोधों के अध्ययन से उन्होंने पाया कि प्रतिरक्षा तंत्र की सक्रियता रोकने वाली एक दवा उनकी बीमारी में मदद कर सकती है। इसके इस्तेमाल से वह एक दशक से ज्यादा समय से बीमारी के दोबारा उभरने से बचे हैं।अब उनका संगठन कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से मौजूदा दवाओं में ऐसे विकल्प तलाश रहा है, जिन्हें दुर्लभ बीमारियों के इलाज में दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।
अपना अनुभव आया काम
अमेरिका की स्टेम-सेल वैज्ञानिक वैलेंटिना फोसाती को 30 वर्ष की उम्र में मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानी एमएस का पता चला। उन्होंने इसी बीमारी पर शोध शुरू कर दिया। अब वह स्टेम कोशिकाओं से मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाएं विकसित करने की तकनीकों पर काम कर रही हैं, ताकि समझा जा सके कि बीमारी में तंत्रिका तंतुओं को ढकने वाली मायलिन परत क्यों नष्ट होती है।
फोसाती के मुताबिक, मरीज-शोधकर्ता उपचार के दौरान मरीजों की वास्तविक परेशानियों को बेहतर समझ सकते हैं। दवा के दुष्प्रभाव, इंजेक्शन का डर या एमआरआई मशीन में बंद रहने की बेचैनी जैसी समस्याओं को ध्यान में रखकर नैदानिक परीक्षणों की प्रक्रिया बेहतर बनाई जा सकती है। अब इस पर फोसाती लगातार काम कर रही हैं। उम्मीद है कि जल्द ही स्थायी इलाज मिल जाएगा।