भारतवंशी अमेरिकी सर्जन डॉ. विवेक मूर्ति के मुताबिक माता-पिता बच्चों पर एक पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक पैसे खर्च कर रहे हैं। खासतौर पर खेल या ट्यूशन जैसी पढ़ाई से इतर गतिविधियों के लिए। वे उनके साथ सक्रिय रूप से जुड़ने, पढ़ने या खेलने में अधिक समय बिताते हैं। शोध से पता चला है कि सभी वर्गों के माता-पिता यह दबाव रहता है।
माता-पिता को जब लगता है कि वे अपने बच्चों की सफलताओं या असफलताओं को माप नहीं पाते हैं तो वह खुद को दोषी मानने लगते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर ने पाया कि अधिकतर माता-पिता कहते हैं कि उन्हें लगता है कि उनके बच्चों की सफलता या असफलता का असर उन पर पड़ता है। काफी लोग इसके लिए आलोचना झेलते हैं।
छोटी उम्र में प्रतिस्पर्धा का तनाव न डालें
डॉ मूर्ति के मुताबिक माता-पिता को ध्यान रखना होगा कि बच्चों पर छोटी उम्र में अपनी आकांक्षाओं का बोझ न डालें। उन्हें पढ़ाई, समाज में प्रतिस्पर्धा और दूसरे बच्चों से तुलना का तनाव न दें। कई बार छोटे बच्चों को ही कॉलेज में पढ़ाई में प्रतिस्पर्धा का डर बिठा दिया जाता है, जो बच्चों में घबराहट बढ़ाता है और आत्मविश्वास कम करता है।
अलग-अलग वर्ग के लोग करते हैं आकलन
माता-पिता को अक्सर ऐसा लगता है कि बच्चों की परवरिश को लेकर उन्हें हमेशा तराजू के पलड़े पर रखा जाता है। इसमें पति-पत्नी के बीच भी एक दूसरे को लेकर राय बनाना शामिल है। प्यू रिसर्च सेंटर ने सितंबर-अक्तूबर 2022 में एक सर्वे किया जिसमें यह पता लगाने की कोशिश की कि एक माता पिता के अनुसार उन्हें कौन कितना आंकता है। जीवनसाथी 53 फीसदी, अभिभावक 43, साथी के अभिभावक 41, आसपास दूसरे बच्चों के माता-पिता 35 और मित्र 29 फीसदी आकलन करते हैं।